मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Thursday, 10 January 2013

तर्क या अर्थ संगत रेल किराया

                              लम्बे अन्तराल के बाद बढ़ाये गए रेल किराये के चलते एक बार फिर से विपक्षी दलों ने बिना बात का विरोध करना शुरू कर दिया है क्योंकि जिस तरह से रेलवे की परिचालन लागत में रोज़ ही बढ़ोत्तरी होती जा रही है उस स्थिति में आख़िर कब तक कृत्रिम रूप से रेल भाड़े को रोक कर रखा जा सकता है ? जिस तरह से रेलवे का परिचालन किया जाता है और उसके सुरक्षित परिचालन के लिए जितने अधिक मानव संसाधन के साथ ही अन्य संसाधनों की आवश्यकता पड़ती है उस स्थिति में अब यह कदम अपरिहार्य ही हो गया था. हर जगह पर लोगों को रेलवे से एक ही शिकायत रहती है कि वहां पर कुछ भी ठीक नहीं रहता है पर जब आर्थिक रूप से किसी भी तंत्र को चलाने के लिए जितने धन की आवश्यकता होती है यदि उसे ही नहीं उपलब्ध कराया जायेगा तो संरक्षा,सामान्य परिचालन, सफाई के साथ अन्य सभी बातों पर इसका प्रतिकूल असर पड़ना ही है. केवल राजनीति के लिए ही इस तरह की बातें करना भारतीय राजनीति के लिए एक अवसर बन चुका है क्योंकि जिस भी तरह से हो सके अब लोगों को केवल एक बात ही समझ में आती है कि उनका वेतन तो सरकार बढ़ाती रहे पर सरकार जो भी सुविधाएँ देती हैं उनका मूल्य आज़ादी के समय वाले स्तर पर ही टिका रहे ?
                      ममता के संप्रग से अलग होने के बाद यह लगने लगा ही लगा था कि अब इस किराये को अधिक समय तक इस बनावटी स्तर पर नहीं रखा जा सकेगा पर राज्यों के विधान सभा चुनावों ने सरकार को यह फैसला लेने से रोके रखा जिस कारण से भी रेलवे जो कुछ भरपाई इतने दिनों में कर सकती थी वह भी नहीं हो पाई. अब हमें उस मानसिकता से बाहर आना ही होगा जिसमें किसी भी सरकारी सेवा को मुफ्त में लेने के लिए हम सदैव लालायित रहा करते हैं क्योंकि इस तरह से आने वाले दिनों में वे सरकारी सेवाएं इतनी दीवालिया हो जायेंगीं कि उन्हें चलाना ही किसी भी सरकार के लिए संभव नहीं हो पायेगा ?  पिछले १० वषों में डीज़ल की कीमतों में ही कितनी बढ़ोत्तरी हो गयी है जिस कारण से भी आज रेलवे को बहुत बड़ी समस्या होने लगी है क्योंकि वह आज भी डीज़ल पर काफ़ी हद तक निर्भर है. वेतन में बढ़ोत्तरी के बाद जिस तरह से कर्मचारियों की लम्बी फौज को सुविधाएँ देने की बात है तो उसमें कोई कटौती नहीं की जा सकती है क्योंकि वहां पर यूनियन के नेता लोग पहले से ही झंडा उठाकर खड़े रहा करते हैं तो उस स्थिति में आख़िर रेल किस तरह से दोहरे दबाव के बीच में सुचारू रूप से चलायी जा सकती है ?
                     रेल मंत्री ने जिस तरह से एक रेल किराया निर्धारण प्राधिकरण के बारे में कैबिनेट में अपना प्रस्ताव रखने का मन बनाया है वह भी बहुत अच्छा है क्योंकि तब उसके सुझाव को उसी तरह माना जा सकेगा जैसे आज ट्राई और अन्य प्राधिकरण अपने काम को अंजाम देकर कहीं न कहीं से कोई नियंत्रण रख पाने में सफल हो रहे हैं और आम लोगों को बाज़ार के मूल्य पर प्रतिस्पर्धी सेवाएं मिल पा रही हैं. जब इस तरह का कोई प्राधिकरण बन जायेगा तो उसके द्वारा की गयी सिफारिशों पर समय बद्ध तरीके से आपत्तियां भी मांगी जायेगीं तब विरोध करने वाले नेताओं और अन्य लोगों के पास जो भी सुझाव और शिकायतें हो वे उस प्राधिकरण में कर सकेंगें. उसका सबसे बड़ा लाभ यह भी होगा कि रेल किराया परिचालन लागत के अनुरूप करने में देश को बहुत आसानी होगी और इस क्षेत्र में जो बिना बात की राजनीति की जाती है उसकी गुंजाइश भी ख़त्म हो जाएगी ? केवल थोड़े वोटों के लालच में इस तरह से देश के किसी भी एकाधिकार वाले क्षेत्र में आख़िर सरकार कब तक अन्य मदों से इकठ्ठा किया गया टैक्स लगाती रहेगी ? इस तरह से जो धन अन्य कल्याणकारी योजनाओं में लगाया जा सकता है वह केवल राजनीति की भेंट चढ़कर ही वापस ग़लत तरीके से जनता तक पहुँचता रहता है इसलिए अब रेलवे को दीर्घकालिक नीतियों पर ध्यान देकर आगे बढ़ाने के बारे में सोचा जाना चाहिए.           
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