मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Tuesday, 14 February 2012

मैग्नेटिक बम और दिल्ली

      एक बार फिर से दिल्ली में चलती हुई इस्राइली दूतावास की गाड़ी पर जिस तरह से मैग्नेटिक बम लगाकर विस्फोट कराया गया उससे यही लगता है कि कहीं न कहीं अभी भी दिल्ली में आतंकियों के स्लीपिंग सेल काम कर रहे हैं. जिस तरह से इस्राइली दूतावास की गाड़ी को निशाना बनाया गया उससे इस विस्फोट में लेबनान और फिलिस्तीनी चरमपंथियों के हाथ होने से इनकार नहीं किया जा सकता है ? आम तौर पर इस तरह के खतरों के चलते ही पूरी दुनिया में इसराइल अपनी सभी गतिविधियों को बहुत शांत होकर चलाता है और उसके लोग कर्मचारी आसानी से किसी की नज़रों में नहीं आते हैं जिससे उन पर हमला किया जाना इतना आसान नहीं होता है पर दिल्ली में जहाँ पर इसराइल अपने पर इस तरह के ख़तरे कम करके देखता था अब यहाँ भी वह अतिरिक्त सतर्कता बरतने वाला है. दिल्ली में वैसे भी आतंकी हमेशा से कुछ न कुछ करने की फ़िराक़ में रहा करते हैं पर इधर कुछ अतिरिक्त सतर्कता के कारण उनके लिए किसी बड़ी घटना को अंजाम देना मुश्किल होता जा रहा है ऐसे में चलती गाड़ी पर इस तरह का पहला हमला करके आतंकियों ने मैग्नेटिक बम का प्रयोग किया है जिससे निपटने के लिए अभी तक बहुत कारगर तकनीकी नहीं विकसित की जा सकी है.
       अभी तक दिल्ली में इस तरह के बम का इस्तेमाल नहीं किया गया है पर भारत में पूर्वोत्तर के कुछ आतंकी संगठन इस तरह से विस्फोट किया करते हैं इस तरह के हमले इसराइल और मध्य पूर्व में बहुत किये जाते हैं. उससे भारत में सुरक्षा चिंताएं और भी बढ़ जाने वाली हैं क्योंकि अभी तक मध्यपूर्व के किसी भी आतंकी संगठन की संलिप्तता भारत में नहीं पाई गयी हैं और अगर अब उसे अपनी रणनीति बदलते हुए आईएम या अन्य किसी भारतीय आतंकी संगठन से मिलकर इस तरह का हमला किया है तो यह भारत के लिए ख़तरनाक सन्देश हो सकता है. वैसे पिछले कुछ वर्षों में सुरक्षा बलों के कुछ प्रभावी ढंग से काम कर पाने के कारण आतंकियों के लिए उस तरह से काम करना आसान नहीं रह गया है फिर भी विश्व को दिखाने के लिए वे अपनी इस तरह की हरकतों को चलाते रहना चाहते हैं जिसमें उनके कम संसाधन लगें और वे चर्चा में बने रहें. भारत में जब हर तरह की चुनौतियों से निपटने के लिए हर दिशा में काम किया जा रहा है तो ऐसी स्थिति में और अधिक चौकन्ना होने की आवश्यकता है. देश में विविधता और भागोलिक व्यापकता को देखते हुए अब इस मुद्दे पर भी नए सिरे से सोचने की आवश्यकता है.
      सुरक्षा और ख़ुफ़िया तंत्र के लोग अपना काम पूरी तरह से करने में लगे हुए हैं पर आज भी देश के ज़िम्मेदार नागरिक के तौर पर हम कितने सजग हैं यह सभी को पता है ? हम आज अपने काम में इतने व्यस्त हैं कि हमें पता ही नहीं होता हैं कि हमारे मोहल्ले और शहर में क्या हो रहा है और न ही हम अपने आस पास की गतिविधियों पर ध्यान भी रखने की आदत बनाना चाहते हैं जिससे कुछ भी संदिग्ध दिखाई देने पर हम पुलिस को सूचित कर सकें ? पुलिस के पास काम करने की एक अंतिम क्षमता है और वह उससे आगे नहीं जा सकती है क्योंकि जिस तरह से सीमित संसाधन उसके पास है वह उसमें भी बहुत अच्छे से काम करने की कोशिश कर ही रही है. किसी की आलोचना करना बहुत आसान है पर उसकी समस्या को हल करने में उसकी सहायता करना बहुत मुश्किल है ? आज भी हम आम भारतीय यह मान कर चलते हैं कि सुरक्षा की सारी ज़िम्मेदारी सरकार पर है कुछ हद तक या सही है पर सरकार या पुलिस पूरे देश पर इस तरह से नज़र नहीं रख सकते हैं जितनी आसानी से हम अपने आस पास की संदिग्ध गतिविधियों पर नज़र रख कर पुलिस की आँख और कान बन सकते हैं. अब भारत में सामाजिक पुलिसिंग को बढ़ावा देना ही होगा क्योंकि उसके बिना इस तरह की संदिग्ध गतिविधियों पर नज़र रख पाना बहुत मुश्किल होता जा रहा है.
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