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Thursday, 16 April 2015

कैसा मैक्सिमम गवर्नेंस ?

                                            अब जब राजग सरकार अगले महीने अपनी सत्ता वापसी की पहली वर्षगांठ मानाने की तैयारी में लग चुकी है तो मिनिमम गवर्नमेंट मैक्सिमम गवर्नेंस का नारा देकर सत्ता में आई इस सरकार के कार्यों को देखकर कहीं से भी यह नहीं कहा जा सकता है कि इसकी उपलब्धि उस स्तर पर रही है जिसका वायदा इसने चुनावों से पहले किया था. इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता है कि आज मिनिमम गवर्नेंस के नाम पर देश में केवल पीएमओ ही काम कर रहा है और बाकी सभी मंत्रालयों की स्थिति केवल फाइल्स को आगे बढ़ाने तक ही सीमित हो रही है जिससे एक तरफ पीएमओ पर अनावश्यक बोझ बढ़ रहा है वहीं दूसरी तरफ महत्वपूर्ण मंत्रालयों का काम काज भी बुरी तरह से प्रभावित हो रहा है. पूर्ण बहुमत और निर्णय लेने की स्पष्ट क्षमता के दावे के साथ सत्ता में आई सरकार से सामान्य सरकारी गतिविधियों को संचालित करते रहने वाले संस्थानों से जो अपेक्षा होती है क्या वह इसमें सफल हो पा रही है यह आज बहुत ही चिंता का विषय हो चुका है पर इसके बाद भी पार्टी या सरकार इस बारे में कुछ सोच कर आगे बढ़ने के बारे में गंभीर प्रयास करती नज़र नहीं आ रही है.
                           आज वैज्ञानिक एवं अनुसन्धान परिषद के महानिदेशक, देश के दो महत्वपूर्ण केंद्रीय सतर्कता आयोग सीवीसी और सीईसी के अध्यक्ष, रक्षा एवं अनुसन्धान विकास संगठन (डीआरडीओ) के अध्यक्ष, देश की तकनीकी शिक्षा को नियंत्रित करने वाले एआईसीईटी के प्रमुख, स्वास्थ्य क्षेत्र में ३० प्रयोगशालाओं के माध्यम से काम करने वाली आईसीएमआर के महानिदेशक तथा ११०० केंद्रीय विद्यालयों का सञ्चालन करने वाली केंद्रीय विद्यालय संगठन के आयुक्त के पद भी लम्बे समय से खाली पड़े हैं. देश की ज़मीनी हकीकत को बदलने का दावा करने वाली सरकार के पास आज इतना समय नहीं है कि वह इन अति महत्वपूर्ण संस्थाओं के लिए पूर्णकालिक प्रमुखों की नियुक्ति कर सके तो भाषणों में विकास और पूरे देश को बदल देने की बातें कहाँ तक हक़ीक़त में बदल पायेंगीं आज यह बहुत ही चिंताजनक स्थिति के रूप में सामने आ रहा है. उल्लेखनीय बात यह भी है कि इन सभी का मोदी सरकार के उन दावों को ज़मीन पर उतारने से सीधा सम्बन्ध है जिसके बारे में सदैव ही बातें किया करती है तो क्या आज सरकार के काम करने की रफ़्तार केवल कुछ विशेष क्षेत्रों तक ही सीमित नज़र नहीं आ रही है.
                        सरकार रक्षा क्षेत्र में मेक इन इंडिया पर ज़ोर दे रही है पर डीआरडीओ के लिए उसे योग्य व्यक्ति नहीं मिल पा रहा है, उसे देश की वर्तमान शिक्षा व्यवस्था से बहुत सारी शिकायतें हैं पर केंद्रीय विद्यालय संगठन और चिकित्सा क्षेत्र समेत वैज्ञानिक प्रयोगशालों को चलाने वाले संस्थान के लिए एक व्यक्ति की नियुक्ति करने का समय नहीं मिल पा रहा है. गुजरात में सूचना के अधिकार का गला घोंटने की प्रवृत्ति में सफल रहने के बाद क्या आज वही प्रयोग केंद्रीय स्तर पर करने की कोशिश मोदी सरकार द्वारा नहीं की जा रही है ? देश के अप्रशिक्षित लोगों को प्रशिक्षण देने के दावे तो रोज़ ही किये जा रहे हैं पर तकनीकी शिक्षा को नियंत्रित करने वाले समूह भी खाली ही पड़े हुए हैं. क्या देश में एकदम से प्रतिभाओं की इतनी कमी हो गयी है कि सरकार इन पदों के लिए योग्य व्यक्तियों को तलाश कर नियुक्तियां नहीं कर पा रही है आज इस बात का जवाब किसी के पास नहीं है ? आखिर वे कौन से कारण हैं जिनके चलते तेज़ी से काम करने का दावा करने वाले पीएम भी इस मामले में कुछ करते नज़र नहीं आ रहे हैं ? देश को कुछ क्षेत्रों में ही आगे बढ़ाने से पूरा परिदृश्य नहीं सुधर सकता है संभवतः पीएम की नज़रों से यह बात पूरी तरह से ओझल हो चुकी है और वे इन महत्वपूर्ण संस्थाओं को लेकर गंभीर नज़र नहीं आ रहे हैं.            
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