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Thursday, 2 July 2015

डिजिटल इंडिया - आशाएं और चुनौतियाँ

                                                       देश में सूचना क्रांति के पहले कदम १९८५ में पड़ने के बाद से सरकार और जनता ने कितनी तेज़ी से अब पूरी दुनिया के साथ कदम से कदम मिलकर बढ़ना शुरू किया यह आज सभी को पता है पर भारत में आधारभूत ढांचे को खड़ा करने और उसके सही तरह से संचालित होने में आने वाली कठिनाइयों के कारण आज भी हम उस स्तर पर प्रगति नहीं कर पाये हैं जो हमारे देश की क्षमता के अनुरूप कही जा सकती हो. देश को पूरी तरह से डिजिटल करने की कोशिश में केंद्र सरकार द्वारा शुरू की गयी डिजिटल इंडिया परियोजना अपने आप में बहुत कारगर हो सकती है यदि सके क्रियान्वयन में सरकारी क्षेत्र के साथ आम जनता को भी जोड़ने का काम किया जा सके. सरकार इस योजना के तहत देश में नौकरियां और रोजगार सृजित करने की बात कर रही है और देश के बड़े उद्योगपतियों ने जिस तरह से पीएम मोदी के सामने केवल अपनी पीठ थपथपाने का काम किया उससे यही लगता है कि इस योजना से देश को उतना लाभ नहीं मिलने वाला है जितना सोचा जा रहा है क्योंकि पिछले कई वित्तीय वर्षों में बड़ी कम्पनियों द्वारा किये गए निवेश को भी जिस तरह से इस योजना का हिस्सा बताया गया है वह निजी क्षेत्र और सरकार की मंशा जाहिर कर देता है.
                                               देश के शहर अपने आप ही डिजिटल युग में किसी भी तरह से पहुंचे ही जा रहे हैं और इसके साथ हमारे गांवों के लिए वही समस्या बनी रहने वाली है जो आज़ादी एक बाद से ही स्थायी भाव के रूप में मौजूद है. सार्वजनिक क्षेत्र के अतिरिक्त कोई भी निजी कम्पनी आज तक भी देश के दूर दराज़ क्या शहरों से लगे हुए गांवों में अपनी किसी भी प्रकार की सेवाएं नहीं देना चाहती है क्योंकि उसे वहां पर व्यापार की संभावनाएं कम ही नज़र आती हैं. पिछले दस वर्षों में हुई मोबाइल क्रांति की बात भी हम करें तो यह भेद स्पष्ट रूप से सामने आ जायेगा कि निजी क्षेत्र की दिलचस्पी केवल शहरी क्षेत्रों में ही अधिक रही है और वे उन स्थानों पर ही अच्छा निवेश और बेहतर तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं जहाँ से उन्हें बहुत अच्छी आय दिखाई देती है. यदि गौर से देखा जाये तो देश के बड़े शहरों के आसपास की आबादी वाले गांव आज भी सरकारी क्षेत्र पर पूरी तरह से निर्भर हैं और निजी क्षेत्र वहां से पूरी तरह गायब ही है. डिजिटल इंडिया में सरकार के पास ऐसा कोई भी साधन नहीं होगा जिसके अंतर्गत यह कहा जा सके कि वह निजी क्षेत्र को भी देश के गांवों तक पहुँचने के लिए मदद करने के लिए बाध्य कर सकती है जिससे शहर और गांवों के बीच की खाई पूरी तरह से बढ़ने की भी पूरी संभावनाएं हैं.
                                           देश की साक्षरता दर अभी भी ७५% तक ही पहुँच पायी है और इसमें से भी देश के अधिकांश लोगों के पास अभी भी कम्प्यूटर और मोबाइल नहीं है तो सरकारी डिजिटल सेवाओं के लिए उनके पास एक बार फिर से उन्हीं दफ्तरों के चक्कर काटने के अतिरिक्त कोई विकल्प शेष नहीं रहने वाला है. यदि कोई स्पष्ट रूप से इन बातों पर विचार करे तो आम लोगों के लिए डिजिटल इंडिया अगले डेढ़ दशक तक सपना ही रहने वाला है हाँ यदि सरकार चाहे तो एक केंद्रीय एजेंसी के माध्यम से निजी क्षेत्र के साथ मिलकर हर गाँव में एक सौर ऊर्जा संचालित डिजिटल इंडिया केंद्र की ग्रामसभा में स्थापना कर लोगों को आसानी से यह सब उपलब्ध कर सकती है. देश भर में बिजली की उपलब्धता के कारण किसी भी योजना की सफलता पहले ही संदिग्ध हो जाती है जिसमें ऊर्जा की आवश्यकता है अब इसे निपटने के लिए भी राष्ट्रीय सौर मिशन की परिकल्पना पर तेज़ी से आगे बढ़ने के बारे में सोचने की आवश्यकता भी है. बेशक डिजिटल इंडिया को बहुत अच्छे तरह से लांच किया गया है पर इसमें किसी भी नयी बात का समावेश नहीं किया गया है क्योंकि ये सारी योजनाएं पहले भी अलग-अलग नामों से देश में संचालित की जा रही हैं पर पीएम के इसमें इतनी दिलचस्पी दिखाने के बाद क्या यह अपनी गति को बढ़ा पायेगी या यह भी स्वच्छ भारत अभियान और योग दिवस जैसा एक बड़ा शो ही बनकर रह जाने वाला है ?            

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