मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Tuesday, 30 July 2013

तेलंगाना और सियासत

                         देश में बड़े राज्यों के प्रशासनिक कारणों से बंटवारे की मांग लगातार ही वहां के निवासियों और नेताओं द्वारा की जाती रही है पर जिस तरह से इन मसलों से निपटने की इच्छा शक्ति हमारे देश के राजनैतिक दलों और नेताओं को दिखानी चाहिए वह हमेशा से ही नदारत रहा करती है जिससे किसी का भी भला नहीं हो पाता है क्योंकि छोटे राज्य किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकते हैं हाँ यदि संसाधनों के बेहतर प्रबंधन पर ध्यान दिया जाए तो बड़े राज्यों में भी तेज़ी से विकास की धारा को आगे बढ़ाया जा सकता है. छोटे राज्यों के नाम पर बनाये गए उत्तरांचल और झारखण्ड का समस्याओं ने जिस तरह साथ नहीं छोड़ा उसके लिए वहां पर राज करने वाले दलों और नेताओं को ही दोषी ठहराया जाना चाहिए न कि राज्यों के भौगोलिक ढांचे को क्योंकि जिस बिहार में कभी विकास एक सपना हुआ करता था उसने भी पिछले कुछ समय में अपने आप विकास की तेज़ गति को हासिल करने की दिशा में प्रयास कर सफलता पाई है. विकास को जब केवल राजनैतिक वायदों और महत्वाकांक्षाओं के साथ ही देखा जाता है तो समस्याएं कम होने के स्थान पर बढ़ ही जाती हैं.
                       आज़ादी के समय जिस तरह से देश के पास संसाधनों के साथ हर तर के विकास को करने के लिए धन की बेहद कमी होती थी तब प्रशासनिक खर्चों को नियंत्रित रखने के लिए बड़े राज्यों को ही प्राथमिकता दी गई थी पर आज जब देश ने विकास के नए आयाम पाने की तरफ छलांग लगा दी है और हमारे पास इस विकास के मद में खर्च करने के लिए आवश्यक धन भी उपलब्ध है तो पूरे देश में प्रशासनिक आवश्यकतों और बेहतर पहुँच के साथ राज्यों के एक बार से पुनर्गठन की बहुत बड़ी आवश्यकता है क्योंकि आज भी देश के कई राज्यों में बहने वाली बाद नदियों पर पुल आदि न होने के कारण उन स्थानों तक सरकारों की पहुँच ही नहीं हो पाती जहाँ पर उसे आसानी से अपनी उपस्थिति दर्ज करने की आवश्यकता है ? जब इस तरह से सरकारों द्वारा किसी क्षेत्र की अवहेलना की जाती है तो वहां पर असंतोष पनपने लगता है जिसका लम्बे समय तक कोई हल नहीं निकल पाता है और राज्य के विकास पर भी उसका दुष्प्रभाव पड़ने लगता है.
                       वर्तमान में कांग्रेस जिस तरह से तेलंगाना के साथ दो अन्य जिलों को भी जोड़कर आंध्र का दो बराबर हिस्सों में विभाजन चाहती है उसमें कोई बुराई नहीं है क्योंकि यदि इन दो जिलों को केवल क्षेत्र के स्थान पर प्रशासनिक दक्षता बढ़ाने के लिए तेलंगाना में शामिल किया जा रहा है तो उससे प्रदेश का बराबर से बंटवारा भी हो जायेगा और कुछ हद तक संसाधनों के बंटवारे पर भी परिस्थितियां अनुकूल की जा सकेंगीं. जब राजग का कार्यकाल में तीन अन्य राज्यों को बनाया गया था तो यदि उस समय भी क्षेत्रवाद के स्थान पर यूपी, एमपी और बिहार का बराबर से विभाजन किया जाता तो तब इन अस्तित्व में आए नए छह राज्यों के पास विकास के बेहतर विकल्प भी होते. आज देश की आवश्यकता केवल राज्यों के विभाजन के स्थान पर राज्यों में प्रशासनिक दक्षता को बढ़ाने के अनुसार विभाजन करने कि होनी चाहिए और उसके लिए एक राज्य पुनर्गठन आयोग के बारे में विचार किया जाना चाहिए और उसे अगले ५ वर्ष दिए जाने चाहिए जिससे वो पूरे देश का दौर कर राज्यों में उनके भौगोलिक स्वरुप के कारण आने वाली समस्याओं से निपटने के बारे में विचार कर अपनी राय दे सके पर राजनीति की रोटियां पकाने में लगे हमारे नेता इस बारे में कुछ भी सोचने के स्थान पर केवल उनका तात्कालिक हल निकालने पर ही सोच पाते हैं. 
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

2 comments:

  1. अब जब भी घर जायेंगे, दूरी तो उतनी ही रहेगी, रास्ते में दो राज्य और बढ़ जायेंगे।

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  2. इन तेरह वर्षो मे छत्तीसगढ का समग्र नही तो संतोषजनक विकास तो हुआ ही है । बिजली की उपलब्धता 24*7 है सडको के मामले मे स्थिति अच्छी हुई है । करीब दो लाख लोगो को सरकारी नौकरी मिली है ।किसानो की हालत बेहतर हुई है ,राज्य मे राजनैतिक स्थिरता है
    कुल मिलाकर हम अपने राज्य से संतुष्ट है

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