मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

शनिवार, 14 मई 2011

बच सकते हैं गिद्ध

दर्द निवारक दवा डिक्लोफेनैक के जानवरों में इस्तेमाल से उनकी लाशों में मरने के बाद भी मौजूद ने पूरे दक्षिण एशिया में गिद्धों की प्रजातियों पर ही संकट खड़ा कर दिया था पर लोगों में चेतना फ़ैलाने और इस दवा के बुरे असर को बताने के बाद अब जानवरों में इसका प्रयोग कम हो गया है जिससे इन गिद्धों के मरने की संख्या में कमी हुई है. एक ताज़ा रिपोर्ट में यह बताया गया है कि पहले की तरह अब गिद्धों के मरने की संख्या में काफ़ी कमी दर्ज़ की गयी है फिर भी यह नहीं कहा जा सकता है कि अब गिद्धों पर से संकट टल गया है ? पूरे दक्षिण एशिया में जिस तरह से दवाओं का दुरूपयोग किया जाता है वैसा शायद ही कहीं और देखने को मिले पर अब इस पर सरकार के साथ आम लोगों को भी ध्यान देने की आवश्यकता है क्योंकि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को सुचारू रूप से चलाने के लिए इसमें प्रकृति के हर प्राणी का होना बहुत आवश्यक है और किसी की भी कमी हमारे पूरे माहौल को बदलकर रख देगी.
अब यह समाचार ख़तरे में पड़ी जीव जंतुओं को बचाने के लिए काम करने वाले संगठनों और समूहों के लिए बहुत ही सुखद है क्योंकि जिस तरह से अचानक ही गिद्धों की संख्या में कमी दर्ज़ की गयी और जब तक यह समझ में आ सकता कि आख़िर इनके अचानक मरने के पीछे क्या मुख्य कारण है तब तक बहुत देर हो चुकी थी और प्रकृति के इस अनोखे सफाई कर्मचारी का वजूद ही संकट में आ गया था ? फिर भी यह अच्छा ही रहा कि कम से कम इस बात का पता भी समय रहते चल गया कि इनकी मौत के लिए हमारी लापरवाही और कुछ हद तक लालच भी ज़िम्मेदार है. अभी भी पूरी तरह से इस प्रतिबंधित दवा का दुरूपयोग नहीं रुक पाया है फिर भी जिस तरह से लोगों को पता लगने के बाद इसका उपयोग जानवरों में घटा है उससे यही कहा जा सकता है कि आने वाले समय में हमारे पास भी फिर से इन गिद्धों की भरपूर संख्या होगी. अब भी इस बात के लिए लोगों को जागरूक किये जाने की आवश्यकता है जिससे कम से कम लोग अनजाने में ही तो यह अपराध न करते रहें क्योंकि आज भी लोगों को यह नहीं पता है कि यह दवा पूरी गिद्ध प्रजाति पर कितनी भारी पड़ चुकी है ?
अब हमें फिर से अपने आस पास के जीव जंतुओं का ध्यान रखना सीखना होगा क्योंकि मनुष्य के इस पृथ्वी पर विकसित होने के समय से ही यह सभी प्राणी हमारे साथ रहते आए हैं और अब इनके बिना बहुत सा ऐसा काम भी बचने वाला है जो कितने भी पैसे खर्च करके नहीं किया जा सकता है ऐसा नहीं है कि पहले जानवरों के मरने के बाद प्रदूषण नहीं होता था पर उस समय गिद्धों का झुण्ड आकर इन मरे हुए शवों को आसानी से चट कर जाया करता था और स्थानीय स्तर पर प्रदूषण भी नही फैलता था पर अब इनकी कमी के बाद हमें यह पता चलने लगा है कि इनकी क्या आवश्यकता है पर अगर अब भी हम नहीं चेते तो यह पूरा तंत्र भी बिगड़ने में देर नहीं लगेगी और हमारे आस पास बीमारी फ़ैलाने वाली अन्य बहुत सारी चीज़ें उपलब्ध होकर हमारे समाज को बीमार करती रहेंगीं. अब हमें किस तरह के माहौल में रहना है यह फैसला भी हमारा ही होना है…… 
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