मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Saturday, 3 November 2012

पटाखे और सुरक्षा

              दीपावली का त्यौहार नज़दीक आते ही पूरे देश में पटाखों का कारोबार पूरी तरह से अपने रंग में आ जाता है क्योंकि पूरे वर्ष में इस समय जितने पटाखों की खपत पूरे देश में होती है वह सारे साल की बिक्री पर भारी पड़ती है. पटाखों और बारूद से बनने वाली अन्य सामग्रियों की बिक्री के लिए वैसे तो देश में बहुत सारे दिशा निर्देश पहले से ही मौजूद हैं पर थोड़े लालच और लापरवाही के कारण यह त्योहारों में इस्तेमाल होने वाले पटाखे कई बार निर्दोषों की जान भी ले लेते हैं. क्या कभी हमने अपने आस-पास की उन पटाखा दुकानों पर नज़र डालने की कोई कोशिश की है जहाँ से हम और हमारे परिवार के लोग पटाखे खरीदते हैं ? क्या वहां पर उन मानकों का अनुपालन किया जाता है जिन्हें सरकार द्वारा निर्धारित किया जाता है और क्या वहां पर सुरक्षा के मानकों को पूरा किया जाता है जो आग लगने की किसी भी घटना के लिए निर्धारित किये जाते हैं ?
              हमारे देश में अभी तक जिस तरह से मुख्य बाज़ारों में ही पटाखों की दुकानें लगा देने की परंपरा चली आ रही है वही हमारी सुरक्षा के लिए गंभीर ख़तरा बनकर सामने आती है. कुछ पैसों के लालच में किसी भी भीड़ भरी जगह पर पटाखे बेचने से सबसे बड़ा नुकसान यही हो सकता है कि किसी दुर्घटना के समय त्योहारी खरीद में व्यस्त आम लोग वहां से बाहर आसानी से नहीं निकल पायेंगें जिससे दुर्घटना की भयावहता बढ़ सकती है ? इस बारे में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने पहले ही दिशा निर्देश जारी कर रखे हैं कि त्योहारों पर इस तरह कि दुकानों को किसी खुले स्थान पर लगाया जाना चाहिए जिससे किसी भी दुर्घटना की स्थिति में दमकल विभाग की पहुँच वहां तक आसानी से हो सके और आम लोगों को वहां से आसानी से बाहर निकाला जा सके जिससे जान माल का नुकसान कम से कम हो और त्योहारों की खुशियों में खलल न पड़े.
            जिस तरह से कानून और नियमों की धज्जियाँ उड़ाने में हम लोगों की कोई सानी नहीं है और हम अपनी थोड़ी सुविधा के लिए न जाने कितने लोगों के लिए ख़तरा बनकर सामने आ जाते हैं जबकि नियम पूर्वक सामान बेचने से आम लोगों को कुछ दूर तक ही तो जाना पड़ेगा पर यह दूरी उनकी और उनके परिवार की सुरक्षा के लिए कितनी महत्वपूर्ण हो सकती है यह किसी दुर्घटना के समय ही पता चल पाता है. केवल पुलिस-प्रशासन, दुकानदारों और नियमों के भरोसे सब कुछ सुरक्षित हो सकता तो ठीक हो चुका होता हमें खुद भी अपनी सुरक्षा के लिए सचेत होना पड़ेगा तभी जाकर हम सुरक्षित हो सकेंगें. जहाँ तक संभव हो पटाखों की खरीददारी खुले स्थान पर लगने वाली बाज़ार से ही करें और पटाखों को खरीदने का काम अन्य सामान को खरीदने के साथ कतई न करें. जो बाज़ार खुले में और सुरक्षात्मक दृष्टि से मानकों को पूरा करती हों वहीं पर कम संख्या में जाकर पटाखें खरीदें और त्योहारों को सुरक्षित बनायें.        
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