मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Monday, 30 July 2012

चिरंजीत, चम्पक और स्कर्ट

          पश्चिम बंगाल उत्तरी २४ परगना के बारासात में जिस तरह से ट्यूशन पढ़कर घर वापस आ रही कक्षा १२ की लड़की के साथ रात में १० बजे कुछ लड़कों ने छेड़खानी की उससे यही लगता है कि आज भी हमारी परवरिश में कहीं न कहीं कुछ ऐसी कमी जाने अनजाने में रह रही है जो हमारी युवा होती पीढ़ी को महिलाओं के सम्मान के बारे में बताने में पूरी तरह से असफल है ? गुवाहाटी के बाद इस तरह की घटना बंगाल से संज्ञान में आई है पर यहाँ पर सवाल यह है कि देश में स्थान बदलने का इस बात पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है और सभी जगहों पर लड़कियों और महिलाओं को यह सब झेलना पड़ता है.यह सही है कि पुलिस इस तरह की घटनाओं को पूरी तरह से रोक नहीं सकती है लड़कियों और महिलाओं के प्रति उसकी संवेदनशीलता बढ़ने से इस तरह की घटनाओं में कमी तो लायी ही जा सकती है. इस मामले में केवल एक बात अच्छी रही कि लड़की के विरोध करने पर जिस तरह से स्थानीय लोगों ने लड़की का समर्थन किया और उसे बचाने का प्रयास किया वह इस तरह की घटनाओं को रोकने में सहायक हो सकता है.
     पूरे प्रकरण में बंगाल फिल्म इंडस्ट्री के पूर्व अभिनेता और स्थानीय तृणमूल विधायक चिरंजीत के बयान ने उनकी संवेदन हीनता के बारे में स्पष्ट कर दिया. उन्हें स्कर्ट मनोरंजन का साधन लग रही है और वे बेशर्मी से यह भी पूछने की हिम्मत रखते हैं कि स्कर्ट आख़िर किसके मनोरंजन के लिए पहनी जाती है ? उनको इस पूरे प्रकरण के लिए लड़की की स्कर्ट छोटी लग रही है जबकि वे खुद फ़िल्मी परदे पर लड़कियों को गुंडों से बचाने के लिए लड़ा करते थे ? यहाँ पर सवाल यह है कि किसी पुरुष प्रधान समाज में संस्कारों की कमी है सिर्फ़ इसलिए ही महिलाएं और लड़कियां केवल वही ड्रेस पहने जो पुरुषों को सामाजिक तौर पर अच्छी लगें भले ही वे किसी स्कर्ट पहने जाती लड़की को देखने से नहीं चूकते हों ? पुरुषों की इस कमी की सज़ा आख़िर महिलाओं को क्यों चुकानी पड़े इस बात का जवाब किसी के पास है क्या ? जो लोग आज प्रदेश और देश की विधायिका में बैठे हुए हैं उनकी अगर ऐसी मानसिकता है तो देश में इस तरह की घटनाओं को कैसे रोका जा सकता है ? क्या विधायक चिरंजीत अपने घर और परिवार महिलाओं को इस तरह की ड्रेस नहीं पहनने देते हैं ?
     कानून बनाने वाले नेताओं में ऐसी संवेदन हीनता तो कई बार देखने में मिलती है पर उत्तरी २४ परगना के एसपी चम्पक भट्टाचार्य ने इस घटना को छोटी सी घटना बताया और यह भी कहा कि इस मसले में पुलिस ने कार्यवाही की है वह तो समझ में आता है पर क्या जो कुछ भी पुलिस ने किया वह तब भी करती अगर स्थानीय लोगों ने सहयोग करके उन लड़कों का पीछा करके उन्हें हिरासत में लेने के लिए पुलिस पर दबाव नहीं बनाया होता ? कहने के लिए तो यह छोटी सी घटना ही है पर इसके गुवाहाटी जैसी घटना बनने में देर नहीं लगती अगर स्थानीय लोग लड़की की सहायता के लिए आगे नहीं आये होते ? क्या चम्पक को यही लगता है कि जब तक कुछ शर्मनाक न हो जाये तब तक हर घटना छोटी ही है आख़िर एक लड़की के साथ दुर्व्यवहार छोटी घटना कैसे हो सकती है जबकि लड़की के पूरे जीवन पर इस तरह की घटनाओं से बुरा असर पड़ता है ? पुलिस के इस तरह के बयान से इस तरह की घटनाओं में शामिल रहने वाले लोगों के हौसलों को बल मिलता है और आज वे पुलिस के अनुसार जिस छोटी घटना में फंसे हैं कल को वे किसी बड़ी घटना को भी अंजाम दे सकते हैं क्योंकि उनको कानून का डर ही नहीं रह जायेगा.  
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