मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Wednesday, 2 December 2009

भोपाल ! हम शर्मिंदा हैं ...

२/३ दिसंबर की रात भोपाल वालों के लिए २५ बरस पहले मौत का एक अजीब खेल साथ में लेकर आई। भारत में औद्योगिक दुर्घटना की उस घड़ी में कुछ भी ठीक नहीं था। बहु राष्ट्रीय कम्पनियां अपने यहाँ तो सुरक्षा के सभी मानकों का पालन करती हैं पर जब वे किसी अन्य देश में काम करती हैं तो उनके लिए आदमी की कीमत घट जाती है। भोपाल ने जो कुछ उस समय झेला वह दर्दनाक था पर हमारे पास तो तब से आज तक इस तरह की घटनाओं से निपटने का तंत्र आज तक नहीं बन पाया है। पिछले २५ वर्षों में कितना कुछ बदल गया है अब आज कुछ लोग भोपाल को रस्मी तौर पर याद कर लेंगें और फिर से एक साल के लिए वह हमारी नज़रों से बहुत दूर हो जाएगा। मिथाइल आइसो सायनाइड नामक वह गैस जिसने पता नहीं कितने भोपाल वासियों को मौत की नींद सुला दिया और न जाने कितने आज भी अभिशप्त जीवन जीने को मजबूर हैं। कहा जाता है कि मनुष्य की याददश्त बहुत कम होती है .... जिनके साथ यह हुआ वे आज भी सब सोचकर काँप जाते हैं और हम केवल अख़बार में १/२ कालम की रिपोर्ट पढ़कर ही अपने को जानकर मान लेते हैं और फिर से उस दर्द को भूल जाते हैं। आज भी एंडरसन जैसे लोग इस दुनिया में हैं जिनको सजा नहीं दिलाई जा सकी और आज भी दूसरों के ग़मों को भूल जाने वाले हम सब लोग भी हैं जो भोपाल को भूले बैठे हैं। अभी जयपुर के अग्निकांड में सब कितने बेबस थे यह दिख चुका है हमने अपनी गलतियों या समस्याओं से कुछ भी नहीं सीखा है बस यही है सारा फसाना....... देश किस तरह से इन औद्योगिक ज्वालामुखियों के मुहाने पर बैठा है यह सब जानते हैं पर सभी उस तरह से व्यवहार कर रहे हैं कि, 'मूंदहु आँख कतहूँ कोई नाहीं'। अब समय आ गया है कि राष्ट्रीय स्तर पर कुछ किया जाए जिससे हम भोपाल जैसी घटनाओं से बच सकें या फिर इनके दुष्प्रभाव को कम कर सकें। फिल हाल तो हम यही कह सकते हैं कि भोपाल ! हम शर्मिंदा हैं.........


मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

2 comments:

  1. यूनियन कार्बाइड को डाओ कैमिकल्स ने खरीदा था। उसके बाद भारत सरकार को डाओ कैमिकल्स को भारत में व्यापार करने देने से पहले भोपाल गैस कांड पर यूनियन कार्बाइड की जवाबदेही पूरी करने की शर्त रखनी चाहिये थी। शर्म की बात है कि डाओ कैमिकल्स भारत में धडल्ले से कारोबार कर रही है और अभी तक यूनियन कार्बाइड के उस संयंत्र की ठीक से सफ़ाई भी नहीं हो पायी है।

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  2. भोपाल ! हम शर्मिन्दा है :

    इससे ज्यादा हम हिन्दुस्तानियों को कुछ आता भी तो नहीं !

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