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Monday, 10 September 2012

जल सत्याग्रह और सरकार

             मध्य प्रदेश के घोघलगांव और हरदा में चल रहे जल सत्याग्रह के मामले में जिस तरह से राज्य सरकार ने संवेदन शून्य रवैया अपनाया हुआ है उससे यही लगता है कि आने वाले दिनों में यह आन्दोलन और भी ज़ोर पकड़ सकता है क्योंकि जिस तरह से आन्दोलनकारी अपनी उचित मांगों के लिए कोर्ट के आदेशों के अनुपालन की मांग कर रहे हैं उसमें कुछ भी ग़लत नहीं है फिर भी देश के राजनैतिक तंत्र की तरफ़ से उनके लिए कोई उचित कदम नहीं उठाये जा रहे हैं. यह सही है कि देश में उपलब्ध संसाधनों के सही उपयोग के लिए राज्य और केंद्र सरकारें पूरी तरह से स्वतंत्र हैं पर विकास के नाम पर लोगों को पहले विस्थापित कर देने और बाद में उनकी बातों और जायज़ मांगों को अनसुना कर देने से आख़िर किसका भला होने वाला है ? देश के किसी भी वर्ग या क्षेत्र का कोई भी नागरिक किसी भी तरह के विकास का विरोधी नहीं है पर लोगों को विकास के नाम पर आख़िर कब तक सरकारें छलती रहेंगीं और अपने उन अधिकारों के लिए लोग इस तरह के आन्दोलनों की राह पकड़ते रहेंगें जो संविधान ने उन्हें दे रखे हैं ? सवाल यह भी है कि आख़िर वे कौन से कारण ही जिनसे हमारे लोगों को सही स्थिति का आंकलन करने में हमेशा ही चूक होती रहती है और जो कुछ परियोजना बनाये जाते समय बताया जाता है वास्तविकता उससे कहीं बहुत दूर होती है.
           मध्य प्रदेश के साथ गुजरात के लिए भी जीवन दायिनी बन चुकी नर्मदा नदी पर बनाये गए ओमकारेश्वर और इंदिरासागर बांधों के भरण क्षेत्रों में आवश्यकता से अधिक पानी भरे जाने से उन क्षेत्रों में भी पानी भरने की समस्या शुरू हो गयी है जो पहले से इन बांधों के लिए निर्धारत नहीं की गयी थी जिसके कारण इस नए डूब वाले क्षेत्र में लोगों की कृधि योग्य भूमि तो डूब गयी है पर उनको किसी भी तरह का मुआवज़ा नहीं मिला है और भूमि के जलमग्न होने से इन स्थानों पर रहने वाले किसानों और नागरिकों के लिए जीवन मरण का सवाल उठ खड़ा हुआ है ? पहले इन लोगों ने अपने स्तर से राज्य सरकार से गुहार लगायी अपर वोटों के मांगने के समय के अलावा जनता की फ़िक्र कभी भी न करने वाले हमारे देश के राजनैतिक तंत्र ने एक बार फिर से अपने बहरे होने का सबूत दिया जिससे नर्मदा बचाओ आन्दोलन के तत्वावधान में इनमें से कुछ लोगों ने विश्व में अपने तरह का अनूठा जल सत्याग्रह शुरू कर दिया है जिसमें ये लोग केवल अपने दैनिक कार्यों के लिए ही पानी से बाहर आते हैं और बाकी पूरे समय इसी डूब वाले पानी में खड़े या बैठे रहते हैं. अब जब इन जल सत्याग्रहियों के स्वस्थ्य पर पानी में रहने के कारण बुरा असर पड़ना शुरू हो चुका है तो सरकार ने अपने दो मंत्रियों को इनसे वार्तालाप करने के लिए भेजा जिन्होंने इनकी बातों पर ध्यान देने के स्थान पर इन पर ही आरोप लगा दिए.
          कोई भी प्रायोजित आन्दोलन अधिक दिनों तक नहीं चल पाता है पर जब जनता में से ही कुछ लोग स्वेच्छा से आगे आकर इस तरह के आंदोलनों में कमान संभाल लेते हैं तो इनको और अधिक शक्ति मिल जाती है. हो सकता है कि ये आन्दोलनकारी जिन मांगों के लिए पानी में खड़े हुए हैं उन्हें एकदम से मान पाना सरकार के लिए संभव न हो पर अपनी संवेदनशीलता का परिचय देकर कोई भी सरकार कम से बातचीत के दरवाज़े तो खोल ही सकती है और साथ ही इन दूर दराज़ के क्षेत्रों में रहने वाले नागरिकों के अधिकारों को बनाये रखने का प्रयास तो कर ही सकती है. पूरे मसले में जिस तरह से बिना किसी पूर्व योजना के ओमकारेश्वर बांध में पानी का जल स्तर १.५ मीटर बढ़ा दिया गया है उससे भी नए क्षेत्रों पर असर पड़ा है साथ ही अब आन्दोलनकारी यह आरोप भी लगा रहे हैं कि सरकार ने अभी तक पहले के विस्थापितों को ही ठीक ढंग पुनर्स्थापित नहीं किया है. जब केन्द्रीय जल आयोग और केंद्र सरकार किसी भी योजना को बनाती हैं तो साथ ही उससे होने वाली विस्थापन की समस्या पर भी विचार कर उनका समाधान भी निकाला जाता है पर इस मामले में केंद्र और राज्य सरकारें पूरी तरह से असफल रही हैं. अब जब बांध से जुड़ी वास्तविक समस्याएं सामने आ रही हैं तो कम से कम अब बिना राजनीति किये हुए इन पीड़ित लोगों के बारे में नए सिरे से सोचा तो जा ही सकता है ?          
हर धड़कन भारत के लिए है...

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