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Monday, 14 September 2015

केंद्र सरकार - मंत्रालय और वित्तीय अनियमितता

                                               केंद्र सरकार के वित्त मंत्रालय द्वारा महत्वपूर्ण विभागों में वित्तीय मामलों में नियमों के अनुपालन न किये जाने को लेकर एक बार फिर से दिशा निर्देश जारी कर दिए हैं जिनके चलते आने वाले समय में देश में केंद्रीय स्तर पर भ्रष्टाचार के लिए सुरक्षित मार्ग बनाने वाले लोगों के लिए भी बड़ी कठिनाइयां सामने आने वाली हैं. केंद्र सरकार की तरफ से इस बात के स्पष्ट दिशा निर्देश भी हैं कि किस स्तर का वित्तीय लेन देन किन मानकों के साथ किया जाना चाहिए पर इस सम्बन्ध में कुछ गड़बड़ी उजागर होने के बाद कुछ विभागों की फिर से जाँच की गयी जिसमें इस तरह के मामले सामने आये जिन्हें एक परंपरा के रूप में ही लिया जाना लगा है. नियमों के अनुसार २५००० रुपयों की सीमा के बाद के सभी भुगतान इलेक्ट्रॉनिक तरीके से किये जाने के आदेश हैं पर यहाँ पर भी इस तरह के भुगतानों को चेक के ज़रिये ही किये जाने के कई मामले सामने आये हैं जिन पर महालेखा नियंत्रक ने गंभीर आपत्तियां भी जताई हैं जिसके बाद सरकार ने फिर से इस दिशा में सोचने की तरह कदम बढ़ा दिए हैं. कई मामलों में किसी और मद के खर्चे को किसी अन्य मद में खर्च किया गया है और बिना टेंडर के भी बड़े कामों को करने के भी संकेत मिले हैं.
                                        इस तरह की किसी भी परिस्थिति में कोई भी सरकार वित्तीय मामलों में केवल पारदर्शिता बढ़ाने पर ही ज़ोर दे सकती है और इसके लिए उचित माहौल बनाये जाने की तरफ कदम बढ़ा सकती है पर अंत में इनका अनुपालन तो विभागीय अधिकारियों और कर्मचारियों को ही करना है जिसके लिए संभवतः वे अभी मानसिक रूप से तैयार नहीं दिखाई देते हैं. किसी एक व्यक्ति की मंशा से पूरी व्यवस्था को नहीं सुधारा जा सकता है क्योंकि किसी भी सरकार के मुखिया के प्रयासों को निचले स्तर तक पहुँचाने के लिए कड़े कदम उठाने की आवश्यकता भी पड़ती है. आज भी केंद्र और राज्य सरकारों में बहुत सारे ऐसे लोग मौजूद हैं जो कम्प्यूटर पर काम करने को एक बोझ ही समझते हैं जिसके कारण इनकी लम्बी चौड़ी फ़ौज़ होने के बाद भी काम करने की प्रक्रिया में तेज़ी नहीं आ पाती है. आधुनिक व्यवस्था को समझने के स्थान पर वे आज भी पुरानी व्यवस्था से ही काम चलना चाहते हैं जिससे पूरी व्यवस्था की रफ़्तार सुस्त हो जाती है. किसी भी विभाग के काम काज को बदलने के लिए उनके अनुरूप गंभीर कार्यशालों की व्यवस्था भी की जानी चाहिए जिससे हर विभाग अपने को आज के स्वरुप में ढाल सके.
                                              इस दिशा में प्रशासनिक सुधारों की बातें लगातार किया जाने वाला काम है और जब तक आधुनिकतम सुधारों के साथ सरकारी मंत्रालय काम करना नहीं सीख लेते हैं तब तक इस प्रयास को जारी ही रखना चाहिए जिससे कहीं भी कोई कमी न रह जाये. देश को तेज़ी से काम करने वाला तंत्र चाहिए पर आज भी अधिकतर काम अपनी पुरानी रफ़्तार के साथ ही किये जा रहे हैं. मोदी सरकार ने भी केंद्र के सभी मंत्रालयों के लिए नए सिरे से दिशा निर्देश जारी किये थे पर उनके सख्त प्रशासक होने के बाद भी आज मंत्रालयों में पुरानी संस्कृति हावी है तो क्या अब इस दिशा के प्रयासों को पूरा करने के लिए कुछ कठोर दण्डों का प्रावधान भी कड़ाई से लागू नहीं किया जाना चाहिए ? प्रशासनिक सुधारों के लिए आयोजित की जाने वाली विभिन्न कार्यशालों को विशुद्ध पर्यटन मानने वाले अधिकारियों और कर्मचारियों के विरुद्ध क्या अनुशासनात्मक कार्यवाही नहीं की जानी चाहिए क्योंकि पत्राचार के माध्यम से जितने सुधार हो सकते थे वे अब देश के सामने हैं इसलिए आने वाले समय में इस तरह से वित्तीय अनुशासन को न मानने वाले लोगों के लिए क्या कुछ कठोर व्यवस्था अब समय की मांग नहीं बन चुकी है ?         
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