मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Monday, 20 June 2011

अमेरिका और तालिबान

             एक समय में अपने ही फ़ायदे के लिए बनाये गए तालिबान को लेकर अमेरिका ने अब अफ़गानिस्तान में शांति लाने के उद्देश्य से बात चीत शुरू कर दी है. अभी तक करज़ई सरकार की तरफ से यह कहा जाता था कि अमेरिका और कुछ अन्य देशों की सरकारें अफ़गानिस्तान के लिए तालिबान से बात कर रही हैं पर अब अमेरिकी रक्षा मंत्री राबर्ट गेट्स ने इस बात की पुष्टि कर दी है कि अमेरिका की तालिबान से बात शुरू हो चुकी है. गेट्स का कहना था कि पहले हमें यह तय करना मुश्किल था कि हम जिनसे बात कर रहे हैं वे वास्तव में असली तालिबान से हैं या कोई अन्य ही हमसे बात कर रहा है. यह प्रक्रिया काफी लम्बी थी और अब हम सही लोगों से बात कर रहे हैं. वास्तव में अमेरिका और इस्लामी कट्टर पंथियों के बीच जो अविश्वास का भाव बना हुआ है उससे तो यही लगता है कि ये दोनों पक्ष आसानी से आपस में बात नहीं कर पायेंगें फिर भी अफगानिस्तान के हित के लिए कहीं न कहीं से बात तो शुरू करनी ही थी. इसका पूरी दुनिया में स्वागत होना चाहिए और अमेरिका को किसी गुप्त समझौते के बजाय यह पूरी प्रक्रिया पारदर्शी रखनी चाहिए जिससे सभी देश जान सकें कि क्या हो रहा है ?
         अमेरिका और तालिबान में वर्चस्व की लड़ाई में नुकसान केवल अफ़गानिस्तान का ही हुआ है. जिस तरह से वहशी बनकर तालिबान ने अपने राज के दौरान लोगों का जीना हराम किया था वह किसी से छिपा नहीं है और फिर अमेरिका ने ९/११ के बाद जिस तरह से अफगानिस्तान को बमों से पाट दिया वह भी किसी से छिपा नहीं है. पर आज वो सब बातें पुरानी पड़ चुकी हैं और अब दोनों ही पक्ष इस कभी न जीते जाने वाले युद्ध से अपना पीछा छुड़ाना चाहते हैं तो ऐसे स्थिति में यह बातचीत और भी सार्थक हो सकती है. अमेरिका अपनी दीर्घकालीन योजना के तहत इस जुलाई से अफ़गानिस्तान से अपनी सेनाएं चरणबद्ध तरीके से हटाना शुरू करने वाला है और वह यह भी नहीं चाहता कि उसके जाने के बाद एक बार फिर से वहां पर तालिबान का कब्ज़ा हो जाये बस इसलिए ही वह अभी से तालिबान को बात चीत के द्वारा वहां की राजनैतिक प्रक्रिया में शामिल करवाना चाहता है. अफ़गानिस्तान के भविष्य को देखते हुए यह अच्छा ही होगा कि तालिबान वहां पर राजनैतिक प्रक्रिया में शामिल होकर लोगों की मंशा के अनुरूप शासन करें. यदि तालिबान लोकतंत्र में भरोसा दिखाता है तो सभी लोकतान्त्रिक देशों की बैठक बुलाकर तालिबान के लोगों की उनसे बात करवाई जाए और पूरी दुनिया में जिस भी देश की लोकतान्त्रिक प्रक्रिया को तालिबान देखना और समझना चाहें तो उन्हें वहां ले जाकर भी पूरी व्यवस्था को दिखाना भी चाहिए. 
         आज ओसामा के मरने के बाद शायद तालिबान को यह लगने लगा है कि आने वाले समय में अमेरिका उसे भी इसी तरह ख़त्म करने का प्रयास कर सकता है और अमेरिका के पास अफ़गानिस्तान से सम्मान पूर्वक जाने के कोई कारण भी तो होने चहिये जिससे वह अभिमान के साथ यह कहता हुआ वहां से जाए कि उसने अपने प्रयासों से अफ़गानिस्तान का भविष्य सुधारने की पूरी कोशिश की है. अब यह तालिबान पर है कि वे इस अवसर को किस तरह से लेते हैं ? उनके पास शायद इससे अवसर अब इतनी जल्दी नहीं आने वाला है और अपने रवैये के चलते अमेरिका किसी भी सूरत में तालिबान को माफ़ नहीं करेगा. ऐसे में अगर वार्ता की मेज़ पर कोई समाधान ढूँढा जा सके तो यह केवल पाक को छोड़कर पूरे दक्षिण एशिया के लिए बहुत ही कारगर और शांति लाने वाला हो सकता है. जब अमेरिका को इस क्षेत्र में किसी अन्य देश से ख़तरा नहीं होगा तो वह खुद ही यहाँ से जाना चाहेगा. इस पूरी कवायद में पाक को वह सब नहीं मिल पायेगा जो अब तक वह अमेरिका को डराकर हासिल कर रहा था ? पूरे क्षेत्र में पूरी तरह से शांति हो जाने पर अमेरिका को भी पाक की ज़रुरत नहीं रह जाएगी.   
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