मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Monday, 26 October 2009

मुक़दमों की सुनवाई...

आख़िर कार सरकार ने इस बात पर ध्यान देने का मन बना ही लिया कि देश में लंबित मुक़दमों की संख्या को किस तरह से कम किया जाए। नई दिल्ली के विज्ञान भवन में आयोजित हुए सम्मलेन में हालाँकि एक दम से कुछ हल निकलने की आशा भी नहीं थी फिर भी जब इस पर विचार विमर्श किया गया है तो आगे फिर से कुछ करने का प्रयास तो किया ही जाएगा। सरकार ने नेशनल एरियर ग्रिड के बनने से लेकर अन्य बहुत सारे उपायों पर भी प्रस्ताव रखे हैं। हालाँकि विधायिका ने सरकार के इन प्रस्तावों पर कोई बहुत उत्साह नहीं दिखाया है। मुख्य न्यायाधीश बालाकृष्णन का कहना है कि जब तक सरकार ५००० और अदालतों का गठन नहीं करती है तब तक किसी भी समस्या का हल नहीं निकल पायेगा। देश के सभी जिलों में अभी तक पारिवारिक अदालतों का गठन भी नहीं हो पाया है। सरकार को अविलम्ब ७० सी बी आई अदालतों का गठन करना चाहिए क्योंकि इसके कई केस १७ सालों में भी नहीं निपट पाए हैं। न्यायमूर्ति कपाडिया ने सुझाव दिया कि आर्थिक मुक़दमों में भारी फीस ली जानी चाहिए क्योंकि ये सभी केस करने वाले अपने वकीलों को पाँच सितारा होटलों में ठहराते हैं। योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने कहा कि इस प्रस्ताव में विश्व स्तरीय योजना की कमी है।

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