मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Wednesday, 23 March 2011

मंहगाई और सरकार

              मध्य पूर्व में बढ़ रहे राजनैतिक संकटों ने एक बार फिर से कच्चे तेल की कीमतों में आग लगाने का काम किया है. अभी तक जापान में सुनामी आने के बाद तेल की मांग में कमी आने के कारण एक बार इसके दाम १०० डॉलर प्रति बैरल से नीचे भी आ गए थे पर लीबिया में जारी संघर्ष ने एक बार फिर से इसके दामों में उछाल ला दिया है. भारत जैसी तेज़ी से बढ़ती हुई आर्थिक ताकतों को इससे होने वाले दुष्परिणामों के बारे में अभी से तैयार रहना होगा क्योंकि हमारी ९० % तेल आपूर्ति आयात से ही पूरी होती है और आज के समय में जिस तरह से तेल की कीमतें लगातार बढ़ती ही जा रही हैं तो सरकार के लिए इन पर अस्थायी रूप से काबू करने की हर कोशिश बेकार ही साबित होने वाली है. फिलहाल ५ राज्यों में होने वाले चुनावों को देखते हुए हो सकता है कि कुछ दिनों तक यह मूल्य वृद्धि टाल दी जाये पर इसको अनिश्चित काल तक रोक पाना संभव नहीं रह गया है. 
     इस तरह से तेल की कीमतों के बढ़ने से सबसे पहले माल-भाड़ा और यात्री किराये बढ़ने की आशंका भी प्रबल होती जा रही है, क्योंकि इस स्थिति में इनके बढ़ने से हर आवश्यक वास्तु के दाम अपने आप ही बढ़ने लगेंगें जिससे सरकार मंहगाई पर काबू करने के लिए जो कुछ भी कर रही है उस पर पानी फिर जायेगा. सरकार के सामने इस मसले पर कोई भी विकल्प नहीं बचे है और अगर राजनैतिक दबाव में वह तेल के दाम कृत्रिम रूप से नीचे रखने की कोशिशें करती भी है तो इससे तेल कम्पनियों की आर्थिक स्थिति बहुत बिगड़ने की संभावनाएं बनने लगेंगीं. आज के समय में केवल वही कम्पनी चल पायेगी जिसको आर्थिक रूप से पूरी स्वतंत्रता हो और जिसके हित केवल कुछ राजनैतिक फैसलों के कारण न रोके जा रहे हों ? आने वाले समय में तेल की खोज और उत्पादन के लिए तेल कम्पनियों को बहुत बड़ी लागत लगानी होगी पर जब खस्ता आर्थिक हालात में ये कम्पनियां अपने वजूद को बचा पाने में समर्थ होंगीं तभी इनसे कुछ आगे बढ़ने की आशा की जा सकती है.
     देश के लिए तो अच्छा यही होगा कि कहीं न कहीं से इन तेल कम्पनियों की आर्थिक स्थिति को चुनावों पर प्राथमिकता दी जाये क्योंकि जब तक चुनाव होंगें तब तक मंहगाई पता नहीं किस स्तर को छू लेगी ? अभी भी समय है कि इस तरह की अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जुड़ी हुई किसी भी वस्तु की कीमतों में निर्धारण करने की मंशा सरकार पालना ही छोड़ दे क्योंकि आज के समय में हर व्यक्ति अपने खर्चे चलाने के लिए बहुत कुछ करना सीख गया है सरकार को किसी भी तरह की सब्सिडी देने के स्थान पर लोगों के लिए देश के हर क्षेत्र में रोज़गार के अवसर पैदा करने के प्रयास करने चाहिए क्योंकि जब लोगों के पास काम होगा तो वे खर्च करने लायक आवश्यक धन भी जुटाकर इस मंहगाई से निपट सकेंगें. देश में किसी भी तरह की सब्सिडी ने भ्रष्टाचार को ही जन्म दिया है और अब इसे किसी भी स्तर पर और भ्रष्टाचार बढ़ाने के लिए नहीं छोड़ा जा सकता है. देश की जनता को यह बात अब समझनी होगी और इन मूल्यों के बढ़ने पर फालतू की हाय तौबा मचाने के स्थान पर इसकी बचत करने के बारे में सोचना होगा.         
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