मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Saturday, 2 April 2016

विकास की दौड़ में गुणवत्ता

                                         कोलकाता के व्यस्ततम क्षेत्र बड़ा बाज़ार में जिस तरह से निर्माणाधीन पुल के अचानक गिरने से २५ लोगों की जान चली गयी और अभी भी काफी लोग घायल हैं उसके बाद देश भर में उसी तरह की कवायद फिर से देखी जा रही है जो एसे हादसों के बाद अक्सर ही दिखाई देती है. आज़ादी के इतने वर्षों बाद भी जब देश में तकनीक और प्रौद्योगिकी ने बहुत प्रगति कर ली है और विदेशों से निर्माण सम्बन्धी विशिष्ट उपकरणों के आयात और उपयोग से जहाँ निर्माण में लगने वाली मानव शक्ति पर रोक लगायी जा सकी है वहीं निर्माण कार्यों में अभूतपूर्व प्रगति भी दिखाई देने लगी है फिर भी इस तरह की घटनाओं को आखिर किस हद तक स्वीकार किया जा सकता है यह सोचने का समय आ चुका है. कोलकाता में भी जिस तरह से इस दो किमी लम्बे उपरिगामी सेतु का निर्माण २००१ से प्रक्रिया में आया हुआ है और आज भी यह पूरी तरह से नहीं हो पाया है उसकी जांच की जानी आवश्यक है क्योंकि आबादी और सामान्य यातायात के बीच इस तरह के काम करने में निश्चित तौर पर अधिक समय लगता है तथा इससे बचने का कोई अन्य मार्ग भी नहीं सामने दिखाई देता है फिर भी इस काम को करने में आज देश में कुशल निर्माण कम्पनियों की कमी स्पष्ट रूप से दिखाई देती है.
                                                                   १९९१ के बाद बदली आर्थिक व्यवस्था में जिस तरह से देश के हर क्षेत्र में तेज़ी दिखाई देनी शुरू हुई उसके बाद निर्माण क्षेत्र को भी तेज़ी से पंख लग गए पर इस पूरी प्रक्रिया में जहाँ इसमें लगी हुई कम्पनियों के लिए उचित माहौल नहीं बन पाया और उन्हें आज की सर्वोत्तम तकनीक उपलब्ध करने के लिए सरकार ने भी कोई नीति नहीं बनायीं तो उसका लाभ उठते हुए इनमें से अधिकतर कम्पनियों ने आज के मानकों की अनदेखी करनी भी शुरू कर दी जिसके बाद विभिन्न परियोजनाओं में विभिन्न तरह की समस्याएं सामने आने लगीं. देश की बढ़ती आबादी और अतिक्रमण के साथ सिकुड़ते महत्वपूर्ण स्थानों पर स्थान की कमी होने से जहाँ लोगों के लिए इन क्षेत्रों में लगने वाले जाम से रोज़ निपटना पड़ता है वहीं इस अतिक्रमण के लिए ज़िम्मेदार सरकारी विभाग भी अपने स्तर पर कोई प्रयास करते हुए नज़र नहीं आते हैं. प्रारंभिक मिलीभगत बाद में किस स्तर पर समस्या उत्पन्न करने लगती हैं यह ऐसे किसी भी शहर में देखा जा सकता है क्योंकि शहरों में अनियंत्रित यातायात और सड़कों तक दुकान खोलने की प्रवृत्ति के चलते ही आज हमारे शहरों का स्वरुप बिगड़ा हुआ दिखाई देता है इसके लिए हम सभी बहुत हद तक उत्तरदायी हैं.
                                         देश के अधिकांश शहरों के निकायों के पास दीर्घावधि की कोई कार्ययोजना होती ही नहीं है जिसके चलते हर शहर और क़स्बा इस तरह की समस्याओं से दो चार होने को मजबूर है. क्या अब इस बारे में केंद्रीय स्तर पर कोई पहल करने की आवश्यकता नहीं है जिसमें शहरों के अंदरूनी हिस्सों को भविष्य के पूरी तरह से तैयार करने के लिए विशिष्ट अध्ययन को आवश्यक किया जाये तथा आज के यातायात और भविष्य में होने वाले यातायात की एक परिकल्पना करते हुए हर शहर और कस्बे के लिए एक योजना अवश्य ही बनायीं जाये जिसमें नए बसने वाले क्षेत्रों में सम्पूर्ण सुविधाओं के साथ अच्छे बाजार भी होने चाहिए जिससे शहरों के पुराने हिस्सों की तरफ अनावश्यक यातायात को रोका जा सके. नए क्षेत्रों में सड़कों के जाल पर पूरी तरह से ध्यान दिया जाये क्योंकि जाम से निपटने के लिए बाद में जितने पैसे खर्चे जाते हैं यदि उसके एक छोटे हिस्से का उपयोग कर शहरों की सडकों को सही किया जाये तो सभी का काम आसान हो सकता है. अनियंत्रित विकास से आज हमारे शहर और कस्बे कैसे होते जा रहे हैं यह सभी को दिखाई तो दे रहा है पर इस तरफ कोई भी गम्भीर प्रयास करता हुआ नज़र नहीं आता है और जो छुटपुट प्रयास किये भी गए वे राज्यों में व्यापत भ्रष्टाचार की भेंट ही चढ़ते है दिखाई दिए हैं.   
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

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