मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Friday, 4 December 2009

मन की चाहत...

जब जब याद तुम्हारी आई
मन के पंछी मुक्त हुए,
फिर से एक तमन्ना झांकी
दिल के सूने कोटर से.

देख तुम्हारी फिर तस्वीरें
दिल में आहट होती है,
कोयल जैसे निकल रही है
फिर बसंत के आने में.

तेरी चिट्ठी हाथ में आई
पंख लगे अरमानों को,
भीगे सूखे फिर से अक्षर
मन का सावन बरसा जब.

जीने के तो लाख बहाने
फिर भी मन को ना भाएं,
सात जनम फिर से लगते हैं
साथी सच्चा पाने में.


मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

4 comments:

  1. आपकी कविता में आख़िरी में जो पंक्तियाँ कहीं कि "सात जनम फिर से लगते हैं साथी सच्चा पाने में", बहुत अच्छी बात कही.
    और वो अंतिम पंक्ति वाह !

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  2. सात जनम फिर से लगते हैं ...सच्चा साथी पाने में ...मन बांध लिया इन पंक्तियों ने ...बहुत सुन्दर ..!!

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  3. बस इतना कहूँगा कि मुझे भाव बहुत सुन्दर लगे

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  4. कई रंगों को समेटे एक खूबसूरत भाव दर्शाती बढ़िया कविता...बधाई

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