मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Tuesday, 15 February 2011

२ जी और भाजपा ?

                                 जिस तरह से २ जी स्पेक्ट्रम घोटाले में अब भाजपा नीत राजग की कुछ नीतियों पर सवाल उठने लगे हैं उसे देखकर यही लगता है कि आने वाले समय में कुछ बड़ा तथ्य इस मामले में सामने आ सकता है ? अभी तक जो भाजपा कांग्रेस पर यह आरोप लगाने से नहीं चूकती थी कि उसने राजा के काले कारनामों की अनदेखी की आज वह खुद ही इस मसले में उलझती दिखाई देती है. जिस तरह से पूर्व दूर संचार मंत्री अरुण शौरी ने इस बात का खुलासा किया कि उनके कहने के बाद भी लोकसभा और राज्यसभा में यह मसला उतने प्रभावी ढंग से नहीं उठाया गया जैसे इसे उठाया जाना चाहिए था उसके बाद से भाजपा में बेचैनी बढ़ गयी है और तेज़ी से छवि को हुए नुकसान की भरपाई करने की कोशिशें शुरू कर दी गयी हैं. यह एक ऐसा मुद्दा है जिस पर पूरे देश के राजनीतिज्ञों को अब पार्टी लाइन से ऊपर उठकर सच को सामने लाने का प्रयास करना चाहिए.
                               यह सही है कि पिछले १५ वर्षों में देश में दूरसंचार क्रांति ने देश की दिशा बदल दी है और इस क्षेत्र से सरकार को भी बहुत बड़ा राजस्व मिलने लगा है. जब किसी भी विकसित होते क्षेत्र के बारे में बात की जाती है तो उसके अच्छे विकास के लिए सरकारें हमेशा से ही प्रोत्साहन नीतियों की घोषणा करती रहती हैं और दूरसंचार के मामले में भी ऐसा ही हुआ. जहाँ सरकार प्रोत्साहन की घोषणा करती रही वहीं चंद लोग इसमें भी अपने लाभ के बारे में सोचने लगे ? नयी नीतियों में हो सकता है कुछ खामियां रह गयीं हों पर सरकारें बाद में क्या करती रहीं ? आख़िर किसके हितों को साधने के लिए दूर संचार मत्रालय चुप रहा ? हो सकता है कि १९९८ में जो नीतियां बनाई गयी थीं वे अब बेकार साबित हो गयी हों ? पर यहाँ पर एक सवाल उठता है कि जिन सांसदों को जनता देश के हितों की रखवाली करने के लिए दिल्ली भेजती है वे क्या करते रहते हैं ? केवल वेतन भत्ते लेकर ही वे खुश हैं ? शायद हाँ...... क्योंकि जब भी संसद में कुछ ठोस करने का समय होता है तो ये वहां पर सदन ही नहीं चलने देते हैं ?
                कोई भी मुद्दा देश से बड़ा नहीं हो सकता है आज जब अन्य मुद्दों को सड़क पर लाया जा सकता है तो आख़िर इन मुद्दों को लेकर जनता के बीच क्यों नहीं जाना चाहिए ? हो सकता है कुछ नियमों की ओट में सरकार संसद में इन मुद्दों पर बहस न होने दे तो विपक्ष के पास जनता की अदालत खुली हुई है. अब समय है कि ऐसी किसी भी परिस्थिति में विपक्षी दल जनता को साथ लें और साथ ही आज के समय के सबसे घातक हथियार मीडिया को साथ में लेकर खुली बहस करने का प्रयास करें. आज जो सत्ता में थे कल वे विपक्ष में थे तो इस मामले में कोई यह नहीं कह सकता है कि उसके कारण राजस्व का कोई नुकसान नहीं हुआ है ? अभी हमारे दलों और राजनीतिज्ञों में इतनी शक्ति नहीं आई है कि वे इस तरह की किसी भी गलती को मान कर उसे जल्दी से सुधारने का प्रयास करने लगें ? अब देश को ईमानदार लोगों की बहुत आवश्यकता है ? केवल एक दो लोगों के ईमानदार होने से अब काम नहीं चलने वाला है क्योंकि देश में जिस तेज़ी से भ्रष्टाचार बढ़ रहा है उससे निपटने के लिए अब बहुत कुछ किया जाना आवश्यक है.      
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