मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Thursday, 1 November 2012

विज्ञापन सरकारी या पार्टी के ?

           देश की प्रमुख राजनैतिक हस्तियों के जन्मदिवस पर जिस तरह से सरकारी खर्चे से विज्ञापन देने की अघोषित नीति चली आ रही है उससे एक बार फिर से विवाद उत्पन्न हो गया है क्योंकि अभी तक इस बारे में देश में कोई भी स्पष्ट नीति नहीं है जिससे यह तय किया जा सके कि क्या सही है और क्या ग़लत ? इस विवेकाधीन नीति का जिस तरह से आज के समय में दुरूपयोग बढ़ गया है उस पर रोक लगाने के लिए अब सरकार को कुछ न कुछ करना ही होगा क्योंकि बजट घाटे का रोना रोने वाली केंद्र और राज्य सरकारें किसी भी तरह से अपने हितों को साधने के लिए इस सार्वजनिक धन का दुरूपयोग करने से चूकती नहीं हैं जिस कारण से भी कई बार राजकोष को बहुत घाटा उठाना पड़ता है. यह सही है कि देश के पूर्व राजनीतिज्ञों के बारे में आज के लोगों को जानकारी देने के लिए सार्वजानिक रूप से कुछ किया जाना आवश्यक है पर इसका जो स्वरुप आज दिखाई देता है वह स्वीकार नहीं किया जा सकता है.
       क्या कारण है कि अपने वेतन भत्तों को एक बार में ही एक मत से बढ़वाने में कामयाब रहने वाले हमारे नेता इस तरह के मुद्दों पर चुप्पी लगा जाते हैं और आने वाले समय के लिए एक समस्या ही खड़ी कर देते हैं. सबसे पहले इस बात का निर्धारण किया जाना चाहिए कि केंद्र सरकार और राज्य सरकारें किस नीति के तहत विज्ञापन छपवा सकती है क्योंकि पूर्व प्रधानमंत्रियों के जन्मदिवस और पुण्य-तिथियों पर राज्य सरकारें भी किस तरह से विज्ञापन छपवा रही हैं इस पर भी विचार किये जाने की आवश्यकता है. राष्ट्रीय नेताओं की इन तिथियों पर केंद्र सरकार के साथ ही सम्बंधित राज्य सरकार पर यह ज़िम्मेदारी होनी चाहिए कि वह भी अपने विभाग से इस तरह के विज्ञापनों को प्रकाशित करवाए. इस काम के लिए संसद और राज्य विधान सभाओं को यह तय करना होगा कि किन नेताओं के नाम पर यह सब किया जाना है.
      इस सबके अतिरिक्त एक बात और ध्यान में रखने वाली है कि किसी भी राज्य या केंद्र सरकार द्वारा जारी किये जाने वाले सभी विज्ञापन या तो राष्ट्रीय रंगों में छापे जाएँ या फिर उन्हें केवल काला सफ़ेद ही रखा जाये क्योंकि कुछ राज्य सरकारों द्वारा अपनी पार्टियों के रंग में विज्ञापनों को छपवाया जा रहा है जबकि ऐसा करना कानून का सरासर उल्लंघन है. पार्टी को अगर अपने रंग के विज्ञापन छपवाने का इतना ही शौक है तो उसे अपने धन से यह सब करना चाहिए. कई बार चाटुकार अधिकारियों के कारण भी इस तरह की घटनाएँ होती रहती हैं जिनका अब तोड़ ढूँढा जाना आवश्यक है क्योंकि जनता पार्टियों को सरकार चलने का हक देती है न कि सार्वजानिक धन के दुरूपयोग का ? अब समय है कि इन बातों का भी निर्धारण किया जाये और आने वाले समय में राजकोष की इस तरह की लूट को रोका जा सके पर कोई भी दल इस बारे में सोचना भी नहीं चाहता है क्योंकि नेताओं को यह लगता है कि उनके मरने के बाद उनके विज्ञापन भी इसी तरह से निर्बाध रूप से छपते रहें....   
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

3 comments:

  1. कांग्रेस को कुछ समझाइये..

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  2. कोई भी दल इस बारे में सोचना भी नहीं चाहता है क्योंकि नेताओं को यह लगता है कि उनके मरने के बाद उनके विज्ञापन भी इसी तरह से निर्बाध रूप से छपते रहें...
    बस जनता को गुमराह करते हैं ये कि गलत बातों का विरोध हो रहा है ....

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