मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Wednesday, 10 August 2016

टैल्गो - सपनों की हकीकत ?

                                                                       देश में अति महत्वपूर्ण मसलों पर भी हमारे विभाग और मंत्रालय किस तरह की नीतियों पर काम करते हैं यह देखने और समझने के लिए स्पेन द्वारा भेजी गयी टेल्गो ट्रेन के प्रायोगिक परिचालन पर ध्यान देना होगा. २०१४ में सरकार में आने के पहले से ही मोदी की प्राथमिकताओं में बुलेट ट्रेन और वर्तमान रेलवे नेटवर्क को सुधारने का एक बड़ा सपना भी शामिल रहा है और ऐसा भी नहीं है कि इस मुद्दे पर केवल बातें ही की गयी हों क्योंकि सुरेश प्रभु के रूप में आज देश के पास अति सक्रिय रेलमंत्री भी उपलब्ध हैं फिर आखिर रेलवे के काम काज में अपेक्षित सुधार क्यों नहीं आ पा रहा है यह सोचने का विषय है. शुरुवाती सूचनाओं में यह बताया गया कि टेल्गो के डिब्बे भारतीय रेल के वर्तमान ढांचे में बिना किसी बड़े परिवर्तन के ही चलाये जा सकते हैं जिससे रेलवे को कोई बड़ा निवेश नहीं करना पड़ेगा और अब जब इस ट्रेन का मुख्य मार्गों पर परीक्षण भी किया जा चुका है तो रेलवे की तरफ से यह कहा जा रहा है कि टैल्गो ट्रेन भारत में चलने के लिए उपयुक्त नहीं है ? इस तरह की गैर ज़िम्मेदारी भरी बातें करके आखिर रेलवे पूरी दुनिया में किस तरह का सन्देश भेजना चाहता है जबकि उसको अपने आधुनिकीकरण के लिए अगले बीस वर्षों में नवीनतम तकनीक की भरपूर आवश्यकता पड़ने ही वाली है.
                                         निश्चित तौर पर इस तरह की बातों के लिए सीधे पीएम या रेलमंत्री को ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है क्योंकि तकनीकी रूप से हर पैमाने को जांचने के लिए रेलवे के पास पूरा विभाग मौजूद है और इस पूरे परीक्षण के पहले क्या इस तरह की बातों पर विचार नहीं किया गया था ? आज जिस तरह से टैल्गो कोचों की लंबाई चौड़ाई कम होने की बात सामने आयी है और उसकी क्षमता भी कम बताई जा रही है तो क्या इससे पहले इन सब बातों को रेलमंत्री के संज्ञान में लाया भी गया था और क्या बिना किसी पूर्व तैयारियों के ही टैल्गो को सिर्फ स्टैण्डर्ड पटरियों पर दौड़ने वाली रेक मानकर ट्रायल के लिए रेलवे बोर्ड ने अनुमति दे दी थी ? ज़ाहिर है कि कहीं न कहीं रेलवे के अंदर ही कुछ ऐसे तत्व मौजूद हैं जो रेलवे के आधुनिकीकरण के प्रयासों पर पानी फेरने का काम करने में लगे हुए हैं और उन्हें इस बात से कोई मतलब भी नहीं है जो रेलवे में नयी तकनीक और सुरक्षा के साथ यात्रियों के लिए भी आरामदायक सफर की शुरुवात कर सकता है. निश्चित तौर पर विदेशों से वार्ता और ट्रायल के पहले रेलवे को इस तरह की कमियों को दूर करने के बारे में सोचना ही होगा.
                                        भारतीय पटरियों की वर्तमान संरचना पर जिस तरह से टैल्गो ने बेहतर प्रदर्शन किया है तो उसके बाद अब भारतीय रेल को टैल्गो के साथ द्विपक्षीय सहयोग के बारे में सोचते हुए महत्वपूर्ण मार्गों पर इसके वर्तमान स्वरुप में परिचालन के लिए सोचना चाहिए और दिल्ली-मुम्बई, दिल्ली-कोलकाता आदि मार्गों पर इसे चलाने के लिए खरीद का टेंडर करने के बारे में सोचना चाहिए. पूरे रेल नेटवर्क में एकदम से परिवर्तन संभव नहीं है इसलिए शताब्दी/राजधानी की तर्ज़ पर विदेशी सहयोग के साथ इन डिब्बों को पहले खरीदकर परिचालन में लाना चाहिए फिर इनको धीरे धीरे भारतीय आवश्यकताओं के अनुसार परिवर्तन में ढलने के बारे में सोचना चाहिए. ट्रेनों की लंबाई और यात्रियों की संख्या में हर गाड़ी का मुक़ाबला हम टैल्गो से नहीं कर सकते हैं क्योंकि स्पेन जैसे देशों में आबादी कम होने के कारण उन्हें इतने अधिक यात्रियों को गन्तव्य तक पहुँचाने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती है. शुरुवात में नौकरशाही और नियमों को ताक पर रखते हुए इसके कुछ रेक खरीदे जाने चाहिएऔर इस खरीद पर सीधे रेलवे की संसदीय समिति की निगरानी भी रखी जाये जिससे किसी भी तरह के भ्रष्टाचार के आरोप लगाकर इस परियोजना को पटरी से न उतारा जा सके. रेलवे में इस तरह के बड़े परिवर्तन के बारे में अलग तरह से सोचने से ही काम चल सकता है वर्ना अच्छी योजनाएं केवल समितियों के मकड़जाल में उलझ कर ही दम तोड़ दिया करती हैं.           
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