मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Wednesday, 2 November 2011

यूनेस्को की सहायता

      अमेरिका ने जिस तरह से फलिस्तीन को मान्यता देने के बाद यूनेस्को की सहायता बंद करने के ऐलान किया उससे यही लगता है कि आज भी अमेरिका पिछली बातों को भुला कर एक नयी दुनिया के बारे में नहीं सोचना चाहता है ? जिस तरह से पूरी दुनिया में आज भी वह अपने को एक दरोगा की तरह मानता है उससे ही कई बार बहुत सारी समस्याएं खड़ी हो जाया करती हैं. अब भी उसने अपनी इस चौधराहट को न छोड़ने का फ़ैसला कर रखा है. इस तरह से विश्व में स्मारकों और धरोहरों की रक्षा के लिए बने संगठन के पास काम करने के लिए पैसे कहाँ से आयेंगें यह भी सोचने का विषय है ? अभी तक विकसित देशों से जो सहायता मिलती है उसी से यह संगठन अपना काम चलाया करता है पर अमेरिका के इस कदम के बाद आख़िर और कितने देश इस संगठन को सहायता देने के लिए तैयार दिखाई देंगें ?
   अमेरिका के लिए वीटो का इस्तेमाल करना बहुत आसान है क्योंकि उसे यह अधिकार संयुक्त राष्ट्र ने दिया हुआ है पर  आज इस तरह के किसी भी अधिकार का कोई मतलब नहीं बनता है जो पूरे विश्व में इस तरह की अव्यवस्था फ़ैलाने का काम करता हो ? अभी भी दुनिया को बहुत आगे जाने के लिए बहुत कुछ करने की ज़रुरत है. आज पूरे विश्व से इस तरह की किसी भी भेदभाव वाली नीति को ख़त्म करने की ज़रुरत है पर कुछ देश इसमें अपनी अलग स्थिति को आज भी बनाये रखना चाहते हैं जिससे देशों के बीच की खाई और भी गहरी होती जा रही है. इस पूरी संयुक्त राष्ट्र संस्था के पुनर्गठन की अब बहुत आवश्यकता है क्योंकि अब दुनिया में तेज़ी से आगे बढ़ते हुए लोग कुछ देशों को अपने ऊपर मानने के लए अब तैयार नहीं हैं ? सबसे बड़ी समस्या यह है कि इस संस्था में भारत के पास अभी भी कोई बड़े अधिकार नहीं है जिससे वह फलिस्तीन का शुरू से समर्थन करने के बाद भी अब कुछ खास नहीं कर पायेगा.
   वैसे संयुक्त राष्ट्र में ५ वीटो अधिकार प्राप्त देशों को यह छूट है कि वह अपने इस अधिकार को किसी भी प्रस्ताव के ख़िलाफ़ प्रयोग कर सके पर आज अमेरिका जिस तरह से फलिस्तीन के ख़िलाफ़ इसका दुरूपयोग करने जा रहा है उससे यही पता चलता है कि पूरे विश्व में आज भी कुछ देशों ने अपने को कुछ अलग सा मान रखा है जबकि स्थिति यह है कि पूरी दुनिया में आज अमेरिका की स्थिति बहुत कमज़ोर हो रही है और आर्थिक रूप से वह बहुत बड़े संकट में है फिर भी उसे इस बात का बहुत गुमां है कि वह कुछ अलग है ? अब अमेरिका को अपनी इस तरह की किसी भी नीति का त्याग कर देना चाहिए क्योंकि इसके बाद ही पूरे विश्व में कुछ ठीक किया जा सकेगा. अब यह अमेरिका की नीति और उसकी सोच पर है कि वह विश्व में अपने इस चौधराहट को बराबरी में बदलना चाहता है कि इसके स्थान पर वह उस समय का इंतज़ार करना चाहता है जब अन्य देश उससे यह अधिकार ही छीन लेंगें.    
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