मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Friday, 9 November 2012

प्रोटोकाल और सम्मान

            भाजपा के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवानी के जन्मदिन पर उन्हें बधाई देने पहुंचे भारत में रूस के राजदूत अलेक्जेंडर एम कदाकिन ने भारतीय मूल्यों को प्राथमिकता देते हुए फूलों का गुलदस्ता भेंट करने के बाद उनके पैर भी छुए तथा गणेश जी की एक छोटी सी मूर्ति भी उपहार स्वरुप की. कदाकिन ने आडवानी से काफी देर तक हिंदी में बात भी की जिससे यही लगता है कि उन पर भारतीय संस्कृति का बहुत प्रभाव है और वे यह प्रदर्शित भी कर सकते हैं कि यह सब मात्र दिखावा ही नहीं वरन सच्चाई है. भारतीय दर्शन में अपने से बड़े व्यक्ति को जिस तरह से सम्मान की दृष्टि से देखने को सर्वोपरि माना गया है उस परिस्थिति को कदाकिन ने अपने आचरण में ढालकर यह दिखा दिया कि भारत की संस्कृति अपनी विशिष्टता के कारण आज भी पूरे विश्व के लोगों को अपनी तरफ आकर्षित करने की क्षमता रखती है. रूस आज भी भारतीय संस्कृति से प्रभावित होने वाले मुख्य देशों में से एक है और वहां पर भारतीय दर्शन को सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है.
             क्या हमारे देश में भी आज इस तरह से अपनी संस्कृति से जुड़ाव महसूस किया जाता है या फिर हम अपनी उन जड़ों से जुड़ने की कोशिशें भी करते हैं जो हमें विश्व में सम्माननीय दर्ज़ा दिलवाने का काम किया करती हैं ? आज देश में शिक्षा का जो स्तर हो चुका है उससे हमें अच्छी नौकरी तो मिल जाती है पर जब भी बात नैतिक मूल्यों की होती है तो हम कहीं न कहीं बहुत पिछड़े हुए नज़र आते हैं. क्या कारण है कि हम अपनी उन आधारभूत भावनाओं से दूर होते जा रहे हैं जबकि विदेशों में भारत के आदर्शों और संस्कृति को मानने वाले लोगों में भारत को लेकर जिज्ञासा बढ़ती जा रही है ? हमारे विश्व स्तरीय आज के शैक्षिक संस्थान अपने विद्यार्थियों के दम पर अपना लोहा मनवाने में कामयाब हो रहे हैं पर हमारे सामाजिक और पारिवारिक मूल्यों में निरंतर ह्रास होता चला जा रहा है ? शिक्षित होना एक बात है और संस्कारयुक्त शिक्षा बिलकुल दूसरी बात है. आज हमें शिक्षा और ज्ञान में एक बार फिर से भेद करने की आवश्यकता है जिससे हम अपने पुराने गौरव को प्राप्त कर सकें.
                एक समय भारत की साख इसके गुरुकुलों के द्वारा हुआ करती थी और विश्व के अनेक प्रसिद्द दार्शनिक और गुरु भारत आकर यहाँ की संस्कृति को महसूस करना चाहते थे और बहुत से ऐसे लोग भी हुए हैं जिन्होंने अपने जीवनकाल में यहाँ आकर अपने ज्ञान को यहाँ के लोगों से बांटने का काम भी किया था. आज भारत में कहीं पर भी ऐसी शिक्षा देने वाले संस्थान नहीं बचे हैं जो भारतीय संस्कृति के उस पहलू पर जोर देते हों जिनसे हमारी धर्म और संस्कृति सनातन हो चुकी है ? अपने इस विशिष्ट भाव को हम स्वयं ही भूल चुके हैं और आने वाले समय में जिस तरह से पूरी पीढ़ियाँ ही नैतिक पतन की तरफ़ जा रही हैं उससे भारतीय मूल्यों के और कमज़ोर पड़ने की तस्वीर अभी से दिखाई दे रही है. धर्म के आधार पर धार्मिक शिक्षा देने वाले संस्थानों की आज देश में कोई कमी नहीं है पर धर्म के साथ संस्कृति, सहिष्णुता और सहभागिता की भारतीय परम्पराओं को संजोने का काम आज कहीं भी नहीं हो पा रहा है जिससे हमारे खुद अपने मूल्यों से दूर होने का खतरा बढ़ता ही जा रहा है.    
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

1 comment:

  1. पुरे देश का नैतिक पतन हो रहा है बस आप का ही नहीं हुआ आप धन्य है

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