मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Friday, 27 July 2012

मूर्ति और मानसिकता

          लखनऊ में जिस तरह से गोमतीनगर स्थित अम्बेडकर पार्क में लगी प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री और बसपा की अध्यक्ष मायावती की मूर्ति को कुछ शरारती तत्वों ने क्षति ग्रस्त किया उससे उनकी मानसिकता का ही पता चलता है. माया ने अपनी मूर्तियाँ पूरे प्रदेश में कई जगह पर लगवायीं और वे जिस तरह से दलित स्वाभिमान का प्रतीक आज देश में बन चुकी है उसे देखते हुए भी उनके समर्थकों ने पूरे देश में डॉ अम्बेडकर के साथ उनकी मूर्तियाँ लगायी हैं. हमारे देश में इस तरह से मूर्तियाँ लगाने की परंपरा सी रही है जिसे देखते हुए यह कहा जा सकता है कि आम भारतीय अपनी श्रद्धा को इस तरह से व्यक्त करता है तो अनुचित नहीं होगा. माया सरकार के समय इन स्मारकों के रख रखाव और इनकी सुरक्षा के लिए एक सुरक्षा बल का भी गठन किया था वह अलग बात है कि उसका गठन कानूनी तौर पर सही न होने के कारण आज ख़त्म हो चुका है. जितनी बड़ी संख्या में मूर्तियाँ लगी हैं तो उनके सम्मान के लिए अब उनकी सुरक्षा का ज़िम्मा भी किसी पर होना ही चाहिए वर्ना कुछ उपद्रवी तत्व इसका दुरूपयोग आम लोगों की भावनाएं भड़काने के लिए कर सकते हैं जो कि पहले से ही खस्ता हाल कानून व्यवस्था के लिए और भी ख़तरा बन सकता है.
           इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात यह की जानी चाहिए कि पूरे देश में बिना जिलाधिकारी की अनुमति और आवश्यकता के साथ मूर्ति की भविष्य में सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए ही लगाने की अनुमति प्रदान की जानी चाहिए क्योंकि जिस तरह से अति उत्साह में लोग कहीं पर भी मूर्तियाँ लगा देते हैं और बाद में उनके सम्मान की व्यवस्था का प्रबंध नहीं कर पाते हैं वह भावना भी कहीं न कहीं इस तरह की समस्या को जन्म देती है. भोपाल में लगी गाँधी जी की मूर्ति का चश्मा कितनी बार चुराया जा चुका है उसकी गिनती भी नहीं की जा सकती है पर किसी भी स्थान पर किसी भी लगी हुई मूर्ति के सम्मान की बात को अब कानून के दायरे में लाना चाहिए और जो लोग मूर्ति लगा रहे हैं उन पर ही भविष्य में मूर्ति की सुरक्षा का भार डाला जाना चाहिए. सरकारी स्तर पर मूर्तियाँ लगाये जाने के लिए एक स्पष्ट नियमावली होनी चाहिए वरना इस तरह से कहीं पर भी मूर्ति लगा देने से बाद में इस तरह के ख़तरे समाज में हमेशा ही बने रहते हैं. देश में अधिकारी भी इस बात के लिए तभी तक संवेदन शील रहते हैं जब तक सम्बंधित दल की सरकार होती है उसके बाद वे भी सत्ताधारी दल की प्राथमिकता पर ही ध्यान देने लगते हैं.
          परिवर्तन के तौर पर अखिलेश सरकार का कार्यकाल कुछ बड़ी आशाएं जगाने में सफल होता नहीं दिख रहा है क्योंकि फैसले लेने और पलटने के कारण उनकी अनुभवहीनता लोगों के सामने आ रही है. अब यही लगता है कि जैसे जनता ने विकल्पहीनता की स्थिति में सपा का सर्थन किया था और अखिलेश सरकार का काम औसत भी नहीं रह पा रहा है. मुद्दों को सुलझाने के स्थान पर नए नए विवाद खड़े करके सरकार की किरकिरी करवाना अब एक स्थायी भाव बनता जा रहा है. कानून व्यवस्था के मसले पर जिस तरह से पुलिस और प्रशासन काम चलाऊ तरीके से काम कर रहे हैं और अच्छा काम करने वाले अधिकारियों को काम नहीं करने दिया जा रहा है उससे सरकार की छवि ख़राब होती है. मूर्ति वाले प्रकरण के लखनऊ और मायावती से जुड़े होने के कारण पुलिस कुछ जल्दी ही हरकत में आ गयी और तेज़ी दिखाते हुए प्रशासन ने उस स्थान पर नयी मूर्ति भी लगा दी है जिससे फिलहाल विवाद कम हो गया है पर वसूली व्यवस्था के तहत पोस्टिंग पाए किसी भी अधिकारी या कर्मचारी से निष्पक्ष होकर काम करने की आशा आख़िर किस तरह से की जा सकती है ? अगर वास्तव में ज़मीनी स्तर पर कुछ सुधार करना है तो उसकेलिए अनुभव को साथ लेकर सरकार को काम करना चाहिए वरना जनता सब देखती है और अच्छे अच्छों के सपनों को धूल में मिलाने में कोई कसर नहीं छोड़ती है.
     
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