मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Wednesday, 8 September 2010

बंद और देश...

देश में जिस तरह से आम जनजीवन को प्रभावित करने वाले बंद बहुत जल्दी जल्दी आयोजित किये जाने लागे हैं उससे लगता है कि नेताओं को आम जनता की बिलकुल भी परवाह नहीं रह गयी है. यह सही है कि लोकतंत्र में सभी को अपनी बात कहने और जनता के सामने रखने का पूरा हक़ मिला हुआ है पर जिस तरह से इस हक का दुरूपयोग किया जाने लगा है उससे क्या जनता को समस्या के प्रति जागरूक किया जा सकता है ? बिलकुल भी नहीं ! क्योंकि इस तरह से बंद से होने वाली परेशानियाँ जनता के लिए अधिक होती हैं. बंद का आह्वाहन करना और जबरिया बंद करना दोनों बातों में बहुत बड़ा अंतर है क्योंकि अगर जनता इतनी परेशान है तो वह खुद ही इस तरह के आन्दोलन में भाग लेने के लिए सामने आ जाएगी और अगर उसे कोई खास परेशानी नहीं है तो वह छुट्टी मनाकर बंद को टी वी पर ही देखना पसंद करेगी.
           अगर लोकतंत्र ने राजनैतिक दलों को यह अधिकार दिया है कि वे अपनी बात के समर्थन में बंद कर सकें तो इसका मतलब यह तो नहीं हो सकता कि ये दल हर तरह की मनमानी पर उतर आयें ? अब समय आ गया है कि किसी भी तरह के बंद का आह्वाहन करने वाले दलों पर यह ज़िम्मेदारी भी डाली जाये कि वे किसी के खिलाफ बल प्रयोग नहीं करेंगें और जिस राजनैतिक दल ने बंद बुलाया है यह उसकी ही ज़िम्मेदारी होगी कि जनता और सार्वजानिक संपत्ति की रक्षा भी उन्हें ही करनी होगी. आज़ादी के आन्दोलन में जे पी के आन्दोलन में क्या किसी को जबरिया बुलाया गया था ? नहीं फिर भी लोग अपनी नौकरियों तक को छोड़कर आन्दोलन में कूद पड़े थे क्योंकि उन्हें तब लग रहा था कि जनता के साथ बहुत ना-इंसाफी हो रही है.
          बंद के कारण सबसे बड़ी समस्या उन लोगों को होती है जो किसी आपातकालीन काम से जा रहे होते हैं किसी बीमार को ले जाने वाली एम्बुलेंस और किसी आपरेशन के लिए जाने वाले परिवार जनों को इस तरह के बंद कितने भारी पड़ते हैं यह कभी भी कोई राजनेता नहीं समझ सकता है ? जब तक इनका कोई खास इस तरह के जाम में फंसकर पाना सब कुछ नहीं गवां देगा तबा तक ये इस तरह की घटिया हरकतें करके लोगों का जीना हरम करते रहेंगें. रेल और सार्वजानिक परिवहन के साथ सार्वजानिक आवश्यक सेवाओं को हर तरह के बंद से मुक्त रखने के कानून को बनाने की आज बहुत आवश्यकता है, और अब समय आ गया है कि इस बारे में नेता खुद ही विचार करें वर्ना जनता की परेशानियों को देखते हुए माननीय सर्वोच्च न्यायालय स्वयं ही इस पूरे मामले को संज्ञान में लेते हुए जनता की समस्याओं को कम करने का काम करे. किसी को बंद करना है तो वह शौक से करे पर किसी भी तरह के सार्वजनिक जीवन में बाधा पहुँचाने के खिलाफ अब बहुत कड़े कानून की आवश्यकता है जिससे ये दल इस तरह के किसी भी बंद को बुलाने से पहले सौ बार सोचने पर मजबूर हो जाएँ.    

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