मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

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शनिवार, 28 मई 2011

नए कैबिनेट सचिव

भ्रष्टाचार में रोज़ ही नये कीर्तिमान स्थापित कर रही उत्तर प्रदेश की नौकरशाही के लिए एक ख़बर ताज़े हवा के झोंके की तरह आयी है. केंद्र सरकार ने १९७४ बैच के उत्तर प्रदेश काडर के वरिष्ठतम अधिकारी अजित कुमार सेठ को नया कैबिनेट सचिव बनाया है. जिस तरह से इस पद के लिए पुलक चटर्जी का नाम भी सामने आ रहा था उससे एक बार लगने लगा था कि शायद गाँधी परिवार के निकट होने के कारण उन्हें ही यह पद दिया जाएगा पर इस नियुक्ति में केंद्र सरकार ने वरिष्ठता का सख्ती से पालन किया और सेठ को यह ज़िम्मेदारी दी है. इस नियुक्ति से यह तो साबित ही हो जाता है के आने वाले समय में जब कई वरिष्ठ प्रशासनिक पद खाली होने वाले हैं तो उनमें भी वरिष्ठता का सख्ती से पालन किया जायेगा और जो भी लोग किसी तरह के गठजोड़ और जोड़ तोड़ में लगे हुए हैं उनकी एक भी नहीं चल पायेगी. देश के लिए अब यह ज़रूरी भी है कि अच्छे अधिकारियों के सामने लाया जाए.
वैसे भी सेठ को प्रशासनिक हलकों में कड़े तेवरों वाले पर नम्र अधिकारी के रूप में जाना जाता है. इनकी एक ज़बरदस्त ईमानदार अधिकारी की छवि है जो केवल नियमों के अनुसार काम करने में विश्वास करते हैं. आज देश में भ्रष्टाचार की जो स्थिति है उसे देखते हुए अब हमें ऐसे ही अधिकारियों की आवश्यकता है जिनके पास काम करने के अच्छे अनुभव के साथ बिना किसी दबाव के काम करने की हिम्मत भी हो. आज के समय में जिस तरह से अधिकारियों में नेताओं के सामने घुटने टेकने और उनके तलवे चाटने की जो प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है उसने भी देश का बहुत बड़ा नुक्सान किया है. देश में क्या होना चाहिए यह एक नेता की दृष्टि से कुछ और होता है पर अधिकारी पर उसकी हर अच्छी बुरी बात को समझ कर उसके परिणामों के बारे में बताने और आगाह करने की ज़िम्मेदारी होती है पर आज के समय में अपने हितों के आगे लोग देश के हितों को पीछे छोड़ते जा रहे हैं जिससे देश के हितों के साथ समझौता होता चला जा रहा है.
यही सही समय है कि अब मनमोहन सरकार देश के वरिष्ठतम और कर्मठ अधिकारियों को काम करने के लिए सामने लाये जिससे देश का भला हो सके. ऐसा नहीं है कि देश में ईमानदार अधिकारियों की कोई कमी है पर जिस तरह से गलत ढंग से कुछ लोगों को आगे लाने की प्रवृत्ति बढ़ती ही जा रही है उससे नौकरशाही में काम करने वाले अच्छे लोग चुप होकर बैठ जाते हैं और केवल अपनी नौकरी करने लगते हैं जबकि इन लोगों के हाथों में देश के बारे में कुछ करने के अधिकार होने चहिये. २ जी घोटाले में बेहुरा अब सारी ग़लती राजा के सर मढ़ रहे हैं पर जब वे खुद घोटालों में शामिल थे तब उन्हें कुछ भी समझ नहीं आ रहा था ? बस इसी से अधिकारियों को यह समझ लेना चाहिए कि वे देश के हितों की रक्षा करने के लिए हैं किसी नेता की नहीं. अब आशा की जानी चाहिए कि सेठ के अनुभव और ईमानदारी का लाभ देश को मिलेगा और आने वाले समय में देश के कई पदों पर ऐसे ही ज़िम्मेदार और ईमानदार लोगों की नियुक्ति की जाएगी. मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

शनिवार, 27 फ़रवरी 2010

आयकर में राहत...

२०१०-११ के बजट में आम आदमी या इस तरह से कहा जाए कि वेतनभोगियों के लिए आयकर ने एक बड़ी राहत दी है तो ठीक ही होगा. अभी तक देश में विभिन्न करों की दरें पूरी तरह से तर्क संगत नहीं बनायीं जा सकी हैं जिसके चलते लोग पूरी ईमानदारी से टैक्स नहीं देना चाहते हैं. अब भी समय है कि देश में मंहगाई और आय के अन्य स्रोतों पर विचार करके आयकर को इतना सरल किया जाये कि आम आदमी देश के लिए कर देने में आना कानी नहीं करे. कर निर्धारण की प्रक्रिया इतनी सरल होनी चाहिए कि कोई भी आसानी से यह कर सके. आज बहुत सारे झमेलों में पड़ने के चक्कर के कारण ही बहुत से लोग कर नहीं देते हैं कि कौन इस लफड़े में फंसे ?
                   यह सही है कि देश कि ८० % जनता किसी भी तरह से कोई कर चुराना नहीं चाहती है पर दरोगा राज और कानूनी पेचीदगियों के चलते कुछ ऐसा हो जाता है कि वह कर देने की तरफ आना ही नहीं चाहती  है. कानून इतना सरल और पारदर्शी होना चाहिए कि कोई भी आसानी से कर दे सके. कर निर्धारण करने वाले तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार ने भी देश में कर चोरी को बहुत बढ़ावा दिया है. सबसे पहले इस बात पर विचार किया जाना चाहिए कि यदि कोई अपनी स्वेच्छा से कर देना चाहता है तो उसके पास यह विकल्प होना चाहिए कि बिना किसी बड़े झमेले के वो आयकर विभाग के खाते में केवल अपना नाम और पता भर कर कर जमा कर सके. इससे सबसे बड़ी बात तो यह होगी कि नए कर दाता सामने आयेंगें और जब वे एक बार कर देंगें तो आगे उनको और अधिक और सही कर देने के लिए प्रेरित किया जा सकता है.
               देश में कानून की कमियों को ढूंढ कर उनका फायदा उठाने की बात करने वाले कितने लोग होंगे ? बाकी सभी को इन विभागों से जुड़े लोग यह समझाने में केवल इसलिए सफल हो जाते हैं क्योंकि नियमों की पेचीदगियां उन्हें कुछ करने नहीं देती हैं. यह बात पूरे विश्वास के साथ कही जा सकती है कि यदि सरकारें भ्रष्टाचार पर नकेल लगा सकें तो इस देश के नागरिक हमेशा की तरह स्वेच्छा से सही कर देने के लिए तैयार  हैं. क्या देश पर चीन,पाक युद्ध कारगिल,सुनामी और अन्य आपदाएं आने पर आम आदमी ने आगे आकर अपना योगदान नहीं दिया है ? क्यों कर लेने वाले कर दाताओं को केवल कर चोरी करने वाला ही समझते हैं ? अब भी समय है कि देश में यह तंत्र मज़बूत किया जाये और तब देखा जाये कि जनता क्या कर सकती है ?
 



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शनिवार, 20 फ़रवरी 2010

भ्रष्टाचार..... सरकार को चुनौती ?

उत्तर प्रदेश के गाज़ियाबाद जिले में जिस तरह से आंबेडकर ग्राम की सड़कों के निर्माण में धांधली खुलकर सामने आई है उसके बाद यह तो तय हो ही गया है की अब भ्रष्टाचारियों में माया सरकार का कोई डर नहीं रह गया है. सभी को याद होगा कि अपने पिछले अल्पमत के कार्यकालों में माया ने जिस तरह से सरकारी तंत्र की तंत्रिकाओं को झकझोर दिया था उससे जनता को लगा था कि शायद पूर्ण बहुमत में आने पर प्रदेश में नौकर शाही पर कुछ लगाम तो लग ही जाएगी पर आज जो हालात दिखाई दे रहे हैं वे पिछली सरकारों से भी बुरी स्थिति को दिखाते हैं. जब सरकार की उच्च प्राथमिकता में शामिल आंबेडकर ग्राम ही भ्रष्टाचार से नहीं बच पा रहे हैं तो पूरे प्रदेश में और क्या हाल होगा किसी से छिपा नहीं है ? अब कुछ सतर्क ग्रामीणों की शिकायत पर जब मामला सामने आ ही गया है तो कुछ लोगों को निलंबित कर उनकी ज़िम्मेदारी समझाई जा रही है.
             प्रदेश में विकास की सोच कहाँ तक है इस बात का अंदाज़ा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि सरकार केवल लखनऊ में ही विकास की बातें कर रही है जबकि पूरे प्रदेश को विकास की आवश्यकता है. अभी वर्तमान में कुम्भ मेला चल रहा है पर सरकार ने उत्तरांचल जाने वाली सड़कों की जो हालत बना रखी है वह पूरे देश के माथे पर कलंक से कम नहीं है. इस अवसर पर पूरे प्रदेश से श्रद्धालु हरिद्वार जाते हैं पर मुरादाबाद से हरिद्वार जाने का प्रयास करके तो देखिये ? विकास की झूठी कहानी और मक्कारी की एक और कहानी सामने आ जाएगी. उत्तरांचल में आने वाली सड़कें तो बहुत अच्छी हैं और वे विकास करते उत्तर प्रदेश के खोखले दावे की पोल खोलते रहते हैं ?  क्योंकि जब हम उत्तर प्रदेश से उत्तरांचल में प्रवेश करते हैं चौड़ी और साफ सुथरी सड़कें हमारा स्वागत करती हैं. आखिर वहां पर यह सब कैसे हो रहा है जो हमारे यहाँ नहीं हो पा रहा है ? प्रदेश में वसूली का जो आलम है उसने तो विकास के मायने ही बदल दिए हैं ?
                 कोई भी नहीं पूछ रहा कि जो माननीय अभी तक केवल आम आदमी थे मात्र ३०००० के वेतन से एकदम से कैसे बड़ी बड़ी गाड़ियों में घूमने लगते हैं ? एक अदने से बाबू के पास भी आलीशान बंगला कहाँ से आता है ? सरकारी अधिकारियों के पास इतनी संपत्ति कहाँ से आ रही है ? सब खा और खिला रहे हैं सबका पेट भर रहा है पर वोट देकर सर्व समाज का सपना देखने वाला वोटर एक बार फिर से ठगा सा महसूस कर रहा है क्योंकि उसकी स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं होता है केवल चंद लोग ही उसके हिस्से की रोटी लूट कर मलाई मारने में एक बार फिर से लग गए हैं. ....... 



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गुरुवार, 18 फ़रवरी 2010

नरेगा में आशा की किरण....

पूरे देश में चलायी जा रही ग्रामीण गारंटी योजना जहाँ हर तरफ से भ्रष्टाचार के आंकड़े दिखाने के लिए ही बदनाम रही है उसमें उत्तर प्रदेश के एक पिछड़े जिले गोन्डा से आने वाली खबर ने देश को एक नयी राह तो ज़रूर ही दिखा दी है. आज जब यह महत्वाकांक्षी योजना केवल गड़बड़ियों के लिए ही जानी जा रही है तो ऐसे बदलाव की बयार वास्तव में बहुत सुहानी लगती है. जिले की दो ग्राम पंचायतों विवियापुर अवधूत नगर और रुदौली ने विकास के मायने ही बदल दिए हैं. इन दोनों पंचायतों ने इस योजना से छोटे स्तर पर ईंट बनाने के भट्ठे लगाकर क्रमशः ५ और ३ लाख की कमाई भी कर ली है. इन भट्ठों ने जहाँ गाँव में रोजगार दिवस सृजित किये वहीं गाँव में खुदने वाले तालाब से निकली मिटटी का उपयोग भट्ठे में ईंटें बनाने में कर लिया गया. अब सबसे महत्वपूर्ण बात तो यह है कि ये अपनी इस आमदनी से १० गरीबों के लिए मुफ्त आवास बनवाने की तरफ जा रही हैं. जो बात सबसे महत्वपूर्ण है कि इन निर्मित ईंटों और आमदनी से ही ग्राम में विकास के लिए आवश्यक खडंजा आदि लगाने का काम किया गया है .
        आज जब देश की राजधानी दिल्ली में वातानुकूलित कमरों में बैठकर बाबू लोग योजना बनाते हैं तो किसी के दिमाग़ में यह बात कभी भी कैसे नहीं आई जबकि इसके लिए जनता उनको पूरा वेतन देती है ? वास्तविकता यह है कि दिल्ली से जितना भारत दिखाई देता है वास्तव में वह उससे बहुत बड़ा, समृद्ध और विकास के लिए तत्पर है. आज के समय जब हर काम में खाने-पीने का रिवाज़ चल रहा है तो इन पंचायतों के इस काम को कोई सराहेगा क्या ? सरकारी मशीनरी ने हर अच्छे काम में इतने अड़ंगे लगा दिए हैं कि कोई भी कोई काम करने से पहले दस बार सोचने को मजबूर हो जाये. पहले तो सरकारें नियम ही नहीं बना पाती और जब वे बनते हैं तो उनके मानकों को इतना ऊंचा कर दिया जाता है कि वास्तव में उन्हें पाना ही टेढ़ी खीर साबित होता है... बस यहीं से खाने खिलाने का दौर शुरू होता है और पता नहीं वह कहाँ जाकर ख़त्म होता है ? इस सारी कवायद में केवल जनता ही पिस जाती है. फिर भी जीने की राह जनता खुद ही ढूंढ लेती है अच्छा हो कि इन पंचायतों की तरह और पंचायतें भी अपने स्तर पर कुछ नया करने की सोचें जिससे समाज का भला हो सके और गाँवों की उन्नति भी संभव हो सके. देश इन पंचायतों को सलाम करता है......

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हरियाणा में शादियाँ

         हरियाणा के फतेहाबाद जिले में हुई एक घटना ने लोगों को सोचने पर मजबूर कर दिया है कि जिस तरह से उन्होंने पिछले  दो दशकों में भ्रूण परीक्षण करवा कन्या भ्रूणों की हत्या की थी उसका फल आज पूरा समाज भुगतने को अभिशप्त है. एक लड़की के बिना उन्होंने जिस समाज की कल्पना की थी वह इतनी भयानक होगी किसी ने भी नहीं सोचा था. सम्पूर्ण सृष्टि में जो नियम हैं कुछ तकनीक का दुरूपयोग कर उसे बिगाड़ने की चेष्टा लड़कों पर इतनी भारी पड़ेगी किसी ने नहीं सोचा था. आज वहां पर बहुत से गाँवों में बहन के बदले बीवी मिल पा रही है ? वह समाज जो गोत्र आदि मसलों पर बहुत संवेदन शील रहता है किस मजबूरी में ऐसे फैसले ले पा रहा होगा यह भी समझा जा सकता है ??
           विज्ञान का दुरूपयोग और चंद चिकित्सकों का लालच पूरे समाज पर क्या असर डाल सकता है यदि यह देखना हो तो ऐसे उदाहरण बहुत आसानी से मिल जायेंगें. हरियाणा में आज महिला पुरुष अनुपात ८२२ : १००० रह गया है. ज़ाहिर है ऐसे में लड़कों की शादी के लिए लड़कियां आसानी से तो नहीं मिलेंगीं ? जिन लोगों ने तब केवल बेटों की चाहत में बेटियों की कोख में ही हत्या कर दी थी वे आज यह सोच रहे हैं कि काश हमारे एक बेटी होती तो कम से कम हमारे बेटे का विवाह तो हो जाता ? वाह रे सोच !! आज भी बेटियों की ज़रुरत केवल इसलिए कि उनके बेटों की शादी हो जाये ?
              अब भी ज़रुरत है कि समाज अपने आप चेत जाये... हरियाणा का यह उदाहरण उन सभी के लिए चेतावनी है जो इस तरह से कन्या को पैदा होने से पहले ही ख़त्म कर देने में विश्वास करते हैं ? अब तो देश के सभी हिस्सों में लोगों को समझ लेना चाहिए कि  समाज को चलाने के लिए बेटों जितनी ज़रुरत बेटियों की भी होती है केवल बेटों से समाज का संतुलन कैसे बना रह पायेगा ? आज के समय में भी यह सोच बहुत खतरनाक है क्योंकि हम सभी जगहों पर समानता की बातें करते नहीं थकते ? हमारे आदर्शों में बेटियों का दर्ज़ा किरण बेदी, कल्पना चावला, खुशबू मिर्ज़ा, पी टी ऊषा जैसा होता है पर जब ज़िम्मेदारी की बात आती है तो हम इन्हें समाज में आने से पहले ही समाप्त कर देने में भरोसा करते हैं ? आज भी अगर यह सब जारी रहा तो कल समाज में शायद बीवी के बदले देने के लिए लोगों के पास बहनें भी नहीं होंगीं ?   


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रविवार, 14 फ़रवरी 2010

अब पुणे ....

कल पुणे में जिस तरह से आतंकी धमाके हुए उसको देखते हुए यह तो कहा ही जा सकता है कि देश में किसी  भी स्तर पर आतंकी अपने आतंकी मंसूबों को कामयाब करने में सक्षम हैं. यह भी सही है कि बहुत बार सतर्कता के चलते भी इस तरह की घटनाओं को टाला जा चुका है. इस समय यह बात करने का भी समय है कि पाक से बात करने की बात से ही धमाके क्यों होने लगते हैं ? इस बात का कोई मतलब नहीं है कि आतंकी यह धमाके करना चाहते हैं क्योंकि पाक सरकार जिस तरह से बात कर रही है क्या उसे दोस्ती वाला कहा जा सकता है ? अच्छा हो कि किसी भी तरह की बात करने से पहले पाक को यह बता ही दिया जाये कि इस तरह के माहौल में कोई भी बात नहीं की जा सकती है.
देश में पाक समर्थित लोग हमले करते रहें और हम शांति की बात करते रहें आखिर यह कब तक चलता रहेगा ? देश में भी चरम तक सोचने वालो कि कमी नहीं है पर किसी भी स्तर पर कोई बात तभी सार्थकता को पा सकती है जब उसके पीछे सही मंशा से काम किया जाये. पाक आज तक कभी भी गंभीर नहीं रहा है अपनी बातों को लेकर... फिर भी कोई किसी भी स्तर पर कैसे बात कर सकता है ? हम कश्मीर की बात ही नहीं करना चाहते पर पाक बलूचिस्तान में भी हमारी उपस्थिति की बात करना चाहता है ? सभी जानते हैं कि भारत का वहां पर कुछ नहीं है पर पाक कुछ झूठे सबूत जुटा कर हमारी बदनामी तो कर ही रहा है.
आज पाक को साफ़ शब्दों में बता दिया जाना चाहिए कि लाशों के ढेर पर किसी तरह की बात नहीं हो सकती है ? अगर बात करनी है तो भारत के दोषियों को या तो हमें सौंप दो वरना बात करने के मंसूबे पालना बंद कर दो.  


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शनिवार, 13 फ़रवरी 2010

प्रधानमंत्री की फोटो ....

आज के समय में जब सारे नेता किसी भी तरह से जुगत लगा कर अपना प्रचार कराने में ही लगे रहते हैं तो ऐसे में संप्रग अध्यक्षा सोनिया गाँधी और प्रधानमंत्री की तरफ से अपने चित्र का इस्तेमाल बिना अनुमति करने पर सख्ती से पेश आने की घटना अपने आप में अनोखी ही लगती है. यह सही है कि मनमोहन सिंह सदैव से ही इस तरह के हथकंडों से अलग रहे हैं फिर भी नेता में यह गुण अपने आप ही आ जाता है कि उसका गुणगान किया जाये. पहले भी प्रधानमंत्री कार्यालय से ऐसे आदेश जारी हो चुके हैं कि किसी भी सरकारी विज्ञापन में उनके चित्रों का प्रयोग अनावश्यक रूप से नहीं किया जाये. अब ताज़ा मामला राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण से जुड़ा हुआ है. पूरे देश में प्राधिकरण ने उनकी फोटो लगाने कि अनुमति मांगी थी जिसे नहीं प्रदान किया गया. यह सभी जानते हैं कि वर्तमान में किसकी सरकार चल रही है कुछ हद तक नयी योजनाओं के बारे में जनता को बताया जाना चाहिए पर केवल सरकारी खर्चे से व्यक्तिगत विज्ञापन को किसी भी स्तर पर उचित नहीं कहा जा सकता है.
आज देखा जाये तो पता नहीं कितने रूपये केवल इस तरह की चरण वंदना में ही बहा दिए जाते हैं जबकि इस तरह के मामलों का कोई मतलब नहीं होता है. देखा जाये तो यह पैसा किसी भी तरह के विज्ञापन के बजाय किसी अन्य विकास से जुड़े मद में खर्च किया जा सकता है. फिलहाल देश में इस तरह कि सोच विकसित हो रही है यह अच्छी बात है पर इस बात को राज्यों तक पहुंचाए जाने की आवश्यकता है तभी कुछ सही किया जा सकेगा....   


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मंगलवार, 9 फ़रवरी 2010

घर के परसैय्या अंधेरिया रात ?

उत्तर प्रदेश के ग्रामीण अंचलों में एक कहावत कही जाती है कि "घर के परसैय्या, अंधेरिया रात" .कल इस कहावत को उत्तर प्रदेश में विधान सभा में फिर से जीवंत कर दिया गया. सरकार ने बड़ी आसानी से विधान मंडल के दोनों सदनों के सदस्यों के वेतन फिर से बढ़ा दिए. यह सही है की इतने पैसों में भी ये माननीय अपने क्षेत्र की सेवा कर नहीं पायेंगें जितना कुल वेतन कहा  जा रहा है उससे ज्यादा तो इनके बड़े बड़े वाहनों में राजधानी आने जाने में ईंधन ही लग जाता है. जो प्रदेश के माननीय  होने  से पहले मुफलिसी में जी रहे होते हैं उन्हें इन  तीस  हज़ार  रुपयों  से  ही  इतनी  सम्पन्नता  मिल  जाती  है  कि  20/२५  लाख का वहां उनकी समझ में ही नहीं आता है ? सरकार चाहे इनके वेतन को २  लाख रूपये महीने का कर दे पर इनसे यह पूछने  की हिम्मत ज़रूर रखे कि कौन सा जादुई चिराग इनके हाथ लग गया है जिसके द्वारा ये लोग अचानक संपन्न हो जाते हैं और प्रदेश की जनता जिसके दिए गए कर से इनको वेतन मिलता है रोज़ गरीब ही हुई जा रही है  ?
किसी को कोई मतलब नहीं है कि कौन क्या कर रहा है पर जब माननीय कहलाने वाले ये लोग ही इस तरह के मामलों में जनता के सामने बेपर्दा हो जाते हैं तो उनकी इज्ज़त क्या होगी ? मैं यहाँ पर सभी से विनम्र निवेदन करना चाहूँगा कि वेतन में विसंगति नहीं होनी चाहिए पर विधायकों के लिए मंहगाई है तो क्या राज्य कर्मचारियों के लिए नहीं है ? सरकार को सभी के बारे में समान रूप से सोचना चाहिए तभी वह सर्व जन की सरकार बन पायेगी वरना विधायकों की सरकार तो हमेशा से ही रही है और भविष्य में भी रहती रहेगी. प्रदेश में काम करने वालों की कमी है राज करने वालों की नहीं फिर भी एक ऐसी सरकार जिसमें शामिल अधिकांश लोगों ने जनता के दुःख दर्द को पास से समझा हो वह भी इस तरह से काम करे तो गरीब जनता के बारे में कौन सुनेगा ? बस इसलिए ही कहा जाता है कि जब कोई दावत में बैठा हो और अँधेरी रात हो तो वो ध्यान रख कर वहीँ पर अच्छी तरह से सेवा करता है जहाँ उसके अपने बैठे होते हैं और अँधेरी रात में कोई यह भी नहीं देख पाता है कि किसने किसको कितना दे दिया ? 

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सोमवार, 8 फ़रवरी 2010

चिदम्बरम की जय हुई ...

रविवार को दिल्ली में आंतरिक सुरक्षा के मसले पर हुई मुख्य मंत्रयों कि बैठक में भाजपा शासित राज्यों के मुख्य मंत्रियों ने नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में केंद्रीय गृह मंत्री पी चिदंबरम की बहुत तारीफ की. बहुत दिनों बाद देश में एक वास्तव में चुप चाप काम करने वाला गृह मंत्री मौजूद है और जो राज्य अपने यहाँ सुरक्षा सम्बन्धी मामलों में अभी तक फैसले का इंतज़ार कर रहे  थे  उनको  इस  मामले  में काफी  सहयोग  भी  मिला  है . यह  सही  है  कि देश में हर  बात  पर राजनीति  की जाती  है  जिससे  विकास  सुरक्षा आदि  के मसले भी  इसी कि  भेंट  चढ़  जाते  हैं . यह  सही  है  कि  कोई  एक व्यक्ति  केवल  अपने  दम  पर सब  कुछ  नहीं  बदल  सकता  है  पर आवश्यकता  होने  पर वह  बदलाव  के संकेत  तो  दे  ही  सकता  है  कि अब  बदलाव  का  समय  आ  गया  है . देश में विकास  और  सुरक्षा के साथ  शिक्षा  पर कोई  मतभेद  होना  ही  नहीं  चाहिए  पर यह  देश का  दुर्भाग्य  है  कि आज  तक  कुछ  भी  ठोस  कार्य  योजना  नहीं  बनायीं  जा  सकी  है  जो  समय  रहते  सब  कुछ  ठीक  कर  सके . देश में सब  कुछ  इतना  स्याह  भी  नहीं  है  जितना  कि कुछ  लोग  अपने  फायदे  के लिए  बताया  करते  हैं  फिर भी  किसी  न  किसी  स्तर  पर अभी  भी  बहुत  सुधार  की आवश्यकता  है .
बात यहाँ पर मोदी के तारीफ करने की नहीं है यह भी सही है कि देश में बहुत से लोग मोदी कि विचारधारा से सहमत नहीं है पर इसके बाद भी जिस तेज़ी से गुजरात ने मोदी के नेतृत्व में विकास के नए मानदंड स्थापित किये हैं उनकी अनदेखी भी तो नहीं की  जा सकती है. ठीक उसी तरह से जब भाजपाई मुख्यमंत्री पी सी की तारीफ करते हैं तो उसमें भी कुछ बुरा नहीं है.देश हित में अगर अप्रत्य को पीछे छोड़कर कोई सही कदम उठाना चाहता है तो उसमें पूरी मदद देनी चाहिए. अच्छा हो कि अब देश में घटिया राजनीति को पीछे छोड़ दिया जाये और आगे आकर कुछ ठोस करने कि तरफ भी सोचा जाये.  


मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2010

पारिख समिति और हम

सरकार के सामने आज पेट्रोलियम पदार्थों के दाम को काबू में रखने की बहुत बड़ी चुनौती है. यह एक ऐसा क्षेत्र है जिसमें चाह कर भी सरकार कुछ अधिक नहीं कर सकती है. आज के समय जब अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की कीमतें एक बार फिर ७५ डालर तक हो गयी हैं तो सरकार कब तक तेल कंपनियों पर दबाव बना सकती है ? देश में सरकारी क्षेत्र के बहुत सारे उद्योग सिर्फ इसलिए ही ख़त्म हो जा रहे हैं क्योंकि उन पर सरकार का दबाव बहुत अधिक है. यह सही है कि हर सरकार को जनता का सामना करना होता है और कोई भी यह नहीं चाहता कि सरकार पर जन विरोधी होने का आरोप लगे. पर यहाँ पर एक बात हम सभी को समझनी ही होगी कि कृत्रिम रूप से आख़िर कब तक इन कीमतों को रोक कर रखा जा सकता है ? भारत में हम अपनी ज़रुरत चाह कर भी पूरी नहीं कर सकते हैं क्योंकि उत्पादन का स्तर बहुत कम है. फिर भी आखिर क्यों सभी पेट्रोल आदि पदार्थों को सस्ता ही चाहते हैं ? इस तरह से तो एक ऐसा दिन भी आ जायेगा जब सरकार के पास इन कम्पनियों को देने के लिए पैसे नहीं होंगें तब देश इस समस्या से किस तरह से निपटेगा ?
बेहतर होगा कि हम सभी इस मामले पर ध्यान दें क्योंकि किसी भी मूल्य वृद्धि का सबसे अधिक असर जनता पर ही पड़ता है पर जागरूक जनता होने के कारण क्या यह हमारी ज़िम्मेदारी नहीं बनती है कि देश के नव रत्नों को हम भिखारी न बनने दें ? जब ये नव रत्न ही नहीं रह जायेंगें तो हम  तेल कहाँ से खरीदेंगें ? देश में सबसे पहले किरोसिन की कीमतें बढ़ाई जानी चाहिए क्योंकि जो सहायता सरकार किरोसिन पर देती है उसका बड़ा हिस्सा मुनाफाखोरों तक पहुँच जाता है. गरीब जिसके लिए सरकार यह कहती है कि सहायता दे रहे हैं वह तो बाज़ार से ही बहुत मंहगा तेल खरीदता है और बिचौलिए जम कर काला बाज़ारी करते रहते हैं. घरेलू गैस पर एकदम से नहीं तो हर वर्ष करीब ५० रूपये तो बढ़ाये ही जाने चाहिए क्योंकि तभी इसकी कीमतों को भी सही स्तर तक लाया जा सकेगा. जब यह सारे पदार्थ बिना किसी नियंत्रण के उपलब्ध होंगें तो लोगों के लिए काला बाज़ारी करने के अवसर कम हो जायेंगें. पर आज के समय में हर एक को अपने वोटों की चिंता है और अपनी चिंता में तेल कंपनियों का तेल निकल रहा है यह देखने कि फुर्सत भी किसे है ?
     

मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

गुरुवार, 4 फ़रवरी 2010

नेता को आदर दो ?

केरल सरकार को एक ऐसा आदेश जारी करना पड़ा जिसे देख कर वास्तव में लगता है कि नेता किसी इज्ज़त के लायक बचे भी हैं या नहीं ? अपने ताज़ा आदेश में सरकार ने सभी सरकारी कार्यालयों के अधिकारियों से यह अपेक्षा की है कि किसी भी जन प्रतिनिधि जैसे सांसद/विधायक के आने पर उनका खड़े होकर सम्मान करें और उन्हें जाते समय बाहर तक छोड़ कर आयें. वाह रे जनतंत्र !!! अब इस तरह से नेता अपनी इज्ज़त कराना चाहते हैं ? किस जनतंत्र का सपना आज़ादी के मतवालों ने देखा था ? क्या उन्होंने ऐसा भी सोचा होगा कि उनके समय के नेताओं की एक आवाज़ पर जाने कितने लोग अपना सब कुछ छोड़कर जान लुटाने और ज़ुल्म का विरोध करने के लिए आगे आ जाते थे आज वही लोग क्या सरकारी अधिकारी कर्मचारी भी उन नेताओं की उतनी भी इज्ज़त नहीं करते कि उन्हें एक सामान्य शिष्टाचार के नाते ही कुछ मान लें ?
इतनी गिरावट कभी कैसे आ सकती है कि नेता अपनी इज्ज़त करवाना चाहें ? क्यों नहीं वे अपने मानदंड इतने ऊंचे स्थापित करते हैं कि उनके आने पर सम्मान स्वयं ही किया जाये उसे किसी अनुशासन में नहीं बांधा जाये. कितनी नैतिक गिरावट अभी और आनी बाकी है किस दिशा में इस तरह के आदेश दिए जा रहे हैं ? यह सभी को पता है कि जो अधिकारी कर्मचारी सरकार की सेवा में हैं उनको यह तभी से पता होता है कि जन प्रतिनिधियों को उचित सम्मान देना है पर किन परिस्थियों में वे यह भूल रहे हैं ? कौन उनको यह सब भुलाये दे रहा है ?  आज समय है कि नैतिक गिरावट जो रसातल तक पहुँच चुकी है उसके बारे में इन नेताओं को ही कुछ सोचना होगा तभी जाकर उनकी फिर से प्रतिष्ठा हो पायेगी. कहा  भी जाता है कि सम्मान देने से ही सम्मान मिलता है पर क्या आज के नेताओं में किसी और का सम्मान करने के लिए इच्छा भी बची है ?  

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बुधवार, 3 फ़रवरी 2010

दहेज़ और मंत्री...

उत्तर प्रदेश में अजीबो गरीब मामले कभी ख़त्म नहीं होते हैं इस कड़ी में ताज़ा मुद्दे में प्रदेश के खेल मंत्री अयोध्या प्रसाद पाल द्वारा अपने बेटे की शादी इसलिए तोड़ दी गयी  कि उनकी ५० लाख रूपये की मांग को पूरा करने में चित्रकूट के एक डाक्टर असमर्थ थे. समझ में नहीं आता है कि इस तरह के पदों पर बैठे लोगों की सोच इतनी घटिया कैसे हो सकती है ? आज के समय में क्या पैसा ही सबसे महत्वपूर्ण है ? यह सही है कि देश में दहेज़ हमेशा से ही एक कुरीति रहा है और आज भी न जाने कितनी योग्य लड़कियां केवल दहेज़ न जुटने के कारण ही अविवाहित रह जाती हैं और न जाने कितनों को शादी के बाद प्रताड़ित किया जाता है ? मामला तब और भी संगीन और शर्मनाक हो जाता है जब मंत्री पद पर बैठा व्यक्ति भी अपने बेटे की नीलामी करने की तरफ चला जाता है. दहेज़ का जाति बिरादरी से कुछ भी लेना देना नहीं होता यह तो सभी लोगों में सामान रूप से फैला हुआ ज़हर है.
इस मामले की पूरी जांच करायी जानी चाहिए और यदि मंत्री या लड़की वाले जो भी दोषी हों उनके विरुद्ध सख्त  कार्यवाही की जानी चाहिए जिससे कम से कम सार्वजानिक जीवन में रहने वाले लोगों को देख कर कोई इस तरह का काम दोबारा करने से पहले कई बार सोचने पर मजबूर हो जाये. इस तरह के मामले में सबसे अधिक समस्या लड़की के लिए होती है क्योंकि परिवार पर पड़ने वाला दबाव अंत में उस पर ही भारी पड़ता है. आज भी दहेज़ मांगने वालों की कमी नहीं है पर जब प्रभावशाली लोग ही इस तरह से आगे बढ़कर धन का दुरूपयोग करते नज़र आयेंगें तो कोई और उनसे क्या सीख पायेगा ? हर पहलू पर विचार करने के बाद दोषियों को सजा दी जानी चाहिए पर आज प्रदेश में जिस तरह से पार्टी में रहकर गलत काम करने वालों पर कोई आँखे उठाकर देख भी नहीं सकता है तो इस मामले में क्या कुछ हो भी पायेगा ?

मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

रविवार, 24 जनवरी 2010

मुस्लिम औरतें और फोटो...

तमिलनाडु के एक मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने यह आदेश देकर इस मामले को ख़त्म ही कर दिया है कि मुस्लिम औरतों के फोटो खींचने की इस्लाम में मनाही है. यह सही है की इस्लाम के अनुसार औरतों को परदे में रहना चाहिए पर आज के इस युग में जब लड़कियां पढ़ाई में रोज़ नए कीर्तिमान स्थापित करती जा रही हैं तो किस प्रयास के तहत उनको इन सबसे वंचित किया जा रहा है ? क्या अभी तक हज करने जाने वाली मुस्लिम महिलाओं के फोटो नहीं खींचे जाते थे ? क्या विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में बैठने वाले बच्चों के फोटो नहीं लिए जाते ? क्या मुस्लिम शादियों में भले ही घरेलू स्तर पर ही सही क्या आज फोटो  नहीं लिए जाते ? फिर केवल एक बात कि मतदाता पहचान पत्र के लिए फोटो खींचना इस्लाम के खिलाफ है कैसे सही हो सकता है ? न्यायालय ने बिलकुल सही निर्णय देते हुए कहा है की यदि वे अपनी फोटो नहीं खींचना चाहते तो वोट देने की भी क्या ज़रुरत है ? सभी जानते हैं कि मतदाता सूचियों का क्या हाल है इस देश में कौन जा कर किसे देख रहा है और कौन बेपर्दा हुआ जा रहा है ? ईरान में अधिकांश महिलाओं के चेहरे खुले रहते हैं पर उनका बाकी शरीर ढका रहता है तो क्या उन महिलाओं को बेपर्दा या इस्लाम विरोधी मान लिया जाना चाहिए ? नहीं वे अपने धर्म का अच्छे से पालन करते हुए दुनिया के साथ कदम मिला कर चल रही हैं. फिर भारत में क्यों किसी महिला को इस तरह के बंधनों में जकड़ने का प्रयास किया जा रहा है ?
आज मुरादाबाद की खुशबू मिर्ज़ा इसरो में वैज्ञानिक है तो क्या परदे में रहकर ? उसे किसने सलाह दी थी कि तुम इतने आगे तक जाने की सोचो ? मुस्लिम भी बाकि अन्य धर्मों के अनुयायियों के बराबर हैं बस उन्हें इस तरह के अनावश्यक बंधनों से मुक्त कर देने की ज़रुरत है . क्या कारण है कि भारत सरकार को केवल अल्पसंख्यकों के लिए अलग से विकास की बात करनी पड़ती है ? यह हम सभी जानते हैं  कि जब अल्पसंख्यकों के बारे में बात होती है तो अधिकांश वह मुस्लिमों की ही बात होती है ? किसी ने कभी सोचा कि मुस्लिम क्यों इतनी मेहनत करके भी परेशान क्यों हैं ?? क्योंकि वहां पर शिक्षा की कमी है बिना शिक्षा के उचित प्रसार के आगे बढ़ने की बात भी बेमानी होती है इसे जितनी जल्दी समझ लिया जाये वही अच्छा है.   

मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

शुक्रवार, 22 जनवरी 2010

पाक खिलाड़ी और पैसा...

भारतीय क्रिकेट के सबसे बड़े बाज़ार में पाक के खिलाडियों को किसी ने भी नहीं पूछा इससे पाक के खिलाड़ी बहुत हताश नज़र आये. यह सही भी है की चंद लोग अपने व्यक्तिगत कारणों से भारत-पाक मैत्री के गुण गाते रहते हैं पर क्या किसी ने इस बात पर ध्यान दिया है की पाक में लोग आम तौर पर भारत के बारे में क्या सोचते हैं और भारत के साथ किस तरह का व्यवहार करना चाहते हैं ? ९/११ ने सारी दुनिया में मुसलमानों को संदिग्ध बन दिया अब इस बात का कोई भेद नहीं रह गया है की वह पाक का आतंकी है या भारत का शाहरुख़ खान ? पश्चिमी देश मुसलमानों से अपने ढंग से निपटना चाह रहे हैं. आखिर कौन है इस स्थिति के लिए ज़िम्मेदार ? केवल भारत सरकार को कोसने से काम नहीं चलने वाला है, अगर पाक के खिलाड़ी वास्तव में क्रिकेट के लिए संजीदा हैं तो उन्हें अपने देश की सरकार पर वहां के जनमत के साथ दबाव बनाना चाहिए जिससे आतंकियों को कुचला जा सके. एक तरफ से सद्भावना की बहुत सारी बातें की जा चुकी हैं और साथ ही वाघा बार्डर पर बहुत सारी मोमबत्तियां भी भारतीयों ने जलाने का प्रयास किया है. आई पी एल पर सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है वह अपने आयोजन के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है यहाँ तक स्वतंत्र की पिछले वर्ष चुनाव के समय सुरक्षा कारणों से जब सरकार ने मना किया तो पूरा आयोजन ही दक्षिण अफ्रीका चला गया. भारत सरकार और खेल मंत्रालय में पाक की जो भी सहायता की जा सकती थी की गयी अब यदि उनके अपने कर्मों से कोई उन अच्छे खिलाड़ियों पर भी बोली लगा कर अपने लाभ में कमी नहीं लाना चाहता तो कोई कैसे दबाव बनाये ? आज क्रिकेट में पैसा ही सब कुछ है और पाक खिलाडियों को खेल से ज्यादा पैसे की ही चिंता है क्योंकि खेल के लिए इतना कोई नहीं चिल्लाता है.
भारत में २६/११ के बाद पाक के नाम से ही फिर से पुरानी चिंताएं और आतंक का नाम सामने आता है तो कोई भी टीम कैसे उन खिलाडियों पर दांव लगाकर अपने लाभ में कमी ला सकती है. यहाँ तक की इस पैसे के कारण ही शाहरुख़ खान और पाक के संस्थापक जिन्ना के नाती नेस वाडिया भी किसी पाक खिलाड़ी के बारे में नहीं सोच सके ? अब जब समय है कि पाक आतंक के चंगुल से निकले और भले ही दुनिया को विश्वास न दिला पाए पर यदि वह भारत को यह भरोसा दिला पाए कि अब पाक की ज़मीन से भारत के खिलाफ साजिशें नहीं होंगीं तो भारत के हर घरेलू आयोजन में पाक के खिलाड़ियों को शामिल करने में किसी को कोई आपत्ति नहीं होगी पर १००० साल तक भारत से लड़ने की कसम खा कर किस तरह से भारतीय पैसे पर मौज उड़ाने की सोची जा सकती है ?  ललित मोदी ने भारत के रुख को नहीं भांपा पर टीम के मालिकों को यह बहुत अच्छे से पता था कि पाक के खिलाड़ियों को लेना कितना मंहगा साबित होने वाला है तो उन्होंने पैसे को तरजीह दी न कि पाक खिलाड़ियों को.....


मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

बुधवार, 20 जनवरी 2010

कुम्भ में भी मैली गंगा.....

फिलहाल कुम्भ मेले की तैयारियों के बीच एक ऐसी रिपोर्ट आई है जो गंगा में श्रद्धा रखने वालों के लिए बहुत ही कष्ट देने वाली है. रिपोर्ट के अनुसार इस कुम्भ में गंगा हरिद्वार में भी डुबकी लगाने के लिए सुरक्षित नहीं है. ज्वालापुर में इसकी हालत सबसे बुरी मिली जबकि हर की पैड़ी, सप्त ऋषि आदि स्थानों पर यह मात्रा प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मानकों से बहुत अधिक पाई गयी. २५ वर्ष पहले जब राजीव गाँधी ने पहली बार गंगा एक्शन प्लान पर काम किया था तब से आज तक कुछ भी ठोस नहीं  किया गया है. यह भी ठीक है कि उस समय उनके प्रयासों से गंगा में प्रदूषण की मात्रा में भी काफी कमी आई थी. आज के समय में केवल सरकार को कोसने से काम नहीं चलने वाला है. तीर्थ स्थलों के स्थायी निवासियों को इस बारे में कुछ ठोस करना ही होगा क्योंकि आज के समय में गंगा के कारण ही हरिद्वार है जब गंगा का अस्तित्व ही समाप्त हो जायेगा तो कौन वहां जाना चाहेगा ? क्या हमारी धरोहरों को बचाने की ज़िम्मेदारी भ्रष्ट नेताओं पर डाली जनि चाहिए ? जो जन भावनाओं से खिलवाड़ करके अपने लिए चंद वोटों का जुगाड़ करने में भी नहीं हिचकते हैं उनके लिए किसी की आस्था की क्या कद्र होगी ? अब समय आ गया है कि हम सभी को अपने भरोसे ही कुछ करना होगा तभी जाकर गंगा और देश की अन्य नदियाँ निर्मलता को अपने में समाहित कर पाएंगीं. हम सभी अपने स्तर पर इतना तो कर ही सकते हैं कि किसी भी परिस्थिति में नदियों को गन्दा नहीं करें. कोई भी व्यक्ति बाहर से नहीं आने वाला है हमारी नदियों को साफ करने के लिए.... जब हम स्वयं ही यह सोच लेंगें कि नदियाँ हमारी धरोहर और जीवन हैं तो हम इनको साफ भी रख पायेंगें. हिन्दू दर्शन में नदियों, वनों, पहाड़ों और अन्य बहुत सी वस्तुओं को देव माना गया है क्यों ? सिर्फ इसलिए कि हम इनके साथ सह अस्तित्व की भावना रखें. जीव जंतुओं तक के साथ भी अच्छा व्यवहार सिखाया गया है हमारे ग्रंथों में ... पर हमें अपने आप कुछ भी नहीं दिखाई देता है जब विदेशी चिल्लाते हैं कि गंगा मैली हो रही है तो हरिद्वार में रहने वाले भी चिल्लाने लगते हैं कि भाई अब तो सरकार को कुछ करना ही चाहिए और सरकार को कोस कर हम चुप हो जाते हैं नदियाँ वोट नहीं देतीं वरना उनके पुनर्वास के लिए अभी कई योजनायें आ गयी होतीं. अब भी बहुत देर नहीं हुई है हम सभी चेत जाएँ तो सब कुछ सुधर सकता है और गंगा में फिर से निर्मलता आ सकती है ...  

मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

रविवार, 17 जनवरी 2010

प्राथमिक शिक्षा की दुर्दशा

देश में प्राथमिक शिक्षा पर एक संस्था प्रथम द्वारा जो रिपोर्ट जारी की गयी है वह वास्तव में ही आँखें खोलने वाली है. आज के समय में जिस तरह से सरकार की प्राथमिकता में बच्चों को केवल साक्षर करने के लिए ही प्रयास किये जा रहे हैं जिसका असर सीधे ही अब दिखाई देने लगा है. रिपोर्ट के अनुसार अधिकांश बच्चे जो कक्षा ५ में हैं कक्षा २ की पुस्तकें भी नहीं पढ़ पाते हैं. इसके लिए सीधे ही शिक्षा का तंत्र ज़िम्मेदार है. आज के समय में हम बच्चों को सपने तो चाँद के दिखा रहे हैं पर उनके लिए विज्ञान को पढ़ने लायक माहौल भी नहीं दे पा रहे हैं. केवल पढ़कर ही वे अपनी जानकारी बढ़ा लें यही बहुत है उनसे ऐसी स्थिति में और क्या आशा भी की जा सकती है ? जब बच्चे अपनी पाठ्य पुस्तकें ही नहीं पढ़ सकते तो उनसे किसी अन्य भाषा का ज्ञान आदि की उम्मीद करना ही बेईमानी है. प्राथमिक शिक्षा के स्तर पर जितने लोग उतनी बातें होती रहती हिं. क्यों नहीं कुछ चुने हुए प्रस्तावों में पर केवल आंकलन करने के लिए पढ़ाई करनी चाहिए जिससे यह पता चल सके की भारत के लिए कौन सा तंत्र ठीक है ? देश में ही कुछ लोग पूरी तरह से नयी पद्धति पर अपने यहाँ बच्चों को पढ़ाना शुरू भी कर चुके हैं फिर भी क्या कारण है की सरकार केवल देखने के लिए भी कुछ नहीं करना चाहिए. सबसे पहले एक काम किया जाना चाहिए कि देश में एक ही मानक पर पढ़ाई करायी जानी चाहिए. राज्यों के हाथ से पाठ्यक्रम बनाने की ज़िम्मेदारी वापस ले लेनी चाहिए जिससे सभी बच्चों को एक जैसा माहौल दिया जा सके. सरकार की तरफ से कैसे कैसे अघोषित आदेश जारी होते रहते हैं एक बानगी देखिये कि उत्तर प्रदेश में प्राथमिक कक्षाओं में कितने बच्चे अपनी कक्षा में फेल होते हैं ? सरकारी विद्यालयों के आंकड़े देख कर सभी चकरा जाने वाला है क्योंकि कोई फेल होता ही नहीं... जब किसी को फेल ही नहीं किया जायेगा तो बच्चों को किस बात का डर होगा ? किस तरह के मूल्यांकन के बाद बच्चों को अगली कक्षा में भेज दिया जाता है किसी के पास इस बात का उत्तर नहीं है ? जब इस तरह से ही पास कर दिया जाना है तो बच्चों पर अनावश्यक दबाव क्यों ? उन बच्चों का केवल नाम लिख लिया जाना चाहिए और उनको पुस्तकें दे देनी चाहिए और ५ साल बाद जाकर उन्हें पांचवी पास का प्रमाणपत्र दे देना चाहिए. इससे कम से कम सरकार का पढ़ाने पर लगने वाला खर्च तो बच ही जायेगा. कोई नहीं चिंतित है इस देश के भविष्य के लिए ? किसी को चिंता नहीं है कि इस देश के भविष्य के साथ कैसा खिलवाड़ किया जा रहा है ? कौन पूछेगा और किससे और कौन जवाब देगा ? अच्छा हो कि पढ़ाई के लिए विद्यालय अलग हों और केवल साक्षर करने के लिए अलग... क्योंकि साक्षर करना अलग बात है और ज्ञान प्राप्त करना बिलकुल अलग .... पता नहीं सरकार ने शिक्षा को साक्षरता से क्यों जोड़ दिया ? अब इस के दुष्परिणाम सामने आ रहे हैं, अच्छा हो कि साक्षर करने वाले विद्यालयों में ही मध्यान्ह भोजन दिया जाये और जिन्हें शिक्षा प्राप्त करनी है वे अपनी व्यवस्था स्वयं करें. इस योजना ने शिक्षकों और ग्राम प्रधानों का ऐसा गठ-जोड़ तैयार कर दिया कि जिससे निकल पाना अब मुश्किल है ऊपर से सत्ताधारी दलों के विधायक लोगों को भी बच्चों के खाने में हिस्सा चाहिए बस और कैसे क्या किया जाये कि सब ठीक हो जाये ? इतने पर भी अगर बच्चे कक्षा दो कि पुस्तकें पढ़ लेते हैं तो क्या उन्हें बधाई नहीं देनी चाहिए ? 

मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

शनिवार, 16 जनवरी 2010

कसाब पर नज़र..

जैसा कि अमेरिकी जांच में सामने आता जा रहा है कि मुंबई हमलों के दौरान लश्कर ने पूरी कोशिश की थी कि किसी तरह बंधकों को छोड़ने के लिए कसाब की सौदेबाज़ी की जाये उससे इन आतंकियों के घातक मंसूबों का पता चलता है. भारत की छवि एक नर्म देश की रही है जो संकट के समय शीघ्रता से कोई भी फैसला नहीं ले पाता है, आतंकियों ने इस बात का फायदा उठाने की भरपूर कोशिश की परन्तु सारा कुछ इस तरह से जनाक्रोश में बदल चुका था कि यदि सरकार किसी तरह के समझौते के बारे में सोचना भी चाहती तो नहीं सोच पाती. जब लश्कर के आतंकियों को यह पता चला कि ताज होटल में कुछ मंत्री भी फंसे हैं तो उनको एक बार अपने मंसूबे कामयाब होते ज़रूर दिखे थे पर बिना तैयारी के भी जिस तरह से पुलिस बल और एन एस जी ने वहां पर कड़ा मोर्चा लिया उससे आकाओं के हाथ पैर फूल गए. आज भी इस बात पर अधिक ध्यान देने की ज़रुरत है  कि इन आतंकियों पर जल्दी ही कोई फैसले लिए जाएँ और इनको मुक़दमे के बहाने जेल में न रखा जाये. देश ने पता नहीं कितनी बार इन विचाराधीन कैदियों के कारण भी नीचा देखा है. कंधार कांड आज भी दिल पर बोझ की तरह ही तो है. इन सभी की तो सुरक्षा की जा सकती है पर देश भर में अन्य विशिष्ट व्यक्तियों के बारे में क्या कहा जाये जो सुरक्षा में तो ज़रूर रहते हैं पर कभी भी उन पर खतरा आ सकता है. फिल हाल आतंकी मामलों में विचाराधीन कैदियों को जल्द ही सज़ा दे देनी चाहिए जिससे बहुत सारी आने वाली समस्याएं भी न उत्पन्न हो सकें. देश में इस बात पर भी पूरी सहमति होनी चाहिए कि किसी भी परिस्थिति में किसी भी आतंकी को नहीं छोड़ा जायेगा क्योंकि जब तक ऐसे कड़े सन्देश नहीं दिए जायेंगें तब तक आतंकी कभी भी हमारा इस्तेमाल कर सकते हैं.  


मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

शुक्रवार, 15 जनवरी 2010

बसपा या सत्ता की कामयाबी ?

आज बसपा जब अपनी प्रमुख मायावती का जन्मदिन मनाने जा रही है तो उसके लिए इस जन्मदिन के खास मायने इसलिए भी हैं क्योंकि प्रदेश के इतिहास में पहली बार किसी दल ने विधान परिषद् चुनावों में इतनी बड़ी कामयाबी दर्ज की है. इन चुनावों में विपक्षी दल सरकारी गुंडागर्दी का रोना रो रहे है जबकि आंकड़े बताते हैं कि यह चुनाव पूरी तरह से उस पार्टी का होता है जो सत्ता में होती है. पहले भाजपा फिर सपा इस स्वाद को चख चुके हैं जब उन्होंने अपनी सरकार में गुंडागर्दी की थी. इस चुनाव में चूंकि आम जनता मत नहीं देती है इसलिए यह चुनाव सरकारी तंत्र और दंडात्मक दवाब तथा पैसे के लालच में ही हो जाते हैं इस बार वोटरों के लिए शराब /शबाब और कबाब की भी व्यापक व्यवस्था की गयी थी. जिस तरह से इन चुनावों का सञ्चालन किया जाता है उसमें कुछ भी असंभव नहीं है. चुनाव के समय सरकारी डंडे से इसे जीत लेना आसान होता है पर जब जनता की अदालत में मुक़दमा पेश किया जाता है उसमें ये सरकारें हमेशा से पिटती रही हैं. पहले भाजपा फिर सपा का सूपड़ा साफ़ होते हुए सभी देख ही चुके हैं. इन चुनावों में जिस तरह से प्रशासन पर दबाव डाला गया वह भी किसी से छिपा नहीं है, इस तरह के दबाव को प्रशासन के लोग तभी तक सहते हैं जब तक उन्हें सरकर का डर होता है पर जब आम चुनाव होने जा रहे होते हैं तो यही अधिकारी खुलकर सत्ता के खिलाफ होकर दूसरे दलों की मदद करके जनता का पीछा इन भ्रष्ट नेताओं से छुड़ाने में काफी मदद कर देते है. आत्म प्रवंचना में जीने से कुछ हासिल नहीं होने वाला है इसके लिए बहुत आवश्यक है कि जनता की समस्याओं पर अविलम्ब ध्यान दिया जाये हो सकता है कि प्रदेश में कुछ लोगों को लाभ मिला हो पर जिस स्तर पर उन्हें लाभ मिलना चाहिए था नहीं मिल पाया है. सरकार के काम में कमी तो नहीं है पर माया जिस तरह से सारा कुछ अपने हाथ में ही रखना चाहती हैं उससे बहुत सारे मंत्रालयों में मंत्री डर के मारे काम ही नहीं करना चाहते कि कहीं वे नाराज़ न हो जाएँ ? जब सरकार के तंत्र के लोग इस तरह से काम कर रहे हों तो उसके प्रदर्शन पर असर तो आना ही है. फिर भी इन चुनावों के बहाने से जो भी किया जा रहा हो पर देश के लोकतंत्र का गला घोंटने में भ्रष्ट नेताओं ने कोई कसर नहीं छोड़ी. सांसदों और विधायकों तक ने मतदान केंद्र के अन्दर बैठकर दबाव से जबरन अपना आदमी भेजकर वोट डलवाने का काम किया पर पता नहीं क्यों चुनाव आयोग के मुंह पर ताला है या वह सबूतों के अभाव में कुछ भी कर पाने में सक्षम नहीं है ?    


मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

गुरुवार, 14 जनवरी 2010

मंहगाई की राजनीति..

आज जिस तरह से देश में आवश्यक चीज़ों के दाम बढ़ते ही जा रहे हैं उसका असर बहुत जल्द लोगों को और परेशान करने वाला है. मंहगी होती वस्तुओं के बारे में जिस तरह से केंद्र और राज्य सरकारें अपनी ज़िम्मेदारियों को एक दूसरे की तरफ उछाल रहे हैं उससे तो बाज़ार में जमाखोरी करने वालों को और मौका मिलने वाला है. यह वह समय है जब सरकारी तंत्र को केंद्र राज्य का झगड़ा छोड़कर अपना काम ठीक से करना चाहिए और जमाखोरों के ख़िलाफ़ सख्त कार्यवाही करनी चाहिए तो वे एक दूसरे पर कीचड फेंकने में लगे हुए हैं. यह बिलकुल सही है कि  उत्पादन में कमी आई है पर बिलकुल बेकार और नाकारा साबित हुए कृषि मंत्रालयों का यह देश क्या करे ? आज उत्पादन बढ़ाने पर कोई ज़ोर नहीं हैं सभी यह बताने की कोशिश कर रहे हैं कि इस मामले में मेरी कमीज़ उसकी कमीज़ से ज्यादा सफ़ेद है. मंत्रालयों के पास आंकड़े हैं पर उनका उपयोग नहीं किया जा रहा है. एक उदाहरण उत्तर प्रदेश का लिया जा सकता है जहाँ पिछले कुछ वर्षों से गन्ना किसानों को उनका सही मूल्य नहीं दिया गया और आज की तारीख में जब किसानों ने गन्ना बोया ही नहीं और जो हुआ उसे वे चीनी मिलों के बजाय खुले बाज़ार में बेच रहे हैं तो शकर की कड़वाहट की याद सरकारों को भी आ गयी. पहले जब कोई बताने वाला नहीं था और किसान केवल जैविक खादों का प्रयोग करता था तो उत्पादन भले ही कुछ कम रहता था पर उसमें स्वाद होता था और मनुष्यों में बीमारियाँ भी कम होती थीं. हर किसान के पास यह ज्ञान था कि उसे अपनी भूमि में क्या और कितनी मात्र में बोना है ? उसके पास भले ही मोबाइल नहीं थे जिन पर मंडी का रेट मिलता हो पर उसे यह ज़रूर पता था कि उसका परिवार साल भर में कितने अनाज पर जिंदा रह सकता है ? उसके खाने की डाल उसके खेत में ही हो जाती थी उसे चावल और गेंहूँ की कीमतों का ध्यान भी नहीं रखना पड़ता था. अब समय आ गया है कि देश के लिए जो तरीका पुराना तरीका उचित है उस पर ही खेती को प्रोत्साहन दिया जाये. आज पश्चिमी देश जैविक उत्पादों के पीछे भाग रहे हैं और हमारे यहाँ का किसान यूरिया और खाद के लिए सरकारी निकम्मेपन के कारण लाठी खाकर अस्पताल में भर्ती हो रहा है. यह है अन्धानुकरण करने का नतीजा .... अगर हम आज भी नहीं चेते तो वह समय दूर नहीं जब हम ऐसी स्थिति में होंगें कि सोचकर भी अगले २०/३० सालों तक स्थिति को सुधर नहीं पायेंगें. देश में विकास दर ११ से ऊपर है पर कृषि विकास कि दर कितने पर चल रही है क्या कोई बताने की हिम्मत भी रखता है ?   


मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

बुधवार, 13 जनवरी 2010

विमान अपहरण पर सख्त कानून..

मंत्रियों के समूह ने जिस तरह से विमान अपहरण करने वालों को मौत की सजा देने का प्रावधान किया है वह बहुत देर से उठाया गया सही कदम है. देश को सुरक्षित रखने के लिए जो कुछ भी बन पड़े किया जाना चाहिए पर कुछ भी करने से पहले उस तरह के हादसों का इंतज़ार भी नहीं करना चाहिए क्योंकि जो समस्या आज दूसरे देशों के साथ है वह कल हमारे साथ भी हो सकती है. बेहतर हो कि इन सबसे निपटने के लिए एक बार में ही आतंक निरोधी कानून बनाकर सारे संशोधन कर लिए जाने चाहिए. भारत में बहुत सारे मंत्रालयों के जुड़े होने से कुछ काम जल्दी नहीं हो पाते हैं इसके लिए सीधे ही गृह मंत्रालय में एक आतंक निरोधी विभाग बनाकर राज्य मंत्री की नियुक्ति की जानी चाहिए और उससे जुड़े सभी मामले सीधे गृह मंत्री और प्रधानमंत्री के सामने जाने चाहिए. कानून में ऐसा भी होना चाहिए कि इसकी बैठक को अन्य सभी बैठकों पर प्राथमिकता दी जाये जिससे यह भी अन्य विभागों के निष्क्रिय मंत्रियों की तरह एक खामोश मंत्रालय ही न हो जाये. आतंक के मसले पर जितनी जल्दी हो सके सारे कानूनों में सुधार कर लिया जाना चाहिए क्योंकि ढीले कानूनों के कारण भी इस तरह की गतिविधियाँ करने के लिए आतंकी इन देशों को अधिक निशाना बनाना चाहते हैं कि अगर पकड़ भी लिए गए तो केवल जेल में ही रहना होगा और उम्र क़ैद से ही काम चल जायेगा. इस तरह के ढीले सन्देश आतंकियों के हौसले को बढ़ाने का काम करते हैं. यह सही है कि कड़े कानून होने से पूरी रोकथाम नहीं होती फिर भी घटनाओं की संख्या पर नियंत्रण तो किया ही जा सकता है. एक बार फिर कि जब तक आम जनता खुद ही जागरूक नहीं होगी कोई भी कानून उसे सुरक्षा नहीं दे सकता है. इसलिए अब समय आ गया है कि हम सभी भी चेत जाये और अपने आस-पास कि हर घटना पर ध्यान रखें.  

मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...