मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

बुधवार, 18 जनवरी 2012

क्रिकेट और बाज़ार

    जिस तरह से आस्ट्रेलिया में बीसीसीआई की क्रिकेट टीम की भद्द पिटी है उसके बाद क्रिकेट के खिलाड़ियों को भगवान का दर्ज़ा देने वाले बाज़ार की आँखें भी खुल गयी हैं और अब बड़ी कम्पनियों ने इस बारे में मंथन करना शुरू कर दिया है कि किस तरह से क्रिकेट खिलाड़ियों से सम्बंधित विज्ञापनों को रोका जाये ? यह ठीक ही है क्योंकि जब इतने पैसे खर्च करके ये कम्पनियां अपने ब्रांड के लिए इन खिलाड़ियों को अपनाती हैं तो इनके पिट जाने पर भला कोई कम्पनी कैसे अपने पैसों को बर्बाद करना चाहेगी ? अब यह सही समय है कि इस बात पर विचार किया जाए कि देश के कानून से भी अपने को ऊपर समझने वाले इस बोर्ड का आख़िर क्या किया जाये क्योंकि कई अवसरों पर इसने देश के सम्मान के साथ खिलवाड़ किया है और कई बार भारत की अंतर्राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय छवि को अपने मनमाने रवैये से धूमिल भी किया है. देश में खेलों को बढ़ावा मिले इससे किसी को कोई आपत्ति नहीं है पर इस तरह से खेल के नाम पर एक समानांतर व्यवस्था से कानून का लगातार उल्लंघन करने वाले इस तरह के बोर्ड के परिचालन का आख़िर क्या औचित्य है ? 
     देश में बाज़ार ने क्रिकेट को पैसे वाला खेल बना दिया जिससे बड़ी बड़ी कम्पनियों ने भारत के बड़े खिलाड़ियों से समझौते किये और उन पर अरबों रूपये पानी की तरह बहाए पर अब जब ये टीम पूरी तरह से ठिकाने लगी हुई है तो बाज़ार अपना काम करना शुरू कर चुका है जिससे इन खिलाड़ियों की कमाई पर असर होने वाला है. एक तरफ़ जहाँ ख़राब प्रदर्शन के कारण इनके सामने अपनी साख बचाने का संकट है वहीं दूसरी तरफ़ आर्थिक नुक्सान भी होने वाला है क्योंकि बिना अच्छे प्रदर्शन के बोर्ड तो पैसा दे सकता सकता है पर जब विज्ञापन में इनका उपयोग करने वाली कम्पनियों की बात आती है तो इनके साथ कोई भी नहीं होगा. अब बोर्ड की यह टीम देश के लिए नहीं खेलती है क्योंकि उसे और बोर्ड को केवल पैसों से ही मतलब है देश के सम्मान की इन सभी को कोई परवाह कभी से नहीं रही इन्हें केवल खेलने और पैसे पैदा करने में ही सारी दिलचस्पी है. ऐसे में उस बोर्ड के चुने हुए ये पैसों के भूखे लोग आख़िर कब तक देश के साथ न्याय कर सकेंगें ? 
     यह सारी बातें अभी अप्रैल से शुरू होने वाले आई पी एल के घोटाले में सामने आने वाली है इन्हीं खिलाड़ियों का प्रदर्शन खेल के इस प्रारूप में अचानक ही निखर जाया करता है और आज के दगे हुए कारतूस कल पूरी गर्जना के साथ सामने आने को बेताब दिखाई देने लगेंगें ? कहीं ऐसा तो नहीं है कि क्रिकेट खेल के स्थान पर वास्तव में सट्टा बाज़ार के हाथों बिक गया है क्योंकि बोर्ड की टीम जिस तरह से अनियमित पदर्शन करती है उससे यही संदेह होते हैं कि कहीं बाज़ार की मंदी में कुछ कारोबार करने वाले सट्टा बाज़ार में इसी तरह से पैसा बनाने में लगे हुए हों ? अभी फिलहाल चाहे कुछ भी हो पर इस खेल में बहुत कुछ ऐसा भी होता है जिसे खेल के पीछे का दूसरा खेल कहा जा सकता है क्रिकेट के नाम पर देश के नौजवानों को जो अफीम चटाई जा रही है वह देश की ऊर्जा को नष्ट कर रही है और जो युवा आगे बढ़कर देश के लिए कुछ कर सकते हैं वे इस खेल की चका-चौंध में फंसकर अपने भविष्य को बिगाड़ने में लगे हुए हैं.  
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कर्म से चिकित्सक और बहुत कुछ करने की आशा के साथ जीवन की अनवरत यात्रा पर बढ़ने का क्रम जारी.....

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