मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Saturday, 2 October 2010

नेता की ज़रुरत ?

अयोध्या मामले पर कोर्ट के फैसले के बाद जिस तरह से आम जनता ने संयम और सद्भाव का परिचय दिया है वह अपने आप में एकता की बहुत बड़ी मिसाल है पर लगता है कि हमारी मनः स्थिति से अभी भी देश के नेता परिचित नहीं हो पाए हैं ? यह सही है कि यह मसला वास्तव में देश के लिए बहुत बड़े बदलाव लेकर आने वाला था और अब हम आम भारतीय गर्व से कह सकते हैं कि हमने दुनिया को यह दिखा दिया है कि देश अब अपने असली मुद्दों को पहचानना सीख गया है जिन नेताओं ने यह आशा की थी कि फैसले के बाद जगह जगह गड़बड़ी शुरू हो जाएगी उन्हें इस बात से गहरी निराशा हो रही है कि आख़िर जनता इतनी समझदार कैसे हो गयी ? इन नेताओं को जनता ने किसी भी तरह की राजनैतिक रोटियां सकने का कोई भी इस बार अवसर नहीं दिया और यहाँ तक अयोध्या के लोगों का जो सद्भाव मीडिया के माध्यम से देश के सामने आया उससे आम लोगों को लगा कि जब विवाद वाले नगर के लोग शांति से रह सकते हैं तो फिर हम आपस में क्यों विद्वेष रखें ?
           आज इस फैसले के बाद जनता को इन घटिया नेताओं से बचकर रहने की ज़रुरत है क्योंकि १९९२ के बाद से सरयू में बहुत पानी बह चुका है और देश में शिक्षा, भूख, रोज़गार आज बड़े मुद्दे हैं. नेताओं के मुंह पर जनता ने संयम का परिचय देकर ज़ोरदार तमाचा मारा है क्योंकि उन्हें कुछ होने की उम्मीद थी ? कई बार लगने लगता है कि क्या वास्तव में देश को इस नेता नामक घटिया प्राणी की आवश्यकता भी है ? देश की आत्मा से निकले भाव को यह पहचान नहीं पाते या फिर ऐसे कह दें कि ये सच्चाई से आँखें मूँद लेना ही हितकर समझते हैं ? क्यों इन्हें चंद वोट के लालच में देश का सामाजिक ताना बाना बिखराने में इतना मज़ा आता है ? यह सही समय है कि इन लोगों की बातों में नहीं आया जाए और अपने हिसाब से चला जाए.
       आज के समय में हम सभी को इन नेताओं में उन तत्वों कि पहचान करनी ही होगी जो किसी भी मसले को बिना बात के उखाड़ने में विश्वास रखते हैं और समय आने पर इनको किसी भी तरह से विधान सभाओं और संसद तक नहीं पहुँचने देना चाहिए. इन लोगों को नेता हमने ही बनाया है और इनसे यह रुतबा वापस लेने का पूरा हक भी हमारे पास है. आज हमें इन नेताओं को यह सबक सिखाना ही होगा कि अब उनके मन से देश नहीं चलेगा बल्कि उनको देश के हिसाब से चलना सीखना होगा...


मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

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