मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Friday, 25 February 2011

रेल बजट और देश

                       देश में रेल सेवाओं के फैलाव और लोगों की उम्मीदों के बीच आज रेल मंत्री द्वारा मंत्रालय के बजट प्रस्तावों को संसद में रखा जायेगा. कहा जाता है कि इस देश को वास्तव में जोड़ने वाली दो ही चीज़ें हैं एक रेल और दूसरा क्रिकेट ? आज देश क्रिकेट के बुखार में तप रहा है और रेल भी देश की नब्ज़ पकड़ने के लिए आज एक और कोशिश करने जा रही है. यह सही है कि इतने बड़े देश में सब कुछ एकदम से सही नहीं किया जा सकता है फिर भी कहीं न कहीं से सुधारने की प्रक्रिया शुरू तो की ही जानी चाहिए. रेल के साथ जिस तरह का भेद भाव पूरा देश करता है उसे देखकर तो यही लगता है कि आने वाला समय रेल के लिए बहुत ही मुश्किल हो सकता है. हम हर काम के लिए पैसे अदा करने में देरी नहीं करते पर जब बात रेल में सफ़र की हो तो हम हर तरह की बचत के बारे में सोचने की तरफ चले जाते हैं ? हमारी रेल हमारे पैसों से ही चलनी है और अगर हम अपनी रेल के बारे में नहीं सोचेंगें तो आख़िर कौन आकर इस पर विचार करेगा ?
       हर बार की तरह हर रेल मंत्री की परंपरा को अपनाते हुए ममता भी रेल मंत्रालय में अपने वोटों का ध्यान रखने वाली हैं और इनके इस बजट में बंगाल के चुनावों की धमक भी अच्छे से दिखाई देने वाली है. अभी तक देश के बारे में ३० % और अपने वोटों के बारे में ७० % सोचने की परंपरा का निर्वाह हर रेल मंत्री करता रहा है और ममता से बंगाल के चुनावी वर्ष में कुछ नए की उम्मीदें करना भी बेमानी होगी. देश में दिल्ली या राज्यों की राजधानियों से सरकारें चलाने का चलन बढ़ता ही चला जा रहा है जिससे कहीं से भी जनता की वास्तविक ज़रूरतों पर ध्यान नहीं पहुँच पाता है ? रेल बजट में जो सबसे बड़ी बात की जानी चाहिए कि लाभ वाले मार्गों का तिहरिकरण अविलम्ब किया जाना चाहिए जिससे लोगों को सुविधा मिले और रेल को कुछ अतिरिक्त आमदनी. यह सही है कि रेल मंत्री को अपने विवेक के इस्तेमाल की पूरी छूट होती है पर कितने रेल मंत्रियों ने अपनी ज़िम्मेदारी का निर्वहन ठीक ढंग से किया है ? ममता जनता से जुड़ी हुई नेता हैं इसलिए उन्हें पता है कि जनता क्या चाहती है फिर भी कुछ स्थानों पर उनसे जनता की नब्ज़ पकड़ने की चूक भी हो जाती है. 
    अच्छा हो कि नयी ट्रेनों की घोषणा से बचा जाये, जितनी चल रही हैं उनके समय अनुपालन और सुरक्षा पर अधिक ध्यान दिया जाये. देश के दूर दराज़ के क्षेत्रों में ४ डिब्बों की सवारी गाड़ी के स्थान पर इनमें डिब्बों को अविलम्ब बढ़ाया जाये जिससे लोगों को इन गाड़ियों में बैठने की उचित जगह मिलने लगे. केवल राजधानी और शताब्दी जैसी गाड़ियों के स्थान पर हर मेल एक्सप्रेस और सुपरफास्ट गाड़ी की नियमित मानिटरिंग की जाये जिससे ये भी समय से चल सकें. केवल समिति बनाकर ही कर्त्तव्य को पूरा न माना जाये क्योंकि ये समितयाँ केवल राजनीतिक अहम् को संतुष्ट करने का काम ही करने लगी हैं. अच्छा हो कि केंद्र सरकार अपने इस उपक्रम की सुरक्षा के लिए पूरे देश में काम करने वाला और केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन रहने वाला एक रेलवे सुरक्षा बल भी बनाए की तरफ सोचे क्योंकि राज्यों के स्तर पर रेल विभाग की पोस्टिंग केवल सज़ा के तौर पर ही दी जाती है जिससे रेल की सुरक्षा तो नहीं होती बल्कि हर व्यक्ति कुछ पैसे बनाने की तरफ ही लगा रहता है ? रेल विभाग को विभिन्न स्थानों पर यात्रियों से सुझाव मांगने की एक अच्छी और कारगर प्रक्रिया को अपनाना चाहिए क्योंकि पता नहीं इतने बड़े देश के किस यात्री के मन की बात रेलवे के लिए बहुत लाभकारी साबित हो ? रेल को आज वास्तव में देश की धड़कन बनाने की आवश्यकता है पर क्या चुनावी वर्ष में ममता दी बंगाल के बाहर पूरे देश के लोगों की आकांक्षाओं को पूरा करने की दिशा में कोई सार्थक कदम उठा पाने में सफल होंगीं ?      
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