मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Wednesday, 4 May 2011

लादेन और सम्मान

         विश्व के कुख्यात और सबसे वांक्षित आतंकी ओसामा के मारे जाने के बाद उसके शव का जिस तरह से अमेरिका ने समुद्र में अंतिम संस्कार किया उससे यही लगता है कि उसके मरने के बाद अमेरिका को क्या करना है यह पहले से ही निश्चित कर लिया गया था. पूरे विश्व में कहीं पर भी उसको ज़मीन में दफ़नाने पर बाद में इस्लामी चरम पंथियों द्वारा उसके लिए कोई मज़ार आदि बनायीं जा सकती थी और वह स्थान इस्लामिक चरमपंथियों के लिए एक तीर्थ जैसा भी हो सकता था इस सबसे बचने के लिए ही अमेरिका ने उसकी पहचान की पुष्टि होने के बाद उसके शव का अंतिम संस्कार इस्लामिक रीतियों के अनुसार कर दिया. वैसे भी अमेरिका में चाहे जितनी बुराइयाँ हों पर इस तरह के मामलों में वह जवाबदेही से नहीं बच सकता अहि क्योंकि वहां की चुनी हुई हर सरकार को हर बात के लिए जवाब देना होता है.
                अब इस बात को लेकर ही मुद्दा बनाया जा रहा है कि क्या ओसामा को वास्तव में अमेरिका ने वो सम्मान दिया होगा जो इस्लामी रीतियों के अनुसार होना चाहिए था ? भारत में भी जिस तरह से इस्लामी बुद्धिजीवियों और अन्य लोगों के बयान आ रहे हैं उसका कोई मतलब नहीं है. इस तरह का कोई भी बयान लोगों के मन में संदेह पैदा करता है और इसी लिए किसी भी संदेह को दूर रखने के लिए देवबंद ने इस मामले पर कुछ भी कहने से पहले ही मना कर दिया है. यह सही है कि मृतक के साथ उसके धर्म के अनुसार बर्ताव करना चाहिए पर ओसामा के कारण कितने लोग जलकर मारे गए जिनमें से बहुत सारे इस्लाम को मानने वाले भी थे जहाँ पर जलकर मरने को अच्छा नहीं माना जाता है ? इसी तरह से फिदायीन हमले करके तालिबान और अल कायदा द्वारा अधिकांश स्थानों पर आग लगने से मरने वालों के बारे में क्या कहा जाये ? क्या जीवन में ओसामा ने कभी भी किसी अन्य के बारे में परवाह की थी जो कोई उसके बारे में इतनी परवाह करता ? पाकिस्तान समेत पूरी दुनिया के मुसलामानों में अब यह बात प्रचारित की जा रही है कि ओसामा के साथ हुई इस ज्यादती का बदला लिया जायेगा.
    पाकिस्तान के बारे में तो सबको पता है कि कारगिल युद्ध के समय किस तरह से उसने शुरुवात में धोखे से पकडे गए भारतीय सैनिकों के शवों को किस हाल में वापस किया था और फिर इस युद्ध को ज़िहाद का नाम देने के लिए इस युद्ध में शामिल अपने ही सैनिकों के शव लेने से मना कर दिया था जिन्होंने पाकिस्तान के लिए अपनी जान की बाज़ी लगा दी थी ? जबकि वे सैनिक थे अपने कर्त्तव्य का पालन कर रहे थे और उचित सम्मान के हकदार थे जो पाकिस्तान की जगह भारत ने उन्हें दिया. अफगानिस्तान में इसी अल कायदा के कहने पर वहां के तत्कालीन राष्ट्रपति नजीबुल्लाह को किस सम्मान के साथ चौराहे पर फाँसी दी गयी थी ? जो अल कायदा हमेशा से ही इस तरह की गतिविधियों में लिप्त था तो क्या उसके प्रमुख को प्रकृति से उसके किये की सजा नहीं मिलनी थी ? अब इन बातों का कोई मतलब नहीं है क्योंकि बर्बरता में तालिबान और अल कायदा ने कोई कसर नहीं छोड़ी थी और जब किसी अन्य को भी अवसर मिल जाता है तो वह भी अपने तरीके से भड़ास निकालने की कोशिश करता है.             
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

2 comments:

  1. यह भी अमेरिका की एक नीति है ताकि दादागिरी पे कोई ज्यादा नहीं बोल पाए

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  2. arvind Rastogi5 May 2011 at 20:04

    I Think It is Again a Time To Learn From USA How to Fight With Terrorism

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