मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Wednesday, 20 May 2015

मोदी सरकार - आर्थिक और सामाजिक विकास

                                      पिछले वर्ष लम्बे चौड़े दावों और वायदों के साथ सत्ता में आई मोदी सरकार के एक वर्ष पूरा करने के साथ ही उसका मूल्यांकन भी शुरू ही हो चुका है पर जिस तरह से सरकार समर्थकों और विरोधियों द्वारा अपने अपने पक्षों को ही इस तरह से रखने को होड शुरू हो चुकी है उसमें यही लगता है कि लोगों में सही गलत के स्थान पर केवल अपने पक्षों के गुणगान का करने का ही मन है. यह सही है कि किसी भी देश-काल में बनाई गयी कोई भी नीति लम्बे समय तक लाभ या हानि दिया करती है पर कई बार हम उसके उस स्वरूप पर विचार करने के स्थान पर उसकी समीक्षा बहुत छोटी समयावधि के लिए ही करने लगते है. १९९१ में जब राव सरकार ने देश के बाज़ारों को पूरी दुनिया के लिए १९७७ के बाद पहली बार खोलना शुरू किया था तो उनके इस निर्णय की बहुत आलोचना हुई थी पर आज देश से बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को भागने में १९७७ की सरकार में शामिल रहे लोग जिस तरह से फिर से वैश्विक बाज़ार की बातें सोचने और उसके लिए आवश्यक बदलाव करने में लगे हुए हैं उसका प्रभाव लम्बे समय में ही महसूस किया जाने वाला है. इस बात से कोई भी इंकार नहीं कर सकता है कि पिछली मनमोहन सरकार ने भी अपने कमज़ोर बहुमत के बाद भी आर्थिक सुधारों को गति देने की पूरी कोशिश की थी पर उनकी राह में संख्या बल ने सदैव ही रोड़े अटकाए.
                                      मोदी सरकार भ्रष्टाचार पर कठोर होने के सन्देश देती है पर केंद्र सरकार की जिन सामाजिक सुधार की परियोजनाओं में राज्यों में व्यापक स्तर पर घोटाले किये जा रहे थे उसमें व्यापक कटौती के चलते ही आज भ्रष्टाचार पर अंकुश लग गया हो ऐसा तो नहीं कहा जा सकता है पर जिन योजनाओं से देश के आम गरीबों को लाभ मिला करता था आज उनके बजट में बहुत बड़े पैमाने पर कटौती की जा चुकी हैं और उसे विनिर्माण के क्षेत्र में लगाया जा रहा है जो कि मोदी के अनुसार सही नीति है पर आने वाले समय में इसकी राजनैतिक दुष्प्रभाव पड़ने की आशंका आज से ही महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी को महसूस होने लगी है. आज जब देश में अधिकतर लोगों तक आधार और बैंकों की पहुँच हो चुकी है तो हर तरह की सब्सिडी का भुगतान सीधे उनके खातों में करने की नीति को सबसे पहल अमल में लाया जाना चाहिए जिससे उन गरीबों पर इसकी मार न पड़े जिनको राज्यों द्वारा ईमानदारी से उन तक पहुँचाया जा रहा है ? सामाजिक क्षेत्र की परियोजनाओं पर नियंत्रण उर नज़र रखने के लिये एक मज़बूत व्यवस्था बनाये जाने के स्थान पर मोदी सरकार ने इन योजनाओं पर ही बजट की मार दी है उसे किसी भी तरह से सही नहीं ठहराया जा सकता है. आज ओडिशा भी इसी तरह की चिंताओं में है क्योंकि केंद्रीय योजनाओं के दम पर ही नवीन पटनायक ने अपनी मज़बूत पैठ ग्रामीण स्तर तक बना ली है.
                                  जहाँ तक राज्यों को १०% टैक्स वसूली का हिस्सा दिए जाने की बातें की जा रही हैं वे तो अगले वित्तीय वर्ष तक सामने आने वाली हैं क्योंकि राज्यों को जिस धन का आवंटन आज पहले हो जाया करता था अब वह किस्तों में और कर वसूली पर ही निर्भर रहने वाला है. वित्तीय प्रबंधन अच्छी बात है पर जिस तरह से मेड डे मील और मनरेगा के बजट में कटौती और परिवर्तन किया जा रहा है उससे एक बार फिर से ग्रामीण भारत का शहरी क्षेत्रों की तरफ पलायन शुरू हो सकता है जो कि इन योजनाओं के बाद से ही लगातार गिरावट का दौर देख रहा था. कहीं ऐसा तो नहीं है कि मोदी सरकार आने वाले समय में उद्योग जगत को सस्ता श्रम दिलवाने के लिए ही ग्रामीणों के इस अधिकार पर कुठाराघात करने में लगी हुई है क्योंकि इससे एक बार फिर से गांवों में रोज़गार के अवसर कम हो सकते हैं और लोगों को औद्योगिक क्षेत्रों का रुख करना पड़ सकता है ? सरकार की मंशा पर संदेह तब अधिक होने लगते हैं जब उसके कदम एक योजना के तहत इस तरह से उठाये जा रहे हों. आज भी सम्पूर्ण भारत में औद्योगिक इकाइयां एक समान रूप से नहीं लगी हुई है तो लोगों को घरों के पास रोज़गार किसी भी हालत में नहीं मिल सकता है जिससे उनके लिए पलायन करना मजबूरी भी हो सकता है.                   
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