मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Sunday, 6 November 2011

पेट्रोल की आग़

     जिस तरह से मनमोहन सिंह ने यह बात एक बार में ही स्पष्ट कर दी और कहा कि पेट्रोलियम पदार्थों के मूल्य को बाज़ार के आधीन ही कर देना चाहिए जिससे पूरी तरह से इन पदार्थों पर सरकार का नियंत्रण ख़त्म हो सके और तेल कम्पनियों पर भी अनावश्यक बोझ न आ सके वह आज के समय की आवश्यकता भी है और देश के लिए यह सही समय भी है. आज जिस तरह से बहुत सारे लोग अपनी अपनी ढपली बजाने में लगे हुए हैं उससे यही लगता है कि देश में आज सभी को अपनी पड़ी हुई है और कोई सही बात कहने का दम भी नहीं रखता है. यशवंत सिन्हा ने यह बात कही है कि देश में टैक्स का बोझ बहुत ज़्यादा है जिससे पूरे दक्षिण एशिया में भारत में पेट्रोल सबसे अधिक कीमत पर मिलता है. यह बात तो स्पष्ट ही है कि पूरी दुनिया में पेट्रोलियम पदार्थों पर इस तरह का टैक्स शायद ही कहीं लगाया जाता हो ? अब भी देश में केवल राजनीति करने के लिए ही लोग कुछ भी कहने से बाज़ नहीं आ रहे हैं जबकि जनता को वास्तविकता में कुछ राहत दिलाने की ज़रुरत है.
      यह अब देश की आवश्यकता है कि इस पूरी व्यवस्था को पूरी तरह से फिर से निर्धारित किया जाये क्योंकि जब तक इस कर निर्धारण प्रक्रिया को ठीक नहीं किया जायेगा तब तक कुछ भी ठीक नहीं होने वाला है. पूरे देश से इस क्षेत्र के विशेषज्ञों की राय जानने के लिए एक बैठक बुलाई जानी चाहिए और सरकार को इस तरह के किसी भी काम से अपने को अलग कर देना चाहिए. अगर संभव हो तो देश में एक पेट्रोलियम नियामक आयोग का गठन कर दिया जाना चाहिए जिससे इस क्षेत्र की सभी बातों को एक साथ ही एक जगह पर समझा जा सके और अगर किसी को कोई सुझाव और शिकायतें भी करनी हों तो वो भी इसी मंच पर की जा सकें. देश में इस तरह के सभी कार्यों को अब सरकारी मकड़जाल से निकलने की आवश्यकता है क्योंकि इसके बिना हर बार जनता ही पिसती रहेगी और उसके लिए कोई भी सही काम नहीं हो पायेगा.
      मनमोहन सिंह ने इस मसले को जिस तरह से सादगी से और सच्चाई के साथ कहा है उसकी आज ज़रुरत है क्योंकि सभी को अपने वोट दिखाई दे रहे हैं और ऐसे में सही कहने का साहस भी बहुत कम लोगों में होता है. अब देश के राजनेताओं को इस मसले पर चुप ही रहना चाहिए या फिर कहीं न कहीं से कोई हल बताना चाहिए क्योंकि अब केवल बकवास से कुछ भी हासिल होने वाला नहीं है ? अब देश की जनता को कोई स्थायी समाधान चाहिए न कि केवल आश्वासन ? ऐसा काम कोई अर्थशास्त्री ही कर सकता है इस बारे में गंभीर चिंतन की ज़रुरत है और इसके बिना कुछ भी सही नहीं हो सकता है. हर बार कीमतें बढ़ने पर इस तरह की बकवास सुनने की आदी जनता भी इस तरह के काम में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाती है क्योंकि उसे भी पता है यह हो हल्ला केवल राजनैतिक लाभ हानि के लिए ही अधिक किया जाता है और इसके पीछे लोगों कि मंशा सही नहीं होती है.  
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