मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Tuesday, 31 July 2012

क्लिनिकल टेस्ट और कानून

            भारत में आम तौर पर पानी सर से ऊपर हो जाने पर ही कुछ किये जाने की कार्यशैली के कारण कुछ बहुराष्ट्रीय दवा कम्पनियों द्वारा नयी दवाओं के रोगियों पर परीक्षा को लेकर अब सच लोगों के सामने आ रहा है. स्वास्थ्य मंत्रालय की स्थायी संसदीय समिति ने अपनी एक जांच में यह पाया है कि बिना कठोर और पारदर्शी नियमों के साथ लोगों में जागरूकता के अभाव में इस तरह के क्लिनिकल टेस्ट आसानी से किसी भी शहर में किये जा रहे हैं. समिति ने यह भी पाया कि हाल ही में रेफाक्सिमिन नामक नयी दवा का परीक्षण कोटा तथा जयपुर में किया है. इसी तरह रेमोसेट्रान का परीक्षण बैतूल, भोपाल, इंदौर और वड़ोदरा में किया गया था. यहाँ पर इस बात से कोई अंतर नहीं पड़ता है कि कहाँ पर क्या परीक्षण किया जा रहा है पर यह सारे परीक्षण जिस तरह से गोपनीयता का आवरण पहने रहते हैं वह चिंता का विषय है. देश में १६४ स्थानों पर इस तरह के टेस्ट किये जाने की अनुमति दी गयी है पर इसमें अभी तक पारदर्शिता का बहुत अभाव है.
         किसी भी नयी दवा को एक चरणबद्ध तरीके से परीक्षण के बाद ही व्यावसायिक इस्तेमाल के लिए अनुमति प्रदान की जाती है पर हमारे देश में जिस तरह से बिना रोगियों को जानकारी दिए और इन दवाओं के दुष्प्रभाव के बारे में बताये ही परीक्षण किये जाते हैं वह तरीक़ा ग़लत है क्योंकि लगभग सभी मामलों में रोगियों को यह पता ही नहीं चल पाता कि वे किसी दवा कम्पनी के लिए चूहे का काम कर रहे हैं और हो सकता है उसमें उनकी जान भी चली जाये. कानूनन इस तरह के मामलों में पहले रोगियों की स्वीकृति ली जानी चाहिए और उसके बाद उन्हें नयी दवा से सम्बंधित सभी बातें भी समझाई जानी चाहिए. इन सभी बातों को जानने के बाद जब रोगी इसके लिए तैयार हो तभी इस तरह के परीक्षण किये जाने चाहिए. साथ ही जिन रोगियों पर परीक्षण चल रहे हों उनके बारे में एक विस्तृत रिपोर्ट स्थानीय जिला चिकित्सालय में भी उपलब्ध होनी चाहिए जिसे जिले स्तर के अधिकारी आवश्यकता पड़ने पर चेक कर सकें और यह जान सकें कि वास्तव में कितने लोगों पर परीक्षण किये गए और उनके क्या परिणाम रहे ?
        जिस तरह से दवा क्षेत्र में अनुसंधान चल रहे हैं तो उस स्थिति में नयी दवाएं रोज़ ही सामने आती जायेंगीं और उनके साथ ही उनके मनुष्यों पर परीक्षण की भी आवश्यकता हमेशा ही बनी रहेगी पर इस पूरे मामले को जिस पारदर्शिता के साथ चलाया जाना चाहिए आज देश में उसकी कमी है. दवा कम्पनियां अपने बड़े मुनाफे के लिए तो तैयार रहती है पर किसी नयी दवा के टेस्ट के दौरान होने वाले किसी विपरीत असर को अपने पर लेने से बचने के कारण ही अब छोटे शहरों की तरफ जा रही हैं क्योंकि वहां पर इस तरह से लोग जागरूक नहीं है और किसी तरह से इन परीक्षणों के दौरान मृत्यु हो जाने पर उन्हें किसी तरह का मुआवज़ा भी किसी को नहीं देना पड़ता है. यह भी सही है कि किसी भी रोग से लड़ने के लिए नए परीक्षणों की आवश्यकता हमेशा बनी रहेगी पर उसके लिए इस तरह से चोरी छिपे परीक्षण करने को किसी भी तरह से उचित नहीं ठहराया जा सकता है. आख़िर किसी दवा कम्पनी के लाभ के लिए किसी मासूम रोगी को कैसे इस्तेमाल किया जा सकता है ? अब इस बारे में स्पष्ट कानून और मुआवज़े की व्यवस्था पूरी पारदर्शिता के साथ करने की ज़रुरत है.  
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