मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Friday, 10 August 2012

रोज़गार या मोबाइल ?

                    संप्रग-२ सरकार की तरफ से १५ अगस्त को लालकिले से प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह एक और लोकलुभावनी घोषणा कर सकते हैं जिसके बारे में पहले से ही मीडिया में ख़बरें आनी शुरू हो चुकी हैं. गरीबी रेखा से नीचे रहने जीवन यापन करने वाले परिवारों को सरकार की तरफ से मुफ्त मोबाइल फ़ोन देने की एक योजना पर तेज़ी से काम चल रहा है और भारतीय परंपरा के अनुसार १५ अगस्त को देश के प्रधानमंत्री देश के बारे में विकास की बातें करते समय इस तरह की घोषणाएं करते रहे हैं इसलिए औपचारिक तौर पर इस योजना को भी उसी दिन सबके सामने लाया जायेगा. सरकार ने इन चयनित लाभार्थियों के लिए जिस तरह से २०० रूपये का टॉक टाइम भी देने को कहा है उससे इनको कुछ हद तक राहत तो मिलेगी ही पर जब देश में अन्य मुद्दों पर प्राथमिकता के आधार पर काम किये जाने की ज़रुरत है तो इस तरह के केवल वोट लुभाने के हथकंडे अपनाने से कितने लोगों को वास्तव में लाभ पहुँचाया जा सकता है ? योजना आयोग, मानव संसाधन विकास मंत्रालय, ग्रामीण विकास मंत्रालय आदि मंत्रालयों के माध्यम से यह योजना सामने तो आ सकती है पर दिल्ली में बैठकर इसको दूर दराज़ के गाँवों में सही ढंग से पहुँचाया नहीं जा सकता है.
              आज देश में इस बात की सबसे ज्यादा आवश्यकता है कि किसी भी तरह से उन वास्तविक लाभार्थियों को खोजा जाये जिन्हें वास्तव में सरकारी योजनाओं की ज़रुरत है क्योंकि आज जितनी भी इस तरह की गरीबों के नाम पर योजनायें चल रही हैं उनमें ही सबसे ज्यादा अनियमितताएं दिखाई देती है ? कहीं इसका कारण यह तो नहीं है कि इन वास्तविक गरीबों को यह पता ही नहीं चल पाता है कि उनके लिए कौन सी योजनायें सरकार द्वारा चलायी जा रही हैं ? देश में गरीबी रेखा से नीचे जीने वाले लोगों के बारे में बातें और योजनायें तो बड़े पैमाने पर केंद्र और राज्य द्वारा बनायीं जाती रहती हैं पर उनको वास्तव में अमीर लोग ही भोगते रहते हैं. क्या कारण है कि केवल कुछ राज्यों ने ही इस तरह की महत्वपूर्ण योजनाओं को अपने यहाँ ईमानदारी से लागू किया है और उससे ज़मीनी स्तर पर बड़े सुधार दिखाई भी देने लगे हैं पर आज भी अखिल भारतीय स्तर पर जिस मंशा के साथ काम करने की आवश्यकता है आज वह भी दिखाई नहीं देती है ? योजनाओं को लाने से पहले अगर एक बार सारी योजनाओं को रोककर उनको लागू करवाने वाले तंत्र को ही विकसित कर लिया जाये तो आने वाले समय में हर काम आसान हो सकता है.
               यह सही है कि जनता के द्वारा चुनी हुई सरकार के पास इस तरह की योजनायें बनाने की पूरी छूट होती है पर जिस तरह से सरकारी योजना होने के कारण इसमें भारत संचार निगम को ही काम करने के अवसर मिलने वाले हैं और वहां पर बैठे आईटीएस अधिकारी जिस तरह से निगम का खून चूसने में लगे हुए हैं उसे देखते हुए यह कह पाना मुश्किल ही है कि इस योजना को कितने सही स्तर पर जनता तक पहुँचाया जा सकेगा ? नि:संदेह यह स्वीकार किया जा सकता है कि आंकड़ों के अनुसार जब देश के हर हाथ में मोबाइल पहुँचने वाला है तो बीपीएल वाले लोग इससे वंचित क्यों रह जाएँ पर जिनके हाथों में सरकार इस योजना में फ़ोन देना चाहती है वे वास्तव में कितने गरीब हैं इसको कोई भी नहीं देखने जा रहा है ? देश में जिस तरह से बिजली का संकट है उसे देखते हुए यह आशा कैसे की जा सकती है कि ये फ़ोन कभी ठीक से काम कर पायेंगें और जिन लोगों के पास घर जैसी सुविधा भी नहीं है वे आख़िर इस फ़ोन कि सुरक्षा भी कैसे कर पायेंगें ? वैसे भी इन सवालों के जवाब आज तक कोई सरकार नहीं दे पाई हैं इसलिए इस सरकार से भी इनके जवाब मिलने की आशा करना निरर्थक ही रहने वाला है. 
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

1 comment:

  1. अगर लोग मोबाइल के बदले वोट देने को तैयार हैं तो ये यही सरकार deserve करते हैं

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