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Wednesday, 29 January 2014

यूपी पुलिस- कार्यशैली और मनोबल

                                        एक के बाद एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक मसलों पर लगातार असफल होती जा रही यूपी पुलिस की कार्यशैली पर ही अब संदेह होने लगा है कि क्या वह वास्तव में ज़मीन पर काम करते समय अपनी उस ट्रेनिंग को याद भी रखती है जिसे उसने सीखा होता है क्योंकि अधिकतर मामलों में जब उसकी स्पष्ट और कड़ी कार्यवाही से मामला सुलझ सकता है वहाँ पर उसके ढुलमुल रवैये के कारण ही मामला हिंसा और तनाव से भर जाता है और जब समझाने की ज़रुरत होती है तो वह डंडे फटकारती नज़र आती है ? आख़िर ऐसे वे कौन से कारण हैं जिनके बारे में यूपी पुलिस केवल सतही स्तर पर ही सोच पाती है और उसके बाद की परिस्थितियों से निपटने में भी वह जिस नौसिखिये पन का प्रदर्शन करती है वह भी यूपी के सामजिक और धार्मिक माहौल को बिगाड़ने में बहुत बड़ा सहयोग करता है और सामान्य मामले भी पूरी तरह से अनियंत्रित होकर पूरे प्रदेश के लिए एक बड़ी समस्या बन जाते हैं जिसका सीधा असर सामाजिक ताने बाने पर भी पड़ता है.
                                       ताज़ा मामले में खुर्जा के सेहड़ा फरीदपुर गाँव में एक बार फिर से दलित किशोरी से छेड़ छाड़ की घटना में पुलिस जिस तरह से मान मनौव्वल में ही लगी रही और तीन लोगों की जानें चली गयीं वह इसी बात की तरफ इशारा करता है कि या तो यूपी पुलिस की ट्रेनिंग में ही कोई कमी है या फिर वह बुरी तरह से राजनैतिक दबाव में ही सदैव काम करती रहती है क्योंकि इस तरह के मामलों में पुलिस की राजनैतिक दबाव को मानने की नीति के चलते ही आज भी मुज़फ्फरनगर में लोग खुले आसमान के नीचे भयंकर ठण्ड में किसी तरह जीने की कोशिशें करते नज़र आ रहे हैं और पुलिस और यूपी सरकार की नज़रों में सब कुछ ठीक ठाक ही है ? केवाल गाँव और उसके बाद की इतनी बड़ी घटना के बाद भी पुलिस और यूपी सरकार की समझ में यह आज तक नहीं आ पाया है कि पूरे प्रदेश में महिलाओं और लड़कियों के खिलाफ अपराध बढ़ते ही जा रहे हैं फिर भी उनसे निपटने का अभी भी कोई कारगर तरीका नहीं ढूँढा जा सका है.
                                      पिछले कुछ वर्षों से जिस तरह से यूपी पुलिस में महिला सिपाहियों की भर्ती की गयी उससे यह आशा लगायी जा रही थी कि आने वाले समय में प्रदेश में महिलाओं के ख़िलाफ़ होने वाले अत्याचारों पर कुछ हद तक अंकुश लग पायेगा पर स्थिति के ठीक होने के स्थान पर और भी अधिक बिगड़ने से यही लगता है कि कहीं न कहीं यूपी पुलिस सामान्य पुलिसिंग पर भी ध्यान नहीं दे पा रही है और उसकी इस कमज़ोरी का लाभ असामाजिक तत्व अपने अनुसार उठाने में लगे हुए हैं ? यह सही है कि अचानक से अराजक हुई भीड़ के सामने पुलिस भी एकदम से थोड़े से बल प्रयोग से कुछ भी हासिल नहीं कर सकती है पर जब मामले एक दो दिन या पूरे दिन तक चलते रहें और तब भी पुलिस इस तरह से कुछ ठोस करने के स्थान पर केवल पक्षों को समझाने का प्रयास ही करती रहे तो सामजिक सद्भाव पर तो आंच ही आनी है. जब समझाने की ज़रुरत होती है तो बल प्रयोग किया जाता है और जब सख्ती की अपेक्षा की जाती है तो मनाने का काम किया जाता है क्योंकि अभी तीन दिन पहले ही विधान भवन पर आयोजित गणतंत्र दिवस समारोह के बाद जलपान के समय यूपी पुलिस ने विधायकों समेत प्रदेश के आला अधिकारियों के साथ धक्का मुक्की की थी. अब अखिलेश को यूपी के पुलिस महानिदेशक से एक बात पुलिस को स्पष्ट रूप से कहनी ही होगी कि वे अपना काम ठीक से करें पर पता नहीं वे किस बात का इंतज़ार कर रहे हैं.     
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