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Sunday, 9 August 2015

भगाना - दलित, कानून और जातिवाद

                                                                    दो साल पहले हरियाणा के हिसार जनपद के भगाना गाँव में दलित लड़कियों के साथ हुए बलात्कार के बाद जिस तरह से उनको किसी भी स्तर पर आशानुरूप न्याय नहीं मिल पा रहा था उसके बाद पहले उन्होंने घर छोड़ने के बाद अब अपना धर्म छोड़ने तक का सफर भी तय कर लिया है. दिल्ली में जंतर मंतर पर चल रहे धरने में ही लगभग सौ दलित परिवारों ने हिन्दू धर्म छोड़ते हुए पूरे रीति रिवाज से इस्लाम धर्म को अपना लिया है जिसके बाद समाज की उस क्रूर मानसिकता और हज़ारों वर्षों से भारतीय समाज में व्याप्त जाति व्यवस्था का यह विद्रूप चहेरा भी सामने आया है. इस सबके बीच सबसे चिंता की बात यह है कि देश के किसी भी राजनैतिक दल में इन दलितों और प्रताड़ित किये गए वंचितों के प्रति कोई चिंता या संवेदनशीलता दिखाई नहीं देती है उसका संभवतः सबसे बड़ा कारण यही है कि अभी भी हरियाणा में दलित राजनीति उतने बड़े स्तर पर लाभकारी नहीं हुई है जैसी वह यूपी और बिहार में नेताओं को सत्ता के शिखर तक पहुँचाने में सक्षम है. ऐसे मामलों पर अपने वोट बैंक का ख्याल रखते हुए दोहरा रवैया अपनाने वाले कांग्रेस और भाजपा से इतर बसपा ने भी इस मसले पर कुछ ख़ास करने की कोशिशें नहीं की क्योंकि यदि इन पीड़ितों को कुछ सहारा मिला होता तो आज उनके सामने ऐसी परिस्थितियां ही न आई होतीं और वे सम्मान के साथ भगाना में ही रह रहे होते.
                             समाज और नेताओं के दोहरे रवैये का सभी को इस बात से ही अंदाज़ा हो जाना चाहिए जिसमें लगभग उसी समय यूपी के बदायूं कांड ने पूरे देश और दुनिया तक की ख़बरों में स्थान पाया पर भगाना के इन दलितों की बेटियों पर हुए अत्याचार को राष्ट्रीय स्तर पर किसी ने भी वह महत्व नहीं दिया जो उसे दिया जाना चाहिए था. राज्य बदलने से देश की मानसिकता नहीं बदलती है और ऐसे हज़ारों उदाहरण देखे जा सकते हैं जिनमें दलितों और आर्थिक रूप से पिछड़ों को भी इसी तरह की समस्याओं का निरंतर सामना करना पड़ता है. यहाँ पर भगाना और जाटों के दलितों पर अत्याचार का ज़िक्र करने का कोई मतलब इसलिए भी नहीं बनता है क्योंकि यही काम देश एक अन्य भागों में अन्य उच्च वर्गीय और आर्थिक रूप से संपन्न जातियां भी निरंतर करती ही रहती हैं. यह ऐसी मानसिकता है जिसके साथ देश के दलित जीने को आज भी मजबूर हैं पर क्या इन समस्याओं से कोई उन्हें छुटकारा दिला सकता है ? आज देश की व्यवस्था को यह सोचने की आवश्यकता भी है क्योंकि जो समर्थ है वह आवश्यकता पड़ने पर सुविधानुसार बहुत ही आसानी से अत्याचारी भी हो जाता है और यह मानसिकता आज देश की जातीय व्यवस्था के शीर्ष पर बैठे हुए लोगों को देखकर पता चल जाती है.
                             सरकारों के बदलने से भी दलितों की स्थिति पर जातीय समीकरणों के चलते कोई ख़ास असर नहीं पड़ता है क्योंकि भगाना का अत्याचार हरियाणा और केंद्र में कांग्रेस की सरकारों के रहते शुरू हुआ था पर अब दोनों जगहों पर सरकारें बदलने और भाजपा के सत्ता में आने के बाद भी किसी सरकार ने इनकी सुध नहीं ली है क्योंकि जाटों के बड़े वर्ग को इस मुद्दे पर नाराज़ कर पाना संभवतः इन दोनों दलों की राजनैतिक परिस्थितियों पर ही असर डालने वाला साबित हो सकता है. वैसे तो देश में केंद्र और राज्य स्तर पर बहुत सारे आयोग गठित किये गए हैं पर इस मसले पर किन आयोगों ने किस स्तर पर इन दलितों के पक्ष में खड़े होना पसंद किया है यह किसी को नहीं पता है न्याय मिलना अलग बात है पर आज के आधुनिक समाज में जब हम डिजिटल इंडिया और स्किल इंडिया जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर सोचना शुरू कर चुके हैं तो क्या हमारी यह पुरातनपंथी जातिवादी सोच पूरे देश का दुनिया में उपहास उड़ाने के लिए काफी नहीं है ? अच्छा हो कि इस मसले पर बराबरी और सख्ती से काम किया जाये और सभी को बराबरी का जो वायदा हमारे संविधान में किया गया है उसे निभाने के लिए सभी सम्बंधित पक्ष खुलकर काम करना शुरू कर सकें. 
                              एक तरफ से जातीय व्यवस्था का शिकार हुए इन लोगों ने आसानी के साथ इस्लाम धर्म को अपना लिया है वहीं अब इस मुद्दे पर हरियाणा सरकार और भाजपा के द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर इसे मुद्दा बनाये जाने की संभावनाएं भी नज़र नहीं आती हैं क्योंकि इसमें हमारे हिन्दू समाज का एक वह चेहरा एक बार फिर से सामने आ गया है जिसमें हम हज़ारों वर्षों से साथ चल रहे अपने उन लोगों को भी सम्मान नहीं दे सकते हैं जिनकी पीढ़ियों ने हमारी चाकरी करते हुए समय गुज़ार दिया है. हालाँकि इन दलितों को यह भी पता है कि आने वाले समय में इस्लाम में भी उनके लिए सब कुछ एकदम से सही नहीं होने वाला है क्योंकि धर्म परिवर्तन भी उन्हें उनके पुराने स्थान पर बसने और सर वहां पर उठाकर जीने की कोई गारंटी नहीं दे सकता है. आज यह हिन्दू समाज के सोचने का समय इसलिए भी है कि आखिर कब तक उसके प्रभावी लोग अपने पर वर्षों से आश्रित रहे लोगों पर इस तरह से मनमानी करते रहेंगें और कब समाज में उस स्तर का परिवर्तन देखने को मिलेगा जब न्याय न मिलने के कारण कोई इस तरह से धर्म परिवर्तन करने के बारे में सोचना बंद करेगा ? सभी धर्म और जातियों से ही समाज पूरा होता है और अब देश में इस बात पर भेदभाव करने के स्थान पर आगे बढ़कर सोचने का समय आ गया है जो प्रभावशाली हैं उनके लिए यह अधिक महत्वपूर्ण होना चाहिए कि समाज की व्यवस्था में अभी तक चाहे कुछ भी चलता रहा हो पर अब समय आ गया है कि हम सभी को साथ लेकर उनकी शिक्षा और जीवन स्तर को सुधारने के बारे में सोचना शुरू करें. देश समाज की इन छोटी छोटी कड़ियों से ही मज़बूत होता है और आखिर कब तक हम में से कुछ प्रभावशाली लोग समाज की सभी कड़ियों को मज़बूत करने के स्थान पर कुछ को कमज़ोर करने की प्राचीन मानसिकता के साथ जीते रहेंगें ?        
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

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