मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

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शुक्रवार, 19 अगस्त 2016

साक्षी - मोखरा और चुनौतियाँ

                                          रियो ओलंपिक में चल रहे पदकों के सूखे में भारत का खाता खोलने के लिए जिस तरह से साक्षी मालिक ने अपने दमखम का प्रदर्शन किया उसके बाद अब वह पूरे देश के लिए एक रोल मॉडल बन चुकी है और खास तौर पर खाप पंचायतों के निर्णयों के लिए अक्सर ही सुर्ख़ियों में रहने वाले राज्य हरियाणा और विशेषकर रोहतक जिले के लिए यह जीत एक बड़े परिवर्तन का दौर भी शुरू कर सकती है. खेलों में हरियाणा के लोगों में जूनून की हद आसानी से देखी जा सकती पर पर मान्यताओं में जकड़े हुए राज्य में एक लड़की के इस तरह के दमदार प्रदर्शन के बूते अब राज्य की उस समस्या पर भी आम लोगों और खापों के निर्णयों पर कितना पड़ेगा यह तो आने वाले समय में ही पता चलेगा पर पदकों के खाते को खोलने की शुरुवात जिस तरह से एक रूढ़िवादी समाज की साधारण सी लड़की ने की है जिसके पिता डीटीसी में परिचालक और माता आंगनवाड़ी सुपरवाइज़र हैं वह देश के लिए गर्व की बात ही है. खेलों में लगन किसी को भी उसके लक्ष्य तक कैसे पहुंचा सकती है यह साक्षी से आसानी से सीखा भी जा सकता है. 
                                         साक्षी की उपलब्धि इस मायने में और भी महत्वपूर्ण हो जाती है कि उसके दादाजी अपने गाँव में ही शौकिया तौर पर पहलवानी किया करते थे पर उन्होंने कभी इसको अपने लिए एक अवसर बनाने का प्रयास नहीं किया उनकी पोती ने जिस तरह से आगे बढ़कर कुश्ती में प्रदेश और देश का सम्मान बढ़ाया है वह अपने आप में गर्व करने लायक है. साक्षी की यह जीत और उपलब्धि निश्चित तौर पर हरियाणा के उन गांवों में लड़कियों के प्रति उस सोच को बदलने का काफी हद तक काम कर सकती है जहाँ आज भी लिंगानुपात बेहद ख़राब स्तर पर पहुंच हुआ है. खुद साक्षी के गाँव मोखरा की २०११ के जनगणना की तस्वीर पूरे हरियाणा से भी बहुत भयावह थी. हरियाणा में १०००/८३२ के लिंगानुपात के मुक़ाबले इस गांव में १०००/८०० का ही अनुपात रिकॉर्ड में दर्ज है. हालाँकि २०१६ के कुछ आंकड़े अब पूरे हरियाणा में सुधार की तरफ इशारा कर रहे हैं जिसके साथ मोखरा भी उपलब्धियों की तरफ बढ़ गया है और वहां भी लिंगानुपात पहले से सुधरा हुआ दिखाई देने लगा है.
                                  साक्षी की उपलब्धि खुद उसकी अपनी मेहनत और लगन का परिणाम है और वह उस पीढ़ी की लड़कियों से आती है जब हरियाणा में लड़कियों के लिए दुनिया में आना ही एक चुनौती हुआ करता था तो उसके इतने आगे बढ़ने के साथ ही अब समाज को अपनी उस पुरातनपंथी सोच पर भी विचार करना होगा जिसके चलते लड़कियों को जन्म लेने के साथ ही अशुभ माना जाता है और केवल झूठे सामाजिक मान के लिए भ्रूण हत्या करने तक से परहेज़ नहीं किया जाता है. निश्चित तौर पर कड़े कानूनों के चलते स्थितियों में परिवर्तन हुआ है और आने वाले समय में इसमें और भी अधिक सुधार होने की संभावनाएं भी हैं. साक्षी सही मायने में बेटी बचाओ आंदोलन की ब्रांड अम्बेसडर बनने के लिए सबसे उपयुक्त है क्योंकि वह उस समाज के रूढ़िवादी हिस्से से आती है जहाँ पर सुधार की सबसे अधिक संभावनाएं भी हैं. बेटियां बेटों से किसी मामले में कम नहीं होती हैं और इस बात को साक्षी ने साबित करके दिखा भी दिया है इसलिए अब समाज और सरकार की यह ज़िम्मेदारी बनती है कि पूरे देश में लड़कियों को खेलों की तरफ अच्छी तरह से बढ़ाने और उनको अंतर्राष्ट्रीय स्तर का खिलाडी बनाने के लिए बारे में ज़िले स्तर पर सही कार्ययोजनाएं बनायीं जाएँ जिससे आने वाले समय में साक्षी जैसी लड़कियां समाज के हर हिस्से में अपनी उपलब्धियों को दर्ज करवा सकें.   
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शनिवार, 18 जुलाई 2015

आईपीएस शिवदीप वामन लांडे

                                         बिहार कैडर और महाराष्ट्र के मूल निवासी आईपीएस अधिकारी शिवदीप लांडे के बच्चियों को बचाने के लिए अलग तरह से प्रयास करते हुए देखना बहुत ही सुखद लगता है क्योंकि आज समाज में बड़े स्तर के अधिकारियों और पुलिस की छवि ही कुछ इस तरह की बन चुकी है जिसमें आम लोग उन पर कम ही भरोसा किया करते हैं. महिलाओं और लड़कियों के साथ ही बच्चियों को लगातार बचाने की कोशिशें करते रहने के कारण आज शिवदीप बिहार पुलिस का एक बेहतर मानवीय चेहरा बनकर भी उभरे हैं जिससे पूरे देश की पुलिस को सबक सीखने की आवश्यकता भी है. आज देश के किसी भी राज्य के थाने में महिलाएं जाने से डरा ही करती हैं संभवतः उसके लिए समाज में पुलिस द्वारा अपनी बनायीं गयी छवि ही अधिक ज़िम्मेदार है और दुखद बात यह भी है कि पुलिस में भी बहुत अच्छे लोगों के होने के बाद भी आज तक आम लोगों का भरोसा उस पर कहीं से भी बढ़ता दिखाई भी नहीं देता है जो बेहतर प्रशासन के लिए पुलिस के लिए खुद ही बड़ा सरदर्द साबित होता रहता है क्योंकि आम लोग पुलिस के साथ समाज की कोई भी बात साझा नहीं करना चाहते हैं.
                                    बिहार में पिछड़ेपन के कारण आज भी नवजात बचिचियों को लावारिस हालत में कहीं भी छोड़ देने की घटनाएँ आमतौर पर हुआ ही करती हैं तो इस सम्बन्ध में शिवदीप ने अपने स्तर से एक काम करना शुरू किया जिसमें ऐसी लावारिस हालत में मिली किसी भी नवजात बच्ची को प्राथमिक चिकित्सा और उचित माहौल देने का प्रयास करना शुरू किया गया जिसके सकारात्मक परिणाम भी सामने आने लगे हैं तथा रोहतास जिले में लोग उनके इस काम की तारीफ भी करने लगे हैं. इससे पहले उन्होंने स्कूल जानी वाली बच्चियों के सामने आने वाली समस्या पर भी अपनी पहले की पोस्टिंग्स में ध्यान दिया था जिससे असामाजिक तत्वों की हरकतों पर लगाम लगाने में भी पुलिस को सफलता मिली थी. आज जिस तरह से के अधिकारी के थोड़ा संवेदनशील होने से ही एक जिले और काफी हद तक बिहार के अन्य भागों में भी इस तरह की सोच विकसित होनी शुरू हुई है तो इसके लिए शिवदीप का योगदान कम नहीं कहा जा सकता है क्योंकि बिहार जैसे मीडिया में अधिक बदनाम राज्य में ही ज़मीनी स्तर पर सुधार की बहुत आवश्यकता भी है जिसे अविलम्ब शुरू किया जाना चाहिए.
                                 ऐसा नही है कि देश के अन्य हिस्से आज भी महिलाओं और बच्चियों के लिए पूरी तरह से सुरक्षित ही हैं पर इस तरह की शुरुवात अपने आप में बहुत सही कही जा सकती है. यदि सरकारें अपने स्तर से प्रयास कर पुलिस और स्थानीय प्रशासन को इस बात के लिए निर्देशित करें तो लावारिस हालत में मिलने वाली बच्चियों को प्राथमिक उपचार के बाद सही हाथों में सौंपा भी जा सकता है. किसी भी अधिकारी के व्यक्तिगत प्रयासों से मिलने वाली सफलता और सामाजिक लाभ को यदि संस्थागत रूप से लागू करने की तरफ ध्यान दिया जाने लगे तो उस अधिकारी के स्थान विशेष से जाने के बाद भी स्थितियां वैसी ही संवेदनशील रह सकती है वर्ना पुलिस को भी अपने पुराने चरित्र में लौटने में समय कहाँ लगता है. ज़िम्मेदारियों के बोझ में उन पर यदि सामाजिकता का थोड़ा सा भार भी डाला जाये तो शायद इससे ही हमारी पुलिस फ़ोर्स में कुछ संवेदनशीलता का स्थायी समावेश भी हो सके. साथ ही उन अभिभावकों को भी कोई सीख दी जा सके जो किसी भी परिस्थिति में नवजात बच्चियों के साथ ऐसा व्यवहार किया करते हैं. सामाजिक सुधार पूरे समाज में बदलाव के साथ ही किया जा सकता है उसके लिए किसी भी स्तर पर अलग अलग मानक नहीं बनाये जा सकते हैं.   
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सोमवार, 4 मई 2015

पुत्र जीवक बीज और विवाद

                                         दो तीन माह पहले आयुर्वेद के प्राचीन ग्रन्थ भाव प्रकाश निघन्टु में वर्णित पुत्रजीवक बीज को लेकर सोशल मीडिया पर जिस तरह का अभियान शुरू हुआ था वह अब संसद तक पहुँच गया है क्योंकि इस औषधि के माध्यम से नेताओं को स्वामी रामदेव पर प्रत्यक्ष हमला करने का अवसर मिला है और इस हमले को नेता लोग अपरोक्ष रूप से मोदी तक ले जाना चाहते हैं. मोदी पर राजनैतिक कारणों से हमले करने के राजनीति में बहुत सरे अन्य अवसर भी आने वाले हैं तो इस तरह से आयुर्वेद को घटिया राजनीति में मोहरा बनाने की किसी भी कोशिश का पूरी तरह से विरोध किया जाना चाहिए. यह सही है कि इसके नाम को भारतीय संविधान की धारा १४/१५ का आज के अनुसार स्पष्ट उल्लंघन भी कहा जा सकता है जिसमें धर्म, जाति, समूह, भाषा लिंग आदि के आधार पर किसी के साथ किसी भी तरह का भेदभाव देश में स्वीकार नहीं किया जा सकता है. आज जिस तरह से इस मामले को लेकर राजनीति शुरू हो गयी है वह देश के लिए दुर्भाग्यपूर्ण ही है क्योंकि केवल इसके नाम को लेकर ही जिस तरह का हल्ला मचाया जा रहा है वह इस बात को स्पष्ट कर देता है कि इस मुद्दे को राजनैतिक कारणों से हवा दी जा रही है जो कि स्पष्ट रूप से संविधान की ही व्यक्तिगत स्वतंत्रता की भावना का भी उल्लंघन ही है. देश में बहुत सारे अन्य ज्वलंत मुद्दे हैं जिन पर संसद में बहस होनी चाहिए न कि इस तरह के मुद्दों पर जिनको बेवजह मुद्दा बनाने की कोशिशें हो रही हैं.
                              भाव प्रकाश निघन्टु अपने आप में आयुर्वेद का बहुत मानक ग्रन्थ है और इसमें ही पुत्रजीवक बीज का वर्णन किया गया है जहाँ पर इस बात का कहीं भी उल्लेख नहीं है कि इसके सेवन से केवल पुत्र ही पैदा होते हैं. वहां पर इसका उल्लेख स्त्री रोगों और बन्ध्यत्व को लेकर किया गया है जो कि आज भी संतान प्राप्ति में बहुत सारे लोगों के लिए लाभकारी साबित होता है. आयुर्वेद में सदैव से ही इस बात का चलन है कि जो भी योग किसी भी ग्रन्थ में वर्णित है उसे उसके नाम से ही बनाया जाता है और साथ ही यह भी लिखा जाता है कि यह औषधि किस प्रामाणिक ग्रन्थ के आधार पर तैयार की गयी है और आज बाजार में बहुत सारी आयुर्वेदिक कंपनियां आज भी इसी मानक का पालन करते हुए औषधियों का निर्माण कर ग्रंथों के नाम भी लिखती हैं. वैज्ञानिक आधार पर यदि देखा जाये तो गुणसूत्रों के आधार महिला की तरफ से लिंग निर्धारण में एक जैसे ही गुणसूत्र होते हैं जबकि पुरुष की तरफ से आने वाले गुणसूत्र ही बच्चे के लिंग निर्धारण का निर्णय करते हैं तो किसी भी महिला को यह औषधि खिलाने से केवल पुत्र ही कैसे पैदा हो सकते हैं इस बात को आज के वैज्ञानिक युग में समझने की बहुत आवश्यकता है. यदि आज के आधुनिक विज्ञान को माना जाये तो इस तरह की औषधि से पुत्र की प्राप्ति केवल संयोग ही हो सकती है पर इस नाम का दुरूपयोग कर किसी को ठगने की अनुमति भी नहीं दी जा सकती है.
                            अब इस बात पर ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है कि आखिर प्राचीन समय में इसका नामकरण इस तरह से क्यों किया गया तो भारतीय समाज की सदैव ही पुत्र प्राप्ति की इच्छा के साथ इसे जोड़कर देखा जाना चाहिए क्योंकि भले ही हम कितने भी आधुनिक होने का ढंग क्यों न कर लें पर कितने लोग ऐसे हैं जो घर में पुत्री के जन्म पर भी उसी तरह से दिल से प्रसन्न होते हैं जितना पुत्र के जन्म पर ? यह सवाल बहुत कड़वा और चुभने वाला है क्योंकि पुत्र से कुल चलने की बातें सोचकर बैठे हुए लोग आखिर किस तरह से एक ऐसी औषधि को आसानी से स्वीकार करते जो उनके झूठे अहम को संतुष्ट ही नहीं कर सकती हो ? आयुर्वेद अधिकांश समय राज्याश्रित भी रहा है क्योंकि किसी भी आयुर्वेद से जुड़े हुए व्यक्ति के लिए शोध करना उस समय भी इतना ही कठिन काम था जितना यह आज भी है इसलिए मात्र पुत्रजीवक नाम होने से इस बात को कटघरे में किसी को खड़ा करने से पहले हमें खुद अपने अंदर झांक कर देखना चाहिए कि कैसे आम भारतीय के मन में पुत्र प्राप्ति की उत्कंठा आज भी रहा करती है ? सामाजिक दबाव में यदि हज़ारों वर्ष पहले भी समाज ने इस तरह के नाम को स्वीकार किया था तो आज किस आधार पर इससे पल्ला झाड़ा जा सकता है और एक बात और भी विचारणीय है कि क्या संसद और सरकार के पास इस बात के अधिकार हैं भी कि वे किसी आयुर्वेद के ग्रन्थ या संहिता में वर्णित किसी भी योग का नाम केवल राजनैतिक विरोध के चलते ही बदलने की कोशिश करने लगें ? पुत्रजीवक बीज तो हज़ारों वर्षों से अस्तित्व में है और बन्ध्यत्व में इसके प्रयोग से हज़ारों महिलाओं को बाँझ जैसे शब्दों से मुक्ति मिली है फिर भी इस पर हमला करने से क्या हसिल होने वाला है जबकि इस तरह से देखा जाये तो पूरे देश में ही लिंग अनुपात बिगड़ने का काम केवल अल्ट्रासाउंड सुविधा आने के बाद से ही व्यापक स्तर पर शुरू हुआ तो क्या कल कोई सांसद इस आधार पर ही पूरे देश में अल्ट्रासाउंड जांच पर लिंग निर्धारण में दोषी होने के कारण प्रतिबन्ध लगवाने की मांग कर सकता है ?   
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शुक्रवार, 23 जनवरी 2015

बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान

                                                           केंद्र सरकार की तरफ से पूरे देश में महिला पुरुष लिंगानुपात सुधारने के लिए हरियाणा के पानीपत से जिस तरह से एक अभियान की शुरुवात की गयी है आज उसकी आवश्यकता भी थी क्योंकि अभी तक देश में कन्या भ्रूण हत्याओं के चलते जिस तरह से कई राज्यों में समस्याएं बढ़ती ही जा रही हैं उसके चलते ऐसा कुछ किया जाना आवश्यक भी था. इस क्रम में पहले से ही हरियाणा ने अपनी स्थिति में सुधार करते हुए कन्या भ्रूण हत्या पर लगाम कसने की कोशिशों में सफलता पानी शुरू कर दी है जिसकी वास्तविकता जनगणना के आंकड़ों से भी देखी जा सकती है. आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं के दुरूपयोग से दो दशक पहले हरियाणा में जिस तरह से कन्याओं को भ्रूण में ही मारा जाना लगा था आज उसके परिणाम देखकर वहां के समाज में खुद भी बदलाव आना शुरू हो चुका है फिर भी लगातार कोशिशों और सरकारी मशीनरी के कड़े नियंत्रण के बाद भी यह काम कहीं कहीं छोटे स्तर पर चोरी छिपे चलाया भी जा रहा है. आज इससे पूरी तरह से निपटने के लिए समाज को ही आगे बढ़कर बेटियों को स्वीकार करने की हिम्मत दिखानी होगी.
                        अगर आंकड़ों में देखा जाये तो आज वास्तव में हरियाणा इसमें सबसे पीछे नज़र आता है पर यह भी सही है कि पिछले दशक में हरियाणा ने अपनी स्थिति में गुणात्मक सुधार भी किया है जिसके चलते आज वहां पर कन्याओं के अनुपात में तेज़ी से सुधार हो रहा है. इस अभियान में जो महत्वपूर्ण बात देखी जानी चाहिए थी उसको पूरी तरह से नज़र अंदाज़ किया गया है क्योंकि हरियाणा इस समस्या से जूझकर अब खुद ही सुधरने की राह पर है पर उन राज्यों पर अधिक ध्यान दिए जाने की आवश्यकता अधिक है जहाँ पर पिछले दशक में लिंगानुपात पहले के मुकाबले बिगड़ता हुआ दिखाई दे रहा है फिर भी केंद्र सरकार द्वारा हरियाणा में ही इस अभियान की शुरुवात करना अच्छा कदम नहीं माना जा सकता है. सरकार की चिंता से कुछ खास अंतर नहीं पड़ा करता है क्योंकि जब तक मसलों में सामाजिक जुड़ाव नहीं हो तब तक वे केवल सरकारी योजनाओं से अधिक कुछ भी नहीं हो पाते हैं और उनका बुरा असर समाज पर पड़ता ही रहता है.
                         अब इस मामले को यही पर छोड़े जाने के स्थान पर केंद्र सरकार को उन राज्यों में भी पीएम की इस तरह की सभाएं करवाने के बारे में सोचना चाहिए जहाँ का रिकॉर्ड पिछले दशक में ख़राब होता दिखाई दे रहा है. आज यूपी, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, नागालैंड, सिक्किम, जम्मू कश्मीर और महाराष्ट्र पर अधिक ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है क्योंकि आज ये देश पिछले दशक में लिंगानुपात बनाये नहीं रख सके हैं साथ ही उन राज्यों में सामाजिक कार्यकर्तों और सरकारी चिकित्सकों की ज़िम्मेदार टीमों को पूरी तरह से आगे बढ़ाये जाने की आवश्यकता भी है जहाँ लगातार लिंगानुपात में सुधार होता दिख रहा है. देश के समग्र विकास के लिए इस तरह की योजनाएं बनायीं जानी चाहिए पर जिस तरह से लड़कियों के लिए ममता सरकार ने बहुत आगे जाते हुए पूरे देश में उनके लिए काम करने के सरे कीर्तिमान बना डाले हैं उन पर गौर करते हुए उन्हें रोल मॉडल के तौर पर केंद्र सरकार को भी राज्यों की नीतियों को आगे बढ़ाने के बारे में सोचना ही होगा तभी यह सामाजिक समस्या पूरी तरह से दूर की जा सकेगी.     
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शुक्रवार, 26 सितंबर 2014

वोट के बदले दुल्हन

                                                                      सामाजिक बुराई और प्राकृतिक नियमों से छेड़-छाड़ लम्बे समय में किसी समाज को किस तरह से प्रभावित कर सकती है इसका ताज़ा उदाहरण हरियाणा में आगामी विधान सभा चुनावों से पहले जींद में कुंवारा यूनियन का गठन किया जाना है और उसके युवा से अधेड़ होते जा रहे सदस्यों ने यह मांग रखी है कि जो भी नेता उन्हें दुल्हन दिलाने का वायदा करेगा वे उसी को अपना वोट देने वाले हैं ? इस समस्या के बारे में कुछ दिन पहले ही भाजपा के वरिष्ठ नेता ओम प्रकाश धनखड़ ने भी इस तरह का वायदा किया था कि उनकी पार्टी कुंवारों के लिए बिहार से दुल्हन लेकर आएगी तो उस पर बिहार में तो बहुत हो हल्ला मचा था पर हरियाणा के सभी राजनैतिक दल चुप्पी साध गए थे क्योंकि लड़कियों की भ्रूण हत्या करने वाले समाज में आज इन लोगों की बहुतायत हो चुकी है जिन्हें अपने लिए दुल्हन नहीं मिल रही है ? जींद में लिंगानुपात सबसे खराब स्थिति में है और वहां पर प्रति १००० केवल ८२७ लड़कियां ही है जबकि हरियाणा का औसत ८४२ का है.
                                                                आज इस मसले पर जानते हुए भी चुनाव आयोग या अन्य राजनैतिक या सामाजिक लोगों कि कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है केवल कुछ कांग्रेसी नेताओं ने दबी ज़ुबान में इसका विरोध किया है क्योंकि उन्हें भी पता है कि आने वाले चुनावों में पहले से ही दबाव में लड़ रही पार्टी के लिए सब कुछ करना आसान नहीं होने वाला है. ऐसे में इस समस्या पर आखिर नेता और आयोग के पास करने के लिए क्या शेष बचता है जबकि समाज की पिछली पीढ़ी ने ही अपनी कन्याओं की हत्या करने में कोई कसर नहीं छोड़ रखी है ? इस स्थिति को पूरे देश के सामने लाया जाना चाहिए क्योंकि आज भी देश के विभिन्न हिस्सों में लालची चिकित्सकों द्वारा भ्रूण हत्या को अंजाम दिया जा रहा है जिससे उस समाज को भी यह पता चल सके कि दो दशक पूर्व प्रकृति से जो दुर्भाव हरियाणा ने किया था वो आज उसको किस तरह से झेल रहा है और वहां यह एक बड़ी सामाजिक समस्या बन चुका है.
                                                            अब राजनैतिक दलों को भी इस तरह की किसी भी कोशिश का भरपूर विरोध करना ही होगा क्योंकि जब तक समाज के सभी वर्ग इस तरह से दुर्भाव करने वालों के खिलाफ खड़े नहीं होंगे तब तक वोटों के लालच में नेता कुछ भी बोलते रहने वाले हैं और उसका उनकी चुनावी संभावनाओं पर कुछ असर भी पड़ सकता है. इस परिस्थिति में उस समाज को ही स्वयं आगे बढ़कर कुछ सोचना होगा जिसने इस कुकृत्य को दशकों तक अंजाम दिया है क्योंकि जो गलती जहाँ से शुरु हुई है उसे वहीं से सुधारने की कोशिश ही आने वाले समय में समाज में समरसता और समानता लाने में मदद कर सकती है. सभी को यह सोचना ही होगा कि इस तरह कि हरकतों के बिहार और अन्य राज्यों में शुरू होने से आने वाले समय में हरियाणा के लड़कों को दुल्हन कहाँ से मिलेंगीं ? जाति और खाप पर मर मिटने वाले समाज के लिए दूसरे समाज की लड़कियों को स्वीकार करना कितना सहज होगा यह भी सोचने के विषय है इसलिए जो गलती हरियाणा ने की है आज उसे सुधारने का ज़िम्मा भी उन पर ही सबसे अधिक आता है.     
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बुधवार, 23 जुलाई 2014

भारत और कन्या भ्रूण हत्या

                                                       संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट में भारत में बच्चों के लिंगानुपात में निरंतर होने वाली कमी के लिए दहेज़ और सामाजिक परम्पराओं को ज़िम्मेदार माना गया है. अभी तक जिस तरह से भारत में स्त्री-पुरुष लिंगानुपात में तेज़ी से परिवर्तन हो रहा है उस कारण से हरियाणा जैसे राज्यों में अब लड़कों के लिए लड़कियां मिलनी एक बड़ी सामाजिक समस्या के रूप में सामने आ रहा है. कड़े कानूनों के बनने से पहले ही जिस तरह से आधुनिक विज्ञानं का सहारा लेकर कन्या भ्रूणों को गर्भ में ही ख़त्म किये जाने का एक पूरा दौर चला आज उसके दुष्परिणाम समाज के सामने हैं और अभी भी यह खेल उन इलाकों में बदस्तूर जारी है जहाँ पर इस तरह की कोई समस्या फिलहाल नहीं है पर देश के वे हिस्से भी आज पश्चिमी भारत की २५ वर्ष पहले की उसी राह पर चलते हुए दिखाई दे रहे हैं. देश में जिस तरह से समाज ने चिकित्सकों के साथ मिलकर कन्या भ्रूणों को मारने का क्रम शुरू किया वह आज भी पूरी तरह से रुक नहीं पाया है.
.                            रिपोर्ट में इस बात का भी खुलासा किया गया है कि अधिकतर क्षेत्रों में माता-पिता बच्चियों के खिलाफ तो नहीं हैं पर दो बच्चों के सीमित परिवार में वे एक लड़के की आकांक्षा भी रखते हैं और उसे पूरा करने के लिए वे किसी भी हद तक जाने से नहीं चूकते हैं जिससे भी समाज में लिंगानुपात बिगड़ने की तरफ जाने लग रहा है. भारत में जिस तरह से लड़कियों के विवाह आदि पर बड़ा ख़र्च होता है और उससे निपटने के लिए सरकार और समाज के पास आज भी कोई कारगर विकल्प मौजूद नहीं है तो कई बार इन ज़िम्मेदािरयों से बचने के लिए भी कन्याओं को पैदा होने से पहले ही मार दिया जाता है जिसके दुष्परिणाम तुरंत तो नहीं पर एक पूरी पीढ़ी बीतने के साथ दिखाई देने शुरू होते हैं. आज भी देश में लगभग हर तरह के समाज में लड़कियों को बोझ ही माना जाता है और उनके स्थान पर लड़कों के होने को परिवार में प्राथमिकता दी जाती है.
                            आज भी देश का आधुनिक दिखने वाला परंपरागत समाज अपनी पुरानी कुरीतियों को लेकर अजीब तरह का व्यवहार करने से नहीं चूकता है. जिस समाज में बड़े बड़े वैज्ञानिक, अधिकारी नेता आदि आगे बढ़कर देश के लिए नयी राहें खोलने का काम करने में लगे हुए हैं उसी समाज में आज भी कन्याओं के पैदा होने पर मायूसी दिखाई देती है ? आखिर समाज अपनी इस तरह की दोहरी मानसिकता से खुद को कब उबार पायेगा ? देश और समाज को सही दिशा में बढ़ते रहने के लिए स्त्री-पुरुष अनुपात को बनाये रखने की बहुत आवश्यकता है पर आज भी अधिकांश क्षेत्रों में इस तरह की सोच दिखाई नहीं देती है लड़के सभी को चाहिए पर कोई यह सोचना नहीं चाहता है कि जब समाज में सभी के घरों में केवल लड़के ही होंगें तो उनके परिवारों और समाज के लिए लड़कियों को कहाँ से लाया जायेगा ? समाज में इस तरह की समस्या के चलते क्या और बुराईयाँ पनपने की आशंका नहीं हो जाएगी ? फिलहाल रूढ़ियों और दकियानूसी सोच में जकड़े हुए इस समाज के पास इन प्रश्नों का कोई उत्तर नहीं है और कन्यायें गर्भ में ही खत्म होने के लिए विवश हैं.         भारत और कन्या भ्रूण हत्या
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बुधवार, 5 दिसंबर 2012

बेटी का जन्म ?

                   गाज़ियाबाद में एक महिला को बेटी जनने के कारण प्रताड़ित किये जाने की घटना से देश में पुराने समय से बेटों की चाह रखने की मानसिकता एक बार फिर से उजागर हुई है. यह सही है कि आज के समय में बेटियों को बेटों के बराबर माने जाने की शुरुआत हो चुकी है पर अभी वह जिस स्थिति में है उससे पूरी तरह से संतुष्ट नहीं हुआ जा सकता है क्योंकि आज भी देश के बहुत सारे भागों में इस मानसिकता के साथ जीने वालों की कमी नहीं है कि परिवार और वंश बेटों से ही चला करते हैं ? प्राचीन काल से चली आ रही इस कुरीति को दूर करने के लिए समाज में बहुत सारे प्रयास किये जा रहे हैं फिर भी उसका उतना असर दिखाई नहीं देता जितना होना चाहिए ? आख़िर क्या कारण है कि भारतीय समाज आज भी बेटियों के योगदान को मानने के स्थान पर बेटों के कर्मों को ही प्राथमिकता दिया करता है क्यों नहीं हमारे समाज में बेटियों को वह दर्ज़ा मिल पाता है जिसकी वे जन्म से ही हक़दार होती हैं ? जबकि आज के समय में बेटियों ने खुद को बेटों से बहुत आगे और बहुत अच्छा साबित कर दिया है उसके बाद भी उनके साथ हमारा व्यवहार कहीं से भी बदलता दिखाई नहीं देता है.
         आज सामाजिक स्थिति यह है कि बेटों को बार बार फेल हो जाने के बाद भी पढ़ाए जाने को प्राथमिकता दी जाती है जबकि बेटी के एक बार ही कम अंक आने पर उसे चेतावनी जारी कर दी जाती है कि उसे पढ़कर क्या करना है अब इतना लिख पढ़ तो लेती ही है कि लिख पढ़ ले ? जबकि पूरे देश के हर बोर्ड के परीक्षा परिणामों पर यदि नज़र डाली जाये तो एक बात सामने आती है कि बेटियों ने कम सुविधा के बाद भी अधिक सुविधा भोग कर पढ़ाई करने वाले बेटों से हमेशा ही बहुत आगे रहना सीखा है इतने के बाद भी हमारे रूढ़िवादी समाज की आँखें नहीं खुलती हैं और वे बेटों को जिन सुविधाओं को देते रहते हैं अगर उनका एक हिस्सा भी बेटियों को दे दें तो बेटियां बहुत आगे बढ़कर अपने परिवार को गौरवान्वित करने का कोई अवसर नहीं खोती हैं. इतने के बाद भी जब समाज में बेटी के जन्म लेने पर उसकी माँ पर आरोप लगाये जाते हैं तब उस पर क्या बीतती होगी जबकि वैज्ञानिक आधार पर भी माँ की तरफ़ से हमेशा ही एक्स गुणसूत्र होता है वहां पर भी भेद पुरुष के एक्स या वाई गुणसूत्र से ही होता है जिससे बच्चे का लिंग निर्धारण होता है.
        जिस काम में महिला का कोई दोष ही नहीं होता उसके लिए भी उसे दोषी ठहराए जाने की पुरानी परंपरा देश में चली आ रही है. परिवार और समाज के कारण बचपन से ही बेटियों को सही ग़लत हर बात पर चुप रहना सिखाया जाता है जिसका असर उनके पूरे जीवन पर पड़ता है क्योंकि जब तक बेटियों को हम यह हिम्मत नहीं देंगें कि वे अपने लिए सही ग़लत का चुनाव खुद ही करें तब तक उनके साथ जो भी होता रहेगा उसे वे सही ही मानती रहेंगी और चुप रहकर अत्याचार सहती रहेंगीं. देश में शक्ति की उपासना की जाती है और बिना नारी शक्ति के पूरी व्यवस्था के छिन्न भिन्न होने में कोई समय नहीं लगने वाला है फिर भी सच्चाई को जानते हुए हम अपनी सुविधानुसार व्यवहार करने को प्राथमिकता देते रहते हैं. जब तक बेटे और बेटी में यह भेद घर घर में होता रहेगा तब तक पूरे समाज में यह मानसिकता पनपती रहेगी कि बेटियां कुछ कमतर ही हैं. जिन घरों में बचपन से बेटियों को बात बात पर बेटों के सामने दबाया जाता है उन्हीं घरों के बेटे बड़े होकर अपनी पत्नी को वह सम्मान कभी भी नहीं दे पाते हैं जो एक महिला को मिलना चाहिए. अब केवल बातें करने के स्थान पर कुछ और जागरूकता फ़ैलाने का समय है जिससे बेटियों को बराबरी का हक़ मिल सके और किसी महिला को बेटी जनने पर इस तरह की स्थितियों का सामना न करना पड़े.   
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सोमवार, 19 नवंबर 2012

दीवाली, मेवात और महिलाएं

               राजस्थान के मेवात क्षेत्र में धनतेरस, दीपावली पर जिस तरह से महिलाओं को खरीदे जाने और देव उत्थानी एकादशी के दिन उनका विवाह अधिक आयु के लोगों से करने का मामला सामने आया है उससे यही लगता है कि आगे बढ़ने के प्रयास में हम शायद इन्सान ही नहीं रह गए हैं ? अभी तक जिस तरह से मानव तस्करी की बातें सामने आती रही हैं उनसे यही लगता था कि कहीं न कहीं इसके पीछे इन लड़कियों या महिलाओं को अनैतिक कार्य करने के लिए मजबूर किया जाता होगा पर अलवर, भरतपुर और धौलपुर के इस तरह के खुलासे से यही लगता है कि सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों लाभ उठाकर लोग आज भी इनको खरीद कर ऐसे काम में धकेल रहे हैं. पुलिस के अनुसार केवल इस तरह की घटनाएँ तभी रोकी जा सकती हैं जब उसके पीछे सामजिक समर्थन नहीं हो पर जब बिगड़ते हुए लिंग अनुपात के कारण लड़कियों की संख्या कम ही होती जा रही है तो प्रभावी और पैसे वाले लोग अपने लिए इस तरह से ही पत्नियों की व्यवस्था करने में लग गए हैं और शायद कमज़ोर आर्थिक स्थिति वाले माँ-बाप भी मजबूरी के चलते इस तरह की व्यवस्था में अनचाहा सहयोग कर इसे और भी बुरा स्वरुप देने में लगे हुए हैं.
               आज भी देश के बहुत सारे इलाकों में मानव तस्करी के माध्यम से इन लड़कियों और महिलाओं को बड़े शहरों और यहाँ तक कि विदेशों तक में बेच दिया जाता है जिसको कमज़ोर इच्छाशक्ति और कानून के ढीले ढाले रवैये के कारण रोकने में कोई खास सफलता नहीं मिल पा रही है जिससे देश के मौजूदा कानूनों के तहत भी कुछ नहीं किया जा सकता है. इस बारे में सबसे पहले जिस सामाजिक जागरूकता को लाने की आवश्यकता है अभी वह दिखाई नहीं दे रही है जिससे अनिच्छा से मिली सामाजिक मान्यता के चलते भी यह पूरा नेटवर्क अपना काम करने में लगा हुआ है. इस बारे में सबसे बड़ा परिवर्तन तभी लाया जा सकता है जब देश के इन भागों में महिलाओं में शिक्षा का स्तर सुधारने के लिए ज़मीनी स्तर पर कुछ काम किया जा सके क्योंकि जब परिवार की महिलाएं शिक्षित होंगीं तो वे किसी स्तर पर इस तरह के अनैतिक कार्यों का विरोध करने की क्षमता और हिम्मत भी जुटा पाएंगीं वरना परिवार के दायित्वों और आर्थिक कमज़ोरी के बहाने के सामने अशिक्षित महिला कितने समय तक टिक सकती है यह सभी जानते हैं. इनमे वह हिम्मत आ जाये अब वह परिस्थिति उत्पन्न करना हमारी इच्छाशक्ति पर ही निर्भर करता है.
                 हमें केवल कानून और पुलिस के हवाले इन कामों को छोड़कर चुप होकर नहीं बैठ जाना चाहिए क्योंकि यदि यह सब इनके भरोसे रुक सकता तो कब का रुक गया होता पर आज इसके लिए पूरे समाज को सोचने की आवश्यकता है. देश के जिन ज़िलों में इस तरह के काम चल रहे हैं उनमें के विशेष अभियान चलाकर इसके बारे में जन जागरूकता फ़ैलाने का काम किया जाना आवश्यक है क्योंकि जब लोग इस तरह की खरीद फरोख्त को बुरा मानेंगें तभी वे आगे चलकर इससे लड़ने की हिम्मत भी जुटा पायेंगें. अभी तक इस पूरे प्रकरण को जिस गोपनीयता के साथ चलाया जाता है उस स्थिति में पुलिस या अन्य लोगों को भी यह आसानी से नहीं पता चल पाता है कि जो शादी हो रही है वह वास्तव में तय की गयी है या फिर किसी खरीदी हुई लड़की के साथ किये गए इस घिनौने काम को सामजिक मान्यता दिलवाने के लिए ही शादी करने का ढोंग रचाया जा रहा है. इसलिए प्रत्येक वर्ष जो भी शादियाँ देव उत्थानी एकादशी के दिन होने वाली हैं उसकी सूचना २० दिन पहले पुलिस को दिया जाना अनिवार्य किया जाना चाहिए और जिले की महिला सेल की मदद से इन लड़कियों और महिलाओं से अकेले में बात की जानी  चाहिए और यह जानने का प्रयास किया जाना चाहिए कि शादी वास्तविक है या किसी के साथ अन्याय किया जा रहा है. इस तरह के प्रयासों से अगर इस पर पूरी रोक नहीं भी लग पायी तो कम से कम इसमें कमी तो अवश्य ही आ जाएगी पर सरकार के पास इस तरह के कामों के लिए शायद फुर्सत ही नहीं होती और पुलिस प्रशासन के पास सत्ता को खुश करने के लिए पहले से ही बहुत सारे काम होते हैं. 
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

रविवार, 23 अक्टूबर 2011

"नकुशा" से "ऐश्वर्या" तक

   महाराष्ट्र के सतारा जिले की जिला परिषद् ने एक ऐसे कार्यक्रम का आयोजन किया जिसके बारे में भारत के पुरुष प्रधान समाज में कोई सोचना भी नहीं चाहता है. इस कार्यक्रम के तहत पूरे जनपद में सर्वेक्षण करने के बाद नकुशा नाम की लगभग २०० लड़कियों के नाम बदल कर ऐश्वर्या रखे गए. मराठी में नकुशा का शाब्दिक अर्थ "अनचाही" या अपशकुनी से लगाया जाता है और वहां पर पुत्र की चाह में बैठे माँ-बाप के लिए फिर से पुत्री होने पर उनका नाम नकुशा रखने की परंपरा रही है. इससे पुरुष प्रधान समाज में लड़कों की चाहत के बारे में भी लोगों की उत्सुकता सामने आती है. अभी तक समाज के इतने आगे तक बढ़ जाने के बाद भी आज भी लोगों में लड़का लड़की का भेद नहीं मिट पाया है जबकि भ्रूण परीक्षण की शुरुआत करने के कारण ही आज हरियाणा में लड़कियां इतनी कम हो गयी हैं कि बहुत सारी जगहों पर आज लड़कों के सामने शादी लायक उपयुक्त लड़कियों की कमी की समस्या आ गयी है.
    आज हमारे देश के पुरुष प्रधान समाज में जिस तरह से लड़कियों और महिलाओं के साथ भेद भाव किया जाता है उससे पीछा छुड़ाना कोई आसान काम नहीं पर पर सरकारी और सामाजिक स्तर पर इस कमी को दूर करने के लिए उठाये जाने वाले क़दम अपने आप में बहुत महत्वपूर्ण होते हैं. जिस तरह से इस कार्यक्रम के बारे में सोचना और फिर अभिभावकों को इन लड़कियों के नाम बदलने के लिए राज़ी करना एक बहुत बड़ा काम था उसी तरह से यह बात भी महत्वपूर्ण थी कि कम से कम इस बारे में सोचा तो गया. अगर २०० बच्चियों के अभिभावकों ने इस कार्यक्रम में भाग लिया तो ४०० लोगों की मानसिकता तो बदली ही और उन गाँवों में इस बात के बारे में जागरूकता भी फैली कि आगे से वे ऐसे नाम रखने से पहले दस बार सोचेंगें. कोई भी परिवर्तन अचानक ही नहीं होता अपर उसकी शुरुआत इसी तरह से अचानक ही हो जाया करती है और यह ख़ुशी की बात है कि छोटे स्तर पर ही सही यह बदलाव शुरू तो हो गया है. 
   निश्चित तौर पर सतारा की यह घटना कम से कम महाराष्ट्र के लोगों की आँखें खोलने वाली साबित होने वाली है इसे कोई बहुत बड़ा सामाजिक परिवर्तन तो नहीं कहा जा सकता है पर इस बारे में जिस तरह से लोगों ने सोचा और जिला परिषद् के इस कार्यक्रम में भाग लिया वह कहीं न कहीं से लड़कियों के बारे में एक बदलती हुई सोच का एहसास तो जगाता है है. अभी तक कहीं से भी इस तरह के किसी व्यापक कार्यक्रम के बारे में सूचना नहीं मिली है पर यह छोटा सा क़दम ही आगे चलकर किसी बड़े सामाजिक आन्दोलन को जन्म दे सकता है. पूरे महाराष्ट्र में तो नहीं पर इस कार्यक्रम के बाद आने वाले समय में सतारा और आस पास के लोग लड़कियों के नाम नकुशा रखे जाने से पहले सोचेंगें तो ज़रूर..... अगर यह नाम इतना ख़राब नहीं होता तो इसके पीछे छिपी मानसिकता पर चोट पहुँचाने में कुछ आगे बढ़ना सीखा ही जा सकता है जिससे यह नाम लडकियों की पहचान बनने से रुके और शायद आगे से जन्म लेने वाली बेटियां इस नाम और इससे जुडी मानसिकता से छुटकारा भी पा सकें.

मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

सोमवार, 17 जनवरी 2011

गाँव शहर से अच्छे....

एक ऐसी खबर जिसको पढने के बाद लोगों का शायद शिक्षित होने और शिक्षित लोगों के अधिक दूरदर्शी होने पर से विश्वास उठ जायेगा. नोएडा में जिस तरह से शहरी और ग्रामीण क्षेत्र में लड़का/लड़की का लिंगानुपात बिगड़ा हुआ है उसे देखकर यही लगता है की शहरी क्षेत्र के लोगों में लड़के की चाह कुछ ज्यादा ही जोर मार रही है. ऐसा कुछ करते समय उनको इस बात का एहसास बिलकुल भी नहीं होता है कि आने वाले समय में अगर लड़कियां नहीं होंगीं तो उनके लड़कों की शादी के लिए देखे गए उनके सपने कहाँ से पूरे होंगें ?  पर शायद इन माँ-बाप को अभी केवल इतना ही दिखाई दे रहा है कि वे आज अपने घरों में लड़कियों को आने से रोक सकने में समर्थ हो पा रहे हैं ? आने वाले समय में उनके यही कदम उन्हें पता नहीं कहाँ कहाँ भटकने को मजबूर कर देंगें ? 
            इस पूरे मामले में जहाँ आंकड़े देखकर यह पता चलता है कि २००१ की जनगणना के बाद से अब कन्या लिंगानुपात कुछ बढ़िया हुआ है पर आज भी यह संतोषजनक नहीं कहा जा सकता है ? एक तरफ जहाँ ग्रामीण क्षेत्र में यह ९२०/१००० है वहीं शहरी क्षेत्र में यह ८५५/१००० पर अटकी हुई है. इसका क्या मतलब निकला जाये कि शहरी क्षेत्र में लोग अपनी शिक्षा का इस तरह से उपयोग कर रहे हैं और कुछ लालची चिकित्सकों की सहायता से कुछ रूपये खर्च करके वे पूरे समाज के ताने बाने को छिन्न भिन्न करने पर आमादा हैं. क्या शिक्षा का यही अर्थ लगाया जाए कि कुछ लोग आधुनिक तकनीक का गलत इस्तेमाल करके अपने मन की करने पर लगे हुए हैं. अभी तक जिन जांचों से गर्भ में होने वाली बीमारियों का पता लगाया जाता था उसका दुरुपयोग आज भ्रूण लिंग परीक्षण के लिए किया जा रहा है ? क्या आने वाले समय में भारत चिकित्सा जगत से जुड़े इन नए आयामों के प्रयोग के लायक समझा भी जायेगा ?
              क्या हमारी शिक्षा अब इतनी ही रह गयी है कि हम अपने भविष्य के निर्धारण के समय इस तरह से लड़कियों को नियंत्रित करते चलें ? प्रकृति अपने हिसाब से चलती है और इस तरह से प्राकृतिक असंतुलन को जन्म देने वाले यह नहीं जानते हैं कि अनजाने में वे कहीं न कहीं से सामाजिक संघर्ष को बढ़ावा दे रहे हैं? अभी तक जो काम छोटे स्तर पर किया जा रहा है अगर उसे ही पूरा देश अपना ले तो इस समाज का क्या होगा और आने वाले समय में लड़कों के लिए शादी योग्य लड़कियां कहाँ से आयेंगीं ? धिक्कार है ऐसे चिकित्सकों पर जो केवल कुछ रुपयों के लालच में इस तरह की घटिया हरकतें करने से भी बाज़ नहीं आते हैं ? क्या आधुनिक और सभ्य समाज इसी तरह के होते हैं ? इस काम की शुरुआत पंजाब और हरियाणा से हुई थी और आज भी वहां पर स्थिति कुछ सुधरी सी नहीं लगती है ? कई ख़बरें तो ऐसी भी मिली कि इन लड़कों के लिए केरल और बिहार से लड़कियां लायी जा रही हैं ? इस सारे मसले में हम सभी को अपनी अपनी नैतिकता के साथ जीना सीखने की आवश्यकता है और जब तक हम यह नहीं सीख सकेंगें तब तक यह असंतुलन दूर नहीं होगा...
       

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रविवार, 19 दिसंबर 2010

हरियाणा से सुधार का झोंका

जहाँ एक तरफ हरियाणा में बहुत सारी सरकारी योजनायें और प्रोत्साहन से जुड़ी बातें भी जिस काम को नहीं करा सकीं वहीं कुछ लोगों के प्रयास ने भिवानी जिले के चांग गाँव से जो उम्मीद की लौ जलाई है वह पूरे देश को ही एक नयी राह दिखा सकती है. भारत भर में हरियाणा में महिला पुरुष लिंग अनुपात में भारी कमी पिछले २ दशकों से देखी जा रही थी जिसको सुधारने के लिए सरकारी स्तर से लगाकर बहुत सारे अन्य उपाय भी कर लिए गए पर जो फल सामने आना चाहिए था वह कभी आ ही नहीं पाया. चांग गाँव को देखकर यह कहा जा सकता है कि अगर मन से सोच लिया जाए और अच्छे ईमानदार प्रयास किये जाएँ तो दुनिया में कोई भी काम किया जा सकता है.
    महिला पुरुष लिंग अनुपात बिगड़ने से पूरे समाज का ढांचा बदल जाता है और इसके लिए कुछ लालची लोगों द्वारा अपना कुछ हितों को साधने के लिए जिस तरह से तकनीक का दुरूपयोग करके कन्या भ्रूण हत्या को बढ़ावा दिया था उस गलती को सुधारने के लिए इस छोटे से गाँव से जो एक उम्मीद दिखाई दी है अगर उसको सरकारी सहायता बिना किसी भ्रष्टाचार के मिल जाये तो पूरा हरियाणा क्या पूरा देश ही इस समस्या से आसानी से निपट सकता है. जिस तरह से कुछ जागरूक लोगों के प्रयास से २ साल के अंतराल में ही इस गाँव में कन्या लिंग अनुपात ७५०:१००० से बढ़कर ८९९:१००० हो गया है उसके लिए यह गाँव बधाई का पात्र है और जिस तरह से इन लोगों ने पूरी हरियाणा की समस्या का बहुत आसानी से हल निकाल लिया है वह अपने आप में बिलकुल अनूठा है.
   इस गाँव में महिलाओं की समस्याओं के लिए एक साक्षर महिला समूह जिस ईमानदारी से काम कर रहा है वह भी अपने आप में बहुत अनोखा है इस समूह ने महिलाओं से जुड़ी समस्याओं को जिस तरह से समझा और जाना है साथ ही इसके लिए कुछ हल भी खोजे हैं यह उसी का असर है कि पूरे गाँव में महिलाओं की समस्याओं पर बहुत ध्यान दिया जाना लगा है. यह एक शुरुवात ही है अब समय है कि इस तरह के प्रयास पूरे हरियाणा क्या पूरे देश में किये जाएँ और अच्छा हो कि इस सारे मामले को केवल स्वयं सेवी संस्थानों के माध्यम से ही चलाया जाना चाहिए जिससे कहीं इतनी अच्छे प्रयास कहीं से भी सरकारी लाल फीताशाही के शिकार न हो जाएँ.   


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गुरुवार, 18 फ़रवरी 2010

हरियाणा में शादियाँ

         हरियाणा के फतेहाबाद जिले में हुई एक घटना ने लोगों को सोचने पर मजबूर कर दिया है कि जिस तरह से उन्होंने पिछले  दो दशकों में भ्रूण परीक्षण करवा कन्या भ्रूणों की हत्या की थी उसका फल आज पूरा समाज भुगतने को अभिशप्त है. एक लड़की के बिना उन्होंने जिस समाज की कल्पना की थी वह इतनी भयानक होगी किसी ने भी नहीं सोचा था. सम्पूर्ण सृष्टि में जो नियम हैं कुछ तकनीक का दुरूपयोग कर उसे बिगाड़ने की चेष्टा लड़कों पर इतनी भारी पड़ेगी किसी ने नहीं सोचा था. आज वहां पर बहुत से गाँवों में बहन के बदले बीवी मिल पा रही है ? वह समाज जो गोत्र आदि मसलों पर बहुत संवेदन शील रहता है किस मजबूरी में ऐसे फैसले ले पा रहा होगा यह भी समझा जा सकता है ??
           विज्ञान का दुरूपयोग और चंद चिकित्सकों का लालच पूरे समाज पर क्या असर डाल सकता है यदि यह देखना हो तो ऐसे उदाहरण बहुत आसानी से मिल जायेंगें. हरियाणा में आज महिला पुरुष अनुपात ८२२ : १००० रह गया है. ज़ाहिर है ऐसे में लड़कों की शादी के लिए लड़कियां आसानी से तो नहीं मिलेंगीं ? जिन लोगों ने तब केवल बेटों की चाहत में बेटियों की कोख में ही हत्या कर दी थी वे आज यह सोच रहे हैं कि काश हमारे एक बेटी होती तो कम से कम हमारे बेटे का विवाह तो हो जाता ? वाह रे सोच !! आज भी बेटियों की ज़रुरत केवल इसलिए कि उनके बेटों की शादी हो जाये ?
              अब भी ज़रुरत है कि समाज अपने आप चेत जाये... हरियाणा का यह उदाहरण उन सभी के लिए चेतावनी है जो इस तरह से कन्या को पैदा होने से पहले ही ख़त्म कर देने में विश्वास करते हैं ? अब तो देश के सभी हिस्सों में लोगों को समझ लेना चाहिए कि  समाज को चलाने के लिए बेटों जितनी ज़रुरत बेटियों की भी होती है केवल बेटों से समाज का संतुलन कैसे बना रह पायेगा ? आज के समय में भी यह सोच बहुत खतरनाक है क्योंकि हम सभी जगहों पर समानता की बातें करते नहीं थकते ? हमारे आदर्शों में बेटियों का दर्ज़ा किरण बेदी, कल्पना चावला, खुशबू मिर्ज़ा, पी टी ऊषा जैसा होता है पर जब ज़िम्मेदारी की बात आती है तो हम इन्हें समाज में आने से पहले ही समाप्त कर देने में भरोसा करते हैं ? आज भी अगर यह सब जारी रहा तो कल समाज में शायद बीवी के बदले देने के लिए लोगों के पास बहनें भी नहीं होंगीं ?   


मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

सोमवार, 27 अप्रैल 2009

नदी में भ्रूण

इस हफ्ते लगता है कि लिखने के लिए कुछ अच्छा नहीं मिल पायेगा जिस पर लिख सकूं। बीते ३ दिनों में सीतापुर के बीच से बहने वाली सरायन नदीं के आस-पास नवजात भ्रूण मिलने का सिलसिला जारी है। अब कौन और किन परिस्थियों में यह सब कर रहा है किसी को नहीं पता परन्तु एक बात तो है कि हम अपने को चाहे जितना सभ्य, चरित्रवान, संस्कारी आदि कहते रहें पर इस तरह का घटियापन हमारे से दूर होना ही नहीं चाहता। यदि जीवन को सहारा देने की इच्छा नहीं है तो किस लिए एक बच्चे को इस दुनिया में लेन की कोशिश की जाती है ? क्यों नहीं ऐसे लोग सोचते कि उनके माँ-बाप ने यदि इस तरह से किया होता तो वे भी कुछ लोगों के लिए जबानी ख़बर बन कर ख़त्म हो चुके होते। आज की तरह उनकी लाश को किसी अखबार का पन्ना भी नसीब नहीं होता। जीवन कितना सुकून देता है और मौत किस तरह से तोड़ देती है ? मैं एक चिकित्सक हूँ अरमान फिल्म का अमिताभ बच्चन की कही बात याद आ जाती है कि जब कोई मर जाता है तो चिकित्सक हार जाता है। हमारा सारा ध्यान एक जान को बचा लेने में ही लगा रहता है पर क्यों कुछ लोग एक मासूम जान को इतनी आसानी से मार डालते हैं ? अब यह तो नहीं पता कि इस प्रक्रिया में सदैव बच्चे की माँ भी शामिल होती है या नहीं पर यह काम उससे सहमति या ज़ोर से करवा ही लिया जाता है । अब आप लोग यह मत पूछना कि वो भ्रूण किसके थे क्योंकि कोई अपने "वंश को चलाने वाले" को कभी भी घूरे पर या नदी में नहीं फेंकता है , यह तो केवल "घर का बोझ समझी जाने वाली कोई लड़की" ही होती है जिसके बिना ऐसे मानसिक रोगियों का वंश नहीं चल सकता है ? यह मामला सीधे तौर पर कन्या भ्रूण हत्या सरीखा ही लगता है पर चुनाव में दबी जा रही पुलिस चुनाव कराये या सामाजिक सरोकार निभाए। कोई नेता भी इस मसले पर दो आंसू बहाने नहीं आया शायद चुनाव आयोग का डर होगा क्योंकि यह आधी, दबी-कुचली, मर खाने वाली, प्रताड़ना सहने वाली, फिर भी वंश को आगे बढ़ाने वाली आबादी की कहानी है और दुर्भाग्य से उसे भी लोक-तंत्र के इस महायज्ञ में आहुति डालने के लिए चुना गया है ?
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...