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Friday, 21 November 2008

कामचलाऊ व्यवस्था....?

आज के युग में जब देश के सामने बहुत सी समस्याएँ हैं तो आज एक समाचार ने मेरा ध्यान बहुत खींचा. देश के सबसे बड़े राज्य उ०प्र० में पुलिस विभाग में ७१ महत्वपूर्ण पड़ खाली पड़े हैं. अब इस बात का तो कोई मतलब ही नहीं बनता की भारतीय पुलिस सेवा में कम पद हैं ? क्या नियुक्ति विभाग को यह भी नहीं पता रहता कि उनकी आवश्यकता क्या है ? यदि प्रदेश इस तरह से ही चलाया जा रहा है तो फिर सरकारों की कोई आवश्यकता मेरे अनुसार नहीं रह जाती है. जब मानक के अनुसार सृजित पदों के लिए आपके पास अधिकारी ही नहीं हैं तो आज के युग की चुनौतियों को किस तरह से निपटा जाएगा यह बहुत महत्वपूर्ण है. जब मुख्य शहरों में ही अभिसूचना से जुड़े पद खाली हैं तो किस तरह से सुरक्षा की बात की जा सकती है? जब भी कोई आतंकवादी घटना हो जाती है तो सरकार सारे काम छोड़कर आतंकियों के सफाए की बात करने लगती है. अपने को स्वयं ही मज़बूत करना होगा मजबूर लोगों की बातें कोई भी नहीं सुनता है. प्रदेश का गौरव रही पी.ए.सी. आज सेनानायकों की कमी से जूझ रही है. कोई भी उपसेनानायक कभी भी पूरी ज़रूरतों को महसूस नहीं कर पाता है जिसका असर बल के मनोबल पर पड़ता है. निवेदन है सरकार के कर्णधारों से कि सरकार को पार्टी की तरह ना चलाये वरना ईश्वर ना करे कि अगर आवश्यकता पड़ गई तो पुलिस किस तरह से काम करेगी यह सोच कर ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं. देश के सबसे महत्वपूर्ण राज्य में यह कहकर काम नहीं चल सकता कि कानून व्यवस्था की स्थिति पहले से बेहतर है. क्यों नहीं इसको सर्वोत्तम बनाने का प्रयास किया जाना चाहिए ? जब वास्तव में इन बातों में सुधार होगा तो अवश्य ही हम भी भारत के निर्माण में अपना योगदान कर पायेंगें.

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