मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Wednesday, 2 June 2010

माओवादी करेंगें रेल सुरक्षा...

माओवादियों ने बीबीसी को फोन करके कहा कि रेलवे को उनसे डरने की ज़रुरत नहीं है क्योंकि उनके नियंत्रण वाले क्षेत्रों से होकर किसी भी रेल कि सुरक्षा की गारंटी वे लेते हैं और यदि कहीं से कोई भी इस तरह कि किसी भी गतिविधि में लिप्त पाया जायेगा तो उसके विरुद्ध कड़ी कार्यवाही करने की भी बात कही. ऐसे में यह सवाल उठता है कि केवल बन्दूक की बात करने वाले लोग अचानक ह्रदय परिवर्तन के बाद ऐसी बातें कर रहे हैं ? क्या ज्ञानेश्वरी दुर्घटना में वास्तव में कुछ ऐसा था जो माओवादियों की तरफ इशारा कर रहा था ? आखिर क्या हुआ कि जो कल तक रेल के दुश्मन थे वे आज उसके रखवाले बनने की बातें करने लगे हैं ?
      यह सही है कि रेलवे के विस्तृत नेटवर्क को देखते हुए उसकी दुर्गम स्थानों में सुरक्षा कर पाना हमेशा से ही चुनौती रहा है फिर भी आज तक रेल परिचालन पर ऐसे संकट के बारे में कभी सोचा भी नहीं गया था ? पंजाब में आतंक के चरम समय में भी सवारी गाड़ियों को छोड़कर अन्य गाड़ियों का परिचालन होता ही रहा था. यह सही है कि पंजाब के मुकाबले माओवादियों से प्रभावित क्षेत्र अधिक दुर्गम है फिर भी आज तक इन्ही स्थानों से होकर रेल के चलने में कोई समस्या नहीं होती थी पर कुछ लोगों के पागलपन ने रेल यात्रियों के मन में एक अनजाना सा डर बैठा दिया है कि पता नहीं कब कहाँ पर कोई हमला कर दे और यात्रियों की जान चली जाये ? इस बात से खुश होने की  ज़रुरत नहीं है कि अब माओवादी रेल के रखवाले बन गए हैं क्योंकि आज का नेतृत्व कुछ कह रहा है और हो सकता है कि आने वाले समय में वे कुछ तैयारी के लिए समय चाहते हों और फिर अपनी पूरी ताक़त से हमला करने की फिराक में हों ?
         देश में रहने वाले सभी नागरिक हमारे हैं और उनके खिलाफ़ कोई कड़ा कदम उठाने से सरकार भी सकुचाती है क्योंकि ऐसे किसी भी अभियान में कुछ हद तक निर्दोष भी फँस जाते हैं. पर सवाल है कि जिन्हें हम अपना मान रहे हैं वे किसके हाथों में खेल रहे हैं और किस तरह से निर्दोषों को मार रहे हैं ? रेल में यात्रा करने वाले और बस से सफ़र करने वाले आखिर किस आन्दोलन का विरोध कर रहे थे ? किसने उनको माओवादियों के खिलाफ़ या सरकार के समर्थन में खड़ा करने के लिए लिए कहा था ? वे तो बस अपने काम की तलाश में या किसी और काम से रेल में जा रहे थे... कितने लोगों को खून के आंसू रुलाने के बाद अब यह किस तरह की बात की जा रही है ? क्या इस तरह के काम को अंजाम देने से पहले यह नहीं सोचा गया था कि निर्दोष अपने लिए इंसाफ मांगने के लिए फिर से वापस नहीं आने वाले ?????       

मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

4 comments:

  1. क्रोध पर नियंत्रण स्वभाविक व्यवहार से ही संभव है जो साधना से कम नहीं है।

    आइये क्रोध को शांत करने का उपाय अपनायें !

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  2. यानी भेड़िया भेड़ की रक्षा का वचन दे रहा है तो सच्चा ही होगा.

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  3. नक्सली देश के लिए एक विकट समस्या बनते जा रहे हैं.... और इनकी बात पर भरोसा कौन करेगा..।
    ये तो अब तबाही के मंजर से खुश होने लगे हैं....

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  4. ये तो अब तबाही के मंजर से खुश होने लगे हैं....
    sahi kaha

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