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Tuesday, 23 September 2008

आतंक

आज भी लोग यह कहने से नहीं चूकते हैं की भारत में अल्पसंख्यकों के साथ अत्याचार किया जा रहा है. कल की दो घटनाये तो हम सभी ने देखी ही हैं कि दिल्ली में कम उमर के बच्चे आतंक के साथ जुड़े दिखाई देते हैं और दूसरी ओर आमिर खान की तारे ज़मीं पर आस्कर के लिए नामित हो रही है . किस ने आमिर से कहा कि इतना अच्छा काम करो कि ३ बार आस्कर तक पहुँच जाओ ? और किस ने आजमगढ़ के उन बच्चों से कहा कि आतंक का पर्याय बन जाओ ? जब हमारी ही परवरिश में कमी रही जा रही है तो किसी दूसरे या पुलिस को दोष देने से क्या होगा ?
यह दो उदाहरण देश के अल्पसंख्यक समाज के दो पहलुओं को दिखाते हैं कि सारा कुछ इस बात पर है कि हम अपने बच्चो को क्या बनाना चाहते हैं ? क्या आजमगढ़ के उन माँ बाप को तब यह याद नहीं रहा कि सराय मीर का एक बच्चा कब अबू सलेम बन गया ? जब देश विरोधी ताकतें आजमगढ़ के सीने को रौंद रही थीं तो अपने बच्चों को बचाने के लिए क्या किसी ने देश के बारे में सोचा ? अब टीवी पर यह कह देने से संदेह के बादल तो नहीं छटेंगे कि सारा आजमगढ़ संदेह के घेरे में क्यों है ? इसका उत्तर तो आप लोग ही दे सकते हैं अगर अब भी तय कर लिया जाए कि कुछ नहीं बिगडा है तो एक शुरुआत तो की ही जा सकती है. अब भी जग जाओ कहीं ये अमन के दुश्मन आपका चैन न छीन लें.

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