मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Tuesday, 10 September 2013

दाऊद और अमेरिका

                              केन्द्रीय गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे ने जिस तरह से इस बात का खुलासा किया है कि भारत अमेरिका के सहयोग से वांक्षित अपराधी दाऊद इब्राहीम को पकड़ने के लिए संयुक्त रूप से काम करने के बारे में विचार कर चुका है उससे यही लगता है कि आने वाले दिनों में उन भारतीय भगोड़े अपराधियों और आतंकियों के लिए यहाँ वारदातें करके पाकिस्तान या किसी अन्य देश में छिपना उतना आसान नहीं रहने वाला है जितना अभी तक होता रहा है. पाकिस्तान के प्रति अमेरिका जिस तरह से अपने स्वार्थों की पूर्ति में उसकी आतंकियों को समर्थन देने की नीति की अनदेखी करता रहता है तो शायद अब उसे भी लगने लगा है कि यह सब लम्बे समय तक नहीं चलने वाला है क्योंकि भारत की तरफ़ से अब इस तरह के अपराधियों की धर पकड़ में अंतर्राष्ट्रीय कानूनों और समझौतों का सही तरह से उपयोग किया जाने लगा है उस स्थिति में अब पाक का साथ देने से अमेरिका की दोहरी नीतियों का खुलासा भी सबके सामने आ सकता है यह स्थिति अब भारत के अनुकूल भी है और इसका भरपूर लाभ भी उठाया जाना चाहिए.
                पाक ने अपने जन्म के समय से ही भारत के ख़िलाफ़ जो अनावश्यक मोर्चा खोल रखा है उसकी कोई आवश्यकता तो नहीं थी पर अब अमेरिका की इस बदली हुई रणनीति के कारण पाक के लिए उस नीति का पालन कर पाना मुश्किल अवश्य होने वाला है. आज भारत के साथ अमेरिका के बड़े औद्योगिक समूहों के आर्थिक हित जिस तरह से जुड़ गए हैं उस स्थति में यदि कोई युद्ध छिड़ता है तो उससे अमेरिका को भी कुछ न कुछ चोट अवश्य ही पहुंचेगी और उस दबाव को महसूस करते हुए या अनमने ढंग से ही सही पर अब अमेरिका भारत के साथ इस स्तर पर कुछ सहयोग करने को राज़ी दिखाई देता है. वैसे तो भारत ने अपने हितों को सुरक्षित करने के लिए कई देशों के साथ द्वि-पक्षीय सम्बन्ध मज़बूत करने के प्रयास काफी दिनों से शुरु कर रखे हैं फिर भी उनका कोई बड़ा फल सामने नहीं आता दिखा रहा था क्योंकि अभी तक भारत द्वारा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपने यहाँ अपराध कर भागने वाले अपराधियों के वर्तमान निवास वाले देशों से इस सम्बन्ध में सटीक और प्रभावी मांग नहीं की जाती रही है.
                     पुर्तगाल से अबू सलेम के प्रत्यर्पण के बाद से भारत ने इस दिशा में कुछ तेज़ी तो अवश्य दिखाई है संभवतः उसी कारण से टुंडा और भटकल के साथ हड्डी जैसे आतंकी सुरक्षा एजेंसियों के हत्थे चढ़े हैं फिर भी अभी इस उपलब्धि में ऐसा कुछ भी नहीं है जो हमें पूरी तरह से चैन से बैठने की मोहलत दे ? देश के नेताओं को एक बात यह भी समझनी चाहिए कि इस तरह के महत्वपूर्ण मुद्दों पर बयान देते समय उन्हें भी संयम से काम लेना चाहिए क्योंकि यदि शिंदे की तरफ़ से इस बात का खुलासा नहीं किया जाता तो क्या अंतर पड़ जाता ? इस तरह के बयानों से जहाँ इन आतंकियों के समर्थक और सचेत हो जायेंगें और उन सूत्रों तक पहुँचने में सुरक्षा एजेंसियों को और भी समय लगेगा जो भारत में इनके स्लीपिंग मोड्यूल के रूप में काम करते रहते हैं अच्छा हो कि अब इस तरह के हर मसले पर केवल ठोस प्रयास किये जाएँ और यदि किसी को भी गिरफ्त में लेने की कोशिश रंग लाती है तो वह तो हर हाल में सामने आएगी ही पर अब इस तरह की कोशिशों से यह संदेश देने के प्रयास तो होने ही चाहिए कि अब भारत में अपराध कर भाग जाने वाले उतनी सुरक्षित नहीं हैं जितने वे पहले कभी हुआ करते थे.       
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