मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Wednesday, 11 November 2009

मनसे की हरकतें

वोट के लिए हमारे नेता कहाँ तक गिर सकते हैं इसका ताज़ा उदाहरण मनसे की हरकतों से दिखाई दिया। आज जब महाराष्ट्र में कुछ हद तक जनता ने कैसे भी सही मनसे पर विश्वास किया तो उसने किस तरह से हरकतें की ? देश में पहले से ही बहुत सारी समस्याएं मौजूद हैं और उस पर से ये नेता किस तरह से अपने आप को प्रर्दशित करना चाहते हैं यह समझ से बाहर है। देश में बहुत सारे मतभेद हैं पर उसका मतलब यह तो नहीं हो सकता कि विधान सभा के स्तर पर उसका इतना नंगा प्रदर्शन किया जाए ? भाषा के भुलावे में पता नहीं कितने ही लोग पहले ही समस्याओं से घिरे हुए हैं फिर भाषा का इतना संकीर्ण प्रदर्शन क्यों ? कोई भी भाषा तभी स्वीकार्य हो सकती है जब वह जन भाषा बन जाए, विविधता से भरे भारत में कुछ भी ऐसा नहीं किया जाना चाहिए जो एकता के सूत्र को नहीं संभाल सके। भाषा के प्रवाह को नदी कि तरह होना चाहिए जो कि बिना किसी भेद भाव के बहता चले। देश में भड़काने वालों कि कभी कमी नहीं रही है फिर भी अब समय आ गया है कि कुछ ऐसा किया जाना चाहिए कि इस तरह की समस्याओं से हमेशा के लिए ही छुटकारा मिल जाए ? एक बहुत छोटा सा उपाय यह हो सकता है कि जो कामगार या अन्य लोग केवल रोज़ी रोटी के लिए देश के अन्दर आते जाते हैं उनके लिए उनके गृह राज्य में ही कुछ स्थानों पर उन राज्यों की भाषा सिखाने की व्यवस्था की जानी चाहिए। जैसे कि बिहार, उत्तर प्रदेश के लोगों को मुंबई जाना है तो उनके लिए समझने लायक मराठी की व्यवस्था इन राज्यों में होनी चाहिए। जब इस तरह के प्रयास किए जायेंगें तो देश भाषा के मामले में समृद्ध बनेगा साथ ही इस तरह के भाषाई झगड़े खड़े करने वालों के हाथ से मुद्दा जाता रहेगा। किसी भी भाषा को सीखना कभी बेकार नहीं जाने वाला पर क्या कोई नेता अपने वोट का लालच छोड़कर इस तरह से सोचना भी चाहता है ? सबसे पहले देश में राज भाषा विभाग को ख़त्म करके उसके स्थान पर भारतीय भाषा विभाग कि स्थापना की जानी चाहिए जो इस तरह के मुद्दों पर वास्तविक रूप से निर्णय लेकर भाषाओं का प्रसार प्रचार कर सके.

मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

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