मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Wednesday, 27 May 2015

बोफोर्स - एक मीडिया स्कैंडल

                                                      स्वीडन की बोफोर्स कम्पनी से राजीव गांधी के पीएम रहते खरीदी गयीं बोफोर्स तोपों ने भारतीय राजनीति में जितना तहलका मचाया था वह संभवतः राष्ट्रपति के लम्बे समय बाद स्वीडन दौरे से पहले दिये गए एक महत्वपूर्ण बयान के बाद ख़त्म होने की तरफ जा सकता है क्योंकि जिस तरह से प्रणब मुखर्जी ने इसे एक मीडिया स्कैंडल कह कर बात ख़त्म की उससे यही लगता है कि अब भाजपा भी बोफोर्स के बनावटी आवरण से अपना पीछा छुड़ाना ही चाहती है क्योंकि १९८९ के आम चुनावों में उसे उस मामले का जो भी राजनैतक लाभ मिलना था उसका वह भरपूर उपयोग कर चुकी है. तीन दशक बीतने के बाद भी आज के समय तक जिस तरह से यह मुद्दा दोनों देशों के मज़बूत रिश्तों के बीच खटास का कारण बना हुआ है संभवतः मोदी सरकार भी उससे अलग होना चाहती है. आज भी स्वीडन विभिन्न तरह की तकनीक के क्षेत्र में भारत की बहुत मदद कर सकता है और संभवतः एक रणनीति के तहत राजीव सरकार के बाद से लगभग सभी सरकारों ने स्वीडन से एक दूरी बनकर रखी थी क्योंकि स्वीडन का नाम आने मात्र से ही यह मामला बोफोर्स की तरफ घूम जाया करता था और जब इसके एक समय आलोचक रहे भाजपाई नेताओं को आज उसकी सही स्थिति पता चल रही है तो संबंधों पर पड़ी धूल साफ़ करने के बारे में सोचना शुरू कर दिया गया है.
                                              संभवतः इस मामले में मोदी सरकार की तरफ से राष्ट्रपति को इस तरह के बयान देने के लिए ही कहा गया हो क्योंकि लम्बे समय तक राजीव गांधी और कांग्रेस पर बोफोर्स को लेकर हमलावर रही भाजपा और पीएम मोदी इस मसले पर कुछ भी कहने में खुद को असहज ही महसूस करते और निश्चित तौर पर उनके इस तरह के किसी बयान को एक बड़ा यू-टर्न भी माना जाता तभी सरकार ने अपने स्तर पर विचार कर यह ज़िम्मा राष्ट्रपति पर छोड़ दिया क्योंकि वे बोफोर्स मामले के सामने आने के बाद देश के रक्षा मंत्री भी रहे हैं. एक पूर्व कांग्रेसी नेता के रूप में राष्ट्रपति द्वारा इस मामले पर सधी हुई शुरुवात कर ही दी गयी है और जिस तरह से रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने भी राष्ट्रपति के बयान पर कोई प्रतिक्रिया देने से ही मना कर दिया गया उससे यही लगता है कि मोदी सरकार बोफोर्स के भूत से देश का पीछा छुड़ाने की तरफ बढ़ चुकी है. पर्रिकर ने जिस तरह से बोफोर्स तोपों को अच्छी गुणवत्ता का भी बताया वो भाजपा के उस बयान से मेल नहीं खाती है जिसमें बोफोर्स सौदे में राजीव गांधी पर घटिया तोपें खरीदने का इलज़ाम भाजपा रोज़ ही लगाया करती है कारगिल के युद्ध में राजीव सरकार द्वारा खरीदी गयी बोफोर्स तोपों की तैनाती के बाद ही लड़ाई का रुख पलटना शुरू हुआ था और पाक को अपने पैर पीछे खींचने पड़े थे.
                                              किसी पर भी आरोप लगाना अपने आपमें बहुत आसान ही है और बोफोर्स के मामले में मीडिया स्कैंडल या दुष्प्रचार ने ही राजीव सरकार को पूरी क्षमता से काम करने से रोक दिया था और आज भी कोई इस बात का अंदाज़ा नहीं लगा सकता है कि इस विवाद के कारण देश को कितना नुकसान उठाना पड़ा था. अन्तर्राष्टीय स्तर पर सभी सौदों में कम्पनियों द्वारा इस तरह का कमीशन आज भी अपने क्षेत्रीय प्रबंधकों को दिया जाता है और बोफोर्स मामले में भी यही हुआ था पर एक सोची समझी साज़िश के तहत जिस तरह से राजीव सरकार को केवल भ्रष्टाचार के आरोपों से ही घेरने का काम किया गया वह आज एक मूर्खतापूर्ण काम से अधिक कुछ भी नहीं लगता है. अच्छा ही है कि मोदी सरकार द्वारा भी अब इसे मीडिया स्कैंडल ही माना जाने लगा है क्योंकि यह ऐसा ही था अब मोदी पर भी सभी देशों को साथ लेकर चलने का दबाव है और दुनिया में बेहतर तकनीक में माहिर स्वीडन को किनारे रखकर कुछ भी सही नहीं किया जा सकता है सरकार यह अच्छी तरह से समझ रही है. मोदी जिस तरह से रक्षा क्षेत्र में मेक इन इंडिया पर ज़ोर देने में लगे हुए हैं यदि उन्हें उसमें और अधिक सफलता पानी है तो आज बोफोर्स मुद्दे को छोड़ने के अतिरिक्त उनके पास कोई अन्य विकल्प भी शेष नहीं है.    
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