मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Thursday, 14 August 2014

मजुल भार्गव की उपलब्धि

                                                                      पिछली कुछ शताब्दियों से संस्कृत को भारत में जिस तरह से केवल धार्मिक भाषा माने जाने का क्रम चल निकला है उस परिस्थिति के बीच अमेरिका से इस भाषा के प्राचीन समय में बहुत ही वैज्ञानिक होने का प्रमाण भी मिला है. प्रिंसटन यूनिवर्सिटी द्वारा १९३६ से गणित के क्षेत्र में उल्लेखनीय काम करने वाले लोगों को जिस तरह से फील्ड्स मेडल पुरूस्कार दिया जा रहा है उसे इस बार संयुक्त रूप से एक भारतीय मूल के प्रोफेसर मंजुल भार्गव में ४० वर्ष की उम्र में अर्तर अविला, मार्टिन हेरेर और मरियम मिर्जाखानी के साथ संयुक्त रूप से दिया गया है. इस वर्ष के पुरुस्कारों की दूसरी बड़ी उपलब्धि यह भी है कि ईरानी मूल की मरियम इसे पाने वाली पहली महिला भी हैं क्योंकि इससे पहले पुरुषों के इस क्षेत्र में महिलाओं की रूचि काम होने के कारण अभी तक किसी भी महिला को यह पुरुस्कार नहीं मिला था. किसी भारतीय द्वारा गणित की २०० वर्षों की जटिल पहेली को इस तरह से सुलझाने का यह पहला मामला है और निश्चित तौर पर भारत के लिए गर्व का विषय है.
                                         प्राचीन काल में जिस तरह से भारतीय सभ्यता विश्व की चुनी हुई कुछ सभ्यताओं के साथ पूर्ण रूप से विकसित थी आज भी उसके प्रमाण मिलते ही रहते हैं जबकि आज पश्चिमी देशों के अंधानुकरण में हम अपनी सभ्यता और संस्कृति से दूर होते जा रहे हैं. आज भी यदि प्राचीन भारत के उपलब्ध ग्रंथों का वैज्ञानिक तरीके से मंथन किया जाये तो आने वाले समय पूरे विश्व को बहुत कुछ और भी मिल सकता है जो आज तक विभिन्न कारणों से सबके सामने नहीं आ पाया है. एक समय देश में संस्कृत भाषा इतनी विकसित हुआ करती थी कि हर भारतीय की वही भाषा हुआ करती थी जिससे देश में वैज्ञानिक आधार पर शोध आदि भी हुआ करते थे पर कालांतर में जब भारतीय वर्ण व्यवस्था का दुरूपयोग किया जाने लगा और उस समय के प्रभावी लोगों ने जातियों के माध्यम से अपना प्रभाव जमाना शुरू किया तो प्रतिभा को सामने लाने के प्रयासों को बहुत धक्का लगा और पूरी सभ्यता जो एक समय अपने आप में बहुत कुछ समाहित किये हुए थी कहीं लुप्त सी होती नज़र आई.
                                         आज भी उसी वर्ण और जाति व्यवस्था का बिगड़ा हुआ स्वरुप देश में प्रभावी है जिस कारण से भी देश में विकास की गति कम नज़र आती है. अब समय आ गया है कि केंद्र सरकार राज्य सरकारों के साथ मिलकर इस बात के लिए एक अभियान चलायें जिसमें देश के किसी भी नागरिक के पास उपलब्ध किसी भी प्राचीन पाण्डुलिपि का डिजिटलीकरण किया जाए और उसे पर क्षेत्र विशेष के विशेषज्ञों की राय लेकर किसी भी संभव अनुसन्धान के लिए सहायता उपलब्ध करायी जाये. मंजुल भार्गव ने जिस तरह से अपने घर में रखी एक संस्कृत की प्राचीन पाण्डुलिपि के आधार पर यह काम किया है वह अपने आप में अनूठा ही है पर इस तरह की कहीं भी दबी हुई हर जानकारी को अब देश और दुनिया के सामने लाने की बहुत आवश्यकता भी है. अच्छा हो कि इस काम में अंतर्राष्ट्रीय समुदाय की मदद भी ली जाये क्योंकि भारतीय राजनैतिक परिवेश और संस्कृत के आज के स्वरुप के देखते हुए इसका अनावश्यक विरोध किये जाने का क्रम भी शुरू हो सकता है. मंजुल भार्गव को मिलने वाले इस सम्मान से एक बात तो स्पष्ट ही है कि यदि भारतीय ज्ञान के सागर को बिना किसी राजनीति के खोज और आगे बढ़ाया जाए तो बहुत कुछ संभव है.
  
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