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Sunday, 11 January 2009

मान्यता को मान्यता.....


वाह रे लोकतंत्र तेरी लाज अब कौन बचायेगा ? संजू नहीं तो मान्यता ही सही.... क्या नहले पे दहला है ? लालू नहीं तो राबड़ी सही की परम्परा को देश के नेता बिल्कुल सही दिशा में आगे ले जा रहे हैं. मुझे तो इसमें कोई आपत्ति नहीं लगती क्योंकि राजनीति में अभी एक अमर ही भारी पड़ रहे हैं.. किसी समय भाजपा वाले नारे लगते थे कि सब पर भारी अटल बिहारी.. पर अब यहाँ पर भार भी भारी लोगों पर आ चुका है. अमर सिंह कद में भारी हैं, और वज़न में भी. सपा में कोई हैं उनके कद का ? शायद नेता जी भी कद में उनसे छोटे होते जा रहे हैं तभी तो बेनी बाबू और राज बब्बर जैसे आज सपा में बचे ही नहीं हैं. मिश्रा जी कुछ बोलते नहीं है तो बचे हैं और समाजवादियों की पुरानी फोटो लगते हैं. अब दिखने को चेहरा भी तो चाहिए. सपा वास्तव में समाजवाद की पोषक है अब तो यह किसी से भी नहीं छुपा है. समाज के हर तबके को जब मौका दिया जा रहा है तो हमारा मनोरंजन करने वाले पीछे क्यों रहें ? हम भी तो हेमा के बसंती वाले संवाद सुनना चाहते हैं. कभी यह नहीं जाना चाहते की जया द्वय या हेमा ने संसद में क्या कहा या पूछा ? राजा बाबू क्या कर रहे हैं या अपने कु.. क..... मैं तेरा खून पी जाऊँगा वालों ने संसद में किसका खून पिया ? रिश्ते में तो हम तुम्हारे ...... ने एक बार में ही दूध से ख़ुद को जला लिया तो आज तक हिम्मत नहीं हो पाई कि छाछ भी देखी जाए. लेकिन इस जोश में कोई उन भारी भरकम लोगों को नहीं पूछ रहा है जो दिवाली से ही कुछ ना कुछ बाँटने में लगे हैं होली पे देखो क्या मिलता है ? अब वो सज्जन भी हर तरह से भारी हैं..... पर हलकी फुल्की मान्यता के आगे देखो कहीं उड़ ही न जाए... अब संजू बाबा कि मान्यता को इससे अच्छी मान्यता कहाँ मिल सकती है जो सपा उन्हें लखनऊ से दिला सकती है कचेहरी में तो समय लगेगा फिलहाल तो ग़ालिब मान्यता दिलाने को ये ख्वाब बहुत ही अच्छा है. अमर सिंह धन्यवाद के पात्र हैं कि उन्होंने लखनऊ के युवाओं को जोश से भर दिया है अब तो इलेक्शन हो ही जाने चाहिए हर जवान दिल यही पूछ रहा है कि मुन्ना भाई अपनी मान्यता लेकर हमारी मान्यता लेने कब आयेंगें... हम तो देने को तैयार हैं... अब आ भी जाओ ना ....

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