मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Friday, 3 February 2012

२ जी और कानून

      आख़िरकार सुप्रीम कोर्ट ने कानून के अनुसार अपने निर्णय को सुनाते हुए २जी मामले में अपना काम कर ही दिया. इस पूरे मामले में जहाँ एक तरफ तकनीकी विशेषज्ञों की राय का बहुत महत्व है उसे ही रेखांकित करते हुए कोर्ट ने यह भी कहा कि हाईकोर्ट में चल रहे मुक़दमें वहीं पर चलते रहेंगें और तकनीकी पक्षों की बारीकी से जांच की जाएगी तथा समय पड़ने पर सुप्रीम कोर्ट भी इसकी प्रगति देख सकता है. इस पूरे प्रकरण में जिस तरह से चुनाव के माहौल में सभी राजनैतिक दल एक बार फिर से इसको उछालने में लग गए हैं उसकी कोई आवश्यकता नहीं है. जिस तरह से भाजपा और कांग्रेस में एक बार फिर से आरोप प्रत्यारोप लगाए जाने लगे हैं उनकी भी कोई आवश्यकता नहीं है. यह सही है कि अगर नीतियों की समीक्षा और स्पेक्ट्रम दरों की सही जानकारी के बारे में सरकार नीलामी की सही प्रक्रिया अपनाती तो राजस्व का इतना बड़ा नुक्सान नहीं होता लेकिन भारत में मोबाइल का बाज़ार इतनी तेज़ी से बढ़ा कि उसके बारे में विचार करने के लिए किसी के पास समय ही नहीं था सभिकेवल टेलीडेंसिटी बढ़ने से ही बहुत खुश थे ? अगर उस समय नीति में कोई कमी थी तो तब से अब तक भाजपा क्यों चुप थी ? उसे यह लग रहा था कि उसकी नीतियां आगे बढ़ाई जा रही हैं यही बहुत संतोष की बात है पर देश की संवैधानिक संस्थाएं यह भूल गयीं कि जो आज बहुत अच्छा होता है कई बार समय के साथ वही बहुत ग़लत दिखाई देने लगता है. 
       अब जब इस मामले से प्रभावित कम्पनियाँ हैरानी से कोई रास्ता ढूंढ रही हैं तो वहीं भारतीय कानून और नेताओं के रवैय्ये को देखकर पूरा बाज़ार भी अचरज में है. जिस तरह से २००८ में आई नयी कम्पनियों के लिए यह निर्णय एक बड़ी समस्या लेकर आया है उसी तरह से देश के क़ानून और संविधान के साथ संसद के सामने भी बड़े प्रश्न लगाते हुए आया है कि आने वाले समय में क्या देश इस तरह की अधकचरी नीतियों से ही आगे बढ़ेगा ?  सवाल यह भी है कि क्या हमारे संविधान में ही कोई कमी है या फिर हमारे नेता हर बात का श्रेय खुद ही लेने के चक्कर में सही गलत का एहसास ही नहीं कर पाते ? ऐसा लगता है कि अब सही समय है कि इस तरह के तेज़ी से बढ़ते हुए हर क्षेत्र के बारे में केवल संसद ही फैसला न करे क्योंकि संसद का काम कानून बनाना है पर कानून आज के समय के हिसाब से सही बन पा रहा है या नहीं यह फैसला हमारे नेता नहीं कर सकते हैं ? इस तरह के मामलों में क्षेत्र विशेष के विशेषज्ञों की राय लेना अब आवश्यक कर दिया जाना चाहिए और साथ ही इस बात का भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि ये विशेषज्ञ किसी पार्टी या विचारधारा के साथ न हों वरना यहाँ भी वे अपनी क्षमता का दुरूपयोग करने लगेंगें. हर दल ने अपने हितों को साधने के लिए कभी न कभी ऐसे काम किये हैं ? टाटा समूह राजग पर अपनी एयरलाइन शुरू करने में अड़ंगे लगाने की बात सार्वजनिक रूप से कह चुका है तो उसका क्या ? 
        इस बात पर विचार करने के लिए अब विभिन्न विभागों की स्थायी समितियां बनायीं जानी चाहिए जिनमें उस क्षेत्र विशेष के विशेषज्ञों को शामिल किया जाना चाहिए साथ ही यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि देश के बड़े विशेषज्ञ इस समिति में देश के लिए अपनी राय हमेशा ही देना चाहेंगें पर उनको पूरे सम्मान के साथ यहाँ रखा जाए और उन्हें किसी भी तरह से प्रभावित करने का प्रयास न किया जाये. आज देश में जिस तरह का माहौल बन चुका है उसमें ये विशेषज्ञ भी अपने लाभ के लिए नीतियों को सही ढंग से बनाते समय कुछ कमियां छोड़ सकते हैं तो इसके लिए सम्बंधित नियामक आयोग अपने काम से इन्हें दुरुस्त रखने का काम करे. आज इस बात का कोई मतलब नहीं है कि राजग ने क्या नीतियां बनायीं थीं या संप्रग ने किन नीतियों का पालन किया ? मतलब इस बात का अधिक है कि अब देश आगे बढ़ने के लिए क्या करने वाला है ? क्या सभी लोग अपनी सामूहिक ज़िम्मेदारी को समझते हुए इस क्षेत्र में विभिन्न कम्पनियों के लगे हुए भारी पूँजी निवेश के बचाव की कोई कोशिश करेंगें ? क्या इन कम्पनियों को अब आगे होने वाली नीलामी में कोई छूट या प्राथमिकता दी जाएगी ? क्योंकि ऐसा भी नहीं है कि ये सभी कम्पनियां गलत थीं और ऐसा भी नहीं है कि इन्होंने इस छूट का लाभ नहीं उठाया है अगर नीतियों के पुराने होने के कारण इस तरह के विवाद सामने आते हैं तो नीति क्या होनी चाहिए अब इस पर विचार किये जाने का समय आ गया है.   
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