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Monday, 30 June 2014

राष्टीय दलों की मान्यता और शर्तें

                                                  इस बार के आम चुनावों में भाजपा के अभूतपूर्व प्रदर्शन के बाद छोटे राजनैतिक दलों के सामने अपनी राष्ट्रीय पहचान बनाये रखने का बड़ा संकट उभर कर सामने आया है अब चुनाव आयोग द्वारा उस पर कानूनी मोहर लगने वाली है क्योंकि इन चुनावों में आयोग की राष्ट्रीय पार्टी होने की शर्तों पर पहले खरी उतरने वाली सीपीआई, बसपा और एनसीपी को उतने वोट और सीटें नहीं मिल पायी हैं जिनके दम पर ये दल अपने को राष्ट्रीय दल कहलाने के हक़दार बने हुए थे. चुनाव आयोग के निर्देशों के अनुसार कम से कम चार राज्यों में छह प्रतिशत वोट या फिर तीन चौथाई लोकसभा सीटों पर दो प्रतिशत मत मिलने की दशा में ही किसी दल को राष्ट्रीय दल की मान्यता दी जा सकती है और इस बार इन मानकों पर खरे न उतर पाने के कारण तीन दलों की राष्ट्रीय मान्यता खतरे में पड़ती हुई दिखाई दे रही है.
                                                 इस प्रक्रिया के अनुसार कार्यवाही करने के बाद अब केंद्र में सत्ताधारी भाजपा, विपक्षी दल कांग्रेस और सीपीआई एम ही राष्ट्रीय पार्टियों के रूप में देश में रहने वाली हैं जिससे चुनाव के समय इन दलों को ही राष्ट्रीय स्तर पर वे लाभ मिल पायेंगें जो चुनाव आयोग द्वारा निर्देशित किये जाते हैं. इस क्रम में सबसे बड़ा झटका बसपा के लिए ही होने वाला है क्योंकि उसकी प्रभावी उपस्थिति अभी तक कई राज्यों में कांग्रेस और भाजपा के वोटर्स को अपनी तरफ खींचती रही है. एक राष्ट्रीय दल के रूप में आकाशवाणी और दूरदर्शन पर चुनाव प्रचार के लिए समय आवंटन आदि से अब बसपा को दूर कर दिया जायेगा जिससे उसके लिए अखिल भारतीय स्तर पर दलितों के साथ काम करने के प्रयास और खुद को दलित पार्टी के रूप में स्थापित करने में और भी अधिक परेशानी होने वाली है. अब बसपा के लिए २०१७ में आने वाले यूपी के विधानसभा चुनाव आगे की पूरी पटकथा लिखने वाले साबित हो सकते हैं.
                                          लोकसभा चुनावों और विधान सभा के चुनावों में मुद्दे बिलकुल अलग ही हो जाया करते हैं और यदि इस बार यूपी में भाजपा का प्रदर्शन लोकसभा चुनावों की तरह ही रहा तो बसपा के साथ सपा के लिए भी बहुत मुश्किलें खड़ी होने वाली है. अब इन दलों के इन चुनावों में प्रदर्शन के बाद ही इनकी राष्ट्रीय पहचान पर कुछ किया जा सकेगा. इसी वर्ष महाराष्ट्र और हरियाणा के चुनावों में भी यूपी के इन दोनों दलों सपा बसपा के लिए अपनी पुरानी स्थिति बचाने का संकट भी सामने होगा क्योंकि इनको यहाँ भी काफी बड़ी संख्या में वोट मिल जाया करते थे. क्षेत्रीय दलों के राष्ट्रीय स्तर पर इस पतन से जहाँ भाजपा और कांग्रेस के बीच जनता को किसी एक को चुनने की आज़ादी मिलने वाली है वहीं इन दलों को किसी भी परिस्थिति में कम करने की गलती भी दोनों राष्ट्रीय दलों को भारी पड़ सकती है. फिलहाल तो चुनाव आयोग के निर्देशों के इंतज़ार में इन पार्टियों के लिए यह समस्या दरवाज़े पर खड़ी ही दिखाई देती है.
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