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गुरुवार, 22 जनवरी 2015

बाघों की बढ़ती संख्या

                                                     आज जहाँ पूरे विश्व में बाघों की घटती संख्या को लेकर चिंताएं जताई जा रही हैं वहीं भारत में पिछले तीन वर्षों में जिस तरह से तीस प्रतिशत बाघों के बढ़ने की ख़बरें आई हैं वे निश्चित तौर पर बहुत ही अच्छी खबर है. ऐसा नहीं है कि देश में इस तरफ कुछ गंभीर प्रयास नहीं किये जा रहे थे पर इन सब प्रयासों के बाद भी जिस तरह से वन विभाग के ज़िम्मेदार लोगों द्वारा की जा रही लापरवाही के चलते निचले स्तर पर व्याप्त भ्रष्टाचार के कारण इनका लगातार शिकार भी किया जाता रहता था अब उनमें कमी आने के चलते ही यह संभव हो पाया है. निश्चित तौर पर यह देश के वन जीव संरक्षण से जुड़े हुए लोगों की बेहतर रणनीति और विभागों के साथ बेहतर समन्वय के चलते ही संभव हो सका है आज भी देश के विभिन्न बाघ अभ्यारणों की स्थिति बहुत अच्छी नहीं कही जा सकती है जिससे अभी भी हम वह संख्या प्राप्त कर पाने में सफल नहीं हो पा रहे हैं जिसके बाद यह कहा जा सके कि कम से कम भारत में बाघों की प्रजाति पर कोई संकट नहीं बचा है.
                                  यदि पिछले वर्षों में इन अभ्यारणों को लेकर किये जाने वाले प्रयासों पर गौर किया जाये तो एक बात सामने आती है कि बाघों के बढ़ने की रफ़्तार तो वही है पर अब उनके संरक्षण को सही रूप में करने की दिशा में काम शुरू हो गया है. इस मामले में जहाँ इस क्षेत्र में सक्रिय अनेक एनजीओज की भूमिका बहुत ही महत्वपूर्ण है वहीं राज्य सरकारों के इस दिशा में सोचने से भी मामला आगे बढ़ता दिखाई देने लगा है. आज भी देश के सुदूर जंगलों वाले क्षेत्रों में नए बाघ और अन्य अभ्यारण्य बनाने की दिशा में काम किये जाने की बहुत आवश्यकता है जिससे इनके संरक्षण को उचित दिशा में आगे बढ़ाने में सफलता पायी जा सके हाल में जिस तरह से यूपी में कई स्थानों पर बाघों के आबादी वाले क्षेत्रों में आने जाने का सिलसिला बढ़ा है वह भी रोकने की बहुत ज़रुरत है क्योंकि जब तक इनकी संख्या बढ़ने के साथ इनके रहने लायक उपयुक्त स्थानों की व्यवस्था भी हमारे स्तर से नहीं की जाएगी तो ये संघर्ष का सिलसिला चलता ही रहने वाला है और इससे कहीं न कहीं बाघों की संख्या पर भी इसका असर दिखाई देने वाला है.
                               देश की जैव विविधता को बचाये रखने के लिए आज जिस स्तर पर प्रयास करने की आवश्यकता है हम कहीं सभी वह तक नहीं पहुँच पा रहे हैं जिसके चलते भी समस्या बढ़ती ही जा रही है. इस पूरे प्रयास में अब केंद्र राज्य सरकार वन्यजीव संरक्षण से जुड़े संगठन और जनता के समग्र प्रयासों की बहुत आवश्यकता पड़ने वाली है क्योंकि जब तक हम आम जनता के मन में इस तरह की भावना नहीं भर पायेंगें कि उन्हें भी अपने आसपास के पर्यावरण और वन्यजीवों की रक्षा के बारे में सोचना है तब तक कोई भी प्रयास पूरी तरह से सफल नहीं होने वाले हैं. जन जागरूकता से ही बाघ और अन्य जीवों के संरक्षित क्षेत्रों से लोगों को जागरूक किया जा सकता है और जब तक इस दिशा में काम नहीं हो पाता है तब तक यह अनावश्यक संघर्ष भी बाघों और अन्य जीवों की जान के लिए खतरा ही बने रहने वाले हैं. जब इन संरक्षित जीवों और मानव के क्षेत्रों को सख्ती के साथ अलग कर दिया जायेगा तो किसी भी बाघ का मानव बस्ती में हस्तक्षेप कम हो जायेगा साथ ही मानव को इन संरक्षित क्षेत्रों से अलग रखने के हर संभव प्रयास करने की भी बहुत आवश्यकता है.         
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बुधवार, 5 मई 2010

शेरों की संख्या बढ़ी

बहुत दिनों के बाद वन्य जीव प्रेमियों के लिए गुजरात से बहुत अच्छी खबर आई है. गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने शेरों की संख्या के बारे में बताया कि २००५ के मुकाबले इनमें ५२ की वृद्धि हुई है. जिस तरह से गुजरात में सरकार और लोगों ने मिलकर जंगल के राजा की देखभाल की है उससे सारे देश को प्रेरणा लेनी चाहिए क्योंकि बहुत से खतरे में पड़ चुके जीवों के लिए अब सरकारी प्रयासों के साथ जन जागरूकता की बहुत आवश्यकता है. गिरि के शेरों के लिए इससे अच्छी बात क्या हो सकती है कि सरकार के साथ वहां के लोगों को भी उनके द्वारा किया जा रहा नुकसान रास आ रहा है. जल्द ही सरकार को इन लोगों के लिए कुछ ऐसा कर देना चाहिए कि किसी के जानवर को शेरों द्वारा खाए जाने पर उनको शीघ्र मुआवजा दे दिया जाये और उनके लिए अन्य मवेशियों की व्यवस्था करने में पशुपालन विभाग भी अपनी ज़िम्मेदारी निभाए. जब लोगों को लगेगा कि वे अब शेरों के साथ रह सकते हैं तो उनका शिकार अपने आप ही कम हो जायेगा.
वन्य जीव प्रेमियों के लिए यह बात भी काफी सुकून पहुँचाने वाली हो सकती है कि इन शेरों में अब जवान और बच्चों की संख्या काफी अधिक है. ९७ नर और १६२ मादाओं के साथ इनका लिंग अनुपात भी पहले के मुकाबले अच्छा हो गया है. इनमें से ७७ बच्चे १ साल से कम और ७५ अन्य १ से ३ साल के बीच के हैं. २००५ के बाद नए बनाये  गए गिरिनार अभ्यारण्य को भी शेरों ने खूब पसंद किया है यहाँ पर अब शेरों की संख्या २४ है. लगभग ७४ के करीब शेर गिर राष्ट्रीय अभ्यारण्य के बाहर महुवा और पालिताना में भी घूमते हुए पाए गए हैं. शेरों के पक्ष में सबसे भावनात्मक बात वहां के नागरिकों ने कही जिसे मोदी ने अपनी बात में सबके सामने रखा. लोगों ने कहा कि शेर हमारा चाहे जितना नुकसान करते रहें हमें मंज़ूर हैं पर मध्य प्रदेश को कोई भी शेर नहीं दिया जाये तभी वे मुख्यमंत्री की बातों पर विचार करेंगें. लोगों की नब्ज़ पकड़ने में माहिर मोदी ने तुरंत ही हामी भरकर देश में शेरों की संख्या में अप्रत्याशित बढ़ोत्तरी दर्ज करने में सफलता प्राप्त की है. ज़ाहिर है कि इसमें सरकारी प्रयासों के साथ नागरिकों की भागीदारी ने बहुत बड़ा योगदान दिया है.      

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