मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Sunday, 23 December 2012

अपराध, गुस्सा और प्रदर्शन

                              दिल्ली में एक छात्रा के साथ हुए दुष्कर्म के बाद जिस तरह से पूरे देश में उबाल आया है उसकी बहुत आवश्यकता थी पर आज यह आन्दोलन केवल प्रदर्शनों से बढ़कर जिस तरह से हिंसक होने की तरफ बढ़ रहा है उसके पीछे के कारण समझ पाना ज़रा मुश्किल ही है क्योंकि दिल्ली पुलिस के खिलाफ गुस्सा जितनी तेज़ी से उभर रहा है वह दिल्ली की कानून व्यवस्था के लिए एक बड़ा संकट बन सकता है ? गुस्सा अपनी जगह है पर जिस तरह से कल रात १ बजे सोनिया गाँधी के आवास पर प्रदर्शन किया गया वह देश में किसी बड़ी कानून व्यवस्था से जुड़ी समस्या को जन्म दे सकता है. हालाँकि सोनिया ने बाहर आकर १५ मिनट तक प्रदर्शन कारियों से बात कर उनसे सुबह फिर मिलने का वायदा किया फिर भी नेताओं के घरों पर इस तरह से रात में जाकर क्या हासिल किया जा सकता है ? दिल्ली और देश में महिलाओं और लड़कियों के ख़िलाफ़ होने वाले इस तरह के अपराधों के लिए कड़ी और त्वरित सज़ा का प्रावधान होना ही चाहिए जिससे समय रहते अपराधियों को सज़ा दी जा सके और कानून के डर से कुछ मामलों में कमी लायी जा सके. इस पूरे प्रकरण के बाद जिस तरह से लोग अपनी अपनी बातों को आगे बढ़ाने का काम करने में लगे हुए हैं उससे यही लगता है कि कहीं न कहीं लोग इस तरह के अपराधों की मूल समस्या पर ध्यान देने के स्थान पर केवल तकालिक उपायों पर ही विचार देने में लगे हुए हैं ? किसी भी सभी समाज में इस तरह की घटनाओं का घोर विरोध होना ही चाहिए पर जिस तरह से कुछ लोग इतने महत्वपूर्ण मसले पर भी केवल विरोध की राजनीति को हवा देने में लगे हुए हैं उससे क्या साबित किया जा सकता है ?
                लोकतंत्र में किसी को भी प्रदर्शन से नहीं रोका जा सकता है पर जिस तरह से दिल्ली में मुख्यमंत्री, प्रधान मंत्री और महत्वपूर्ण नेताओं के घरों को घेरा जा रहा है उसमें भी कुछ ग़लत नहीं है पर क्या ये प्रदर्शन शांतिपूर्वक नहीं किये जाने चाहिए ? इतने महत्वपूर्ण काम के लिए दबाव बनाने के लिए इकट्ठे हुए लोगों में आख़िर वे कौन से तत्व घुस रहे हैं जो प्रदर्शन की दिशा को मोड़कर पुलिस के साथ संघर्ष करने को प्राथमिकता दे रहे हैं ? भावनात्मक मुद्दे पर दबाव बनाने के स्थान इस तरह से अराजक होकर क्या हासिल किया जा सकता है इसमें तो अच्छे काम के लिए आई हुई लड़कियों और महिलाओं को पुलिस के साथ अनावश्यक संघर्ष में उलझाने का काम किया जा रहा है जिसकी कोई ज़रुरत ही नहीं है. आख़िर वे कौन से तत्व हैं जो इस तरह से महिला शक्ति को उकसाने का काम करने में लगे हुए हैं ? देश में हर व्यक्ति किसी भी नाकामी के लिए सबसे पहले पुलिस पर ही हावी हो जाता है पुलिस कर्मी भी हमारी तरह आम इंसान ही होते हैं पर जिस तरह से उन्हें निशाना बनाया जा रहा उससे तो यही लगता है कि जैसे पूरी घटना में पुलिस ही सबसे अधिक दोषी हो ? आज देश में पुलिस से कानून व्यवस्था के काम के अलावा बाक़ी सारे काम लिए जाते हैं जिससे उसके पास अपनी वास्तविक ड्यूटी को करने के लिए समय ही नहीं बचता हैं आवश्यकता पुलिस को कानून व्यवस्था में सही ढंग से लगाने की है न कि उसके ख़िलाफ़ प्रदर्शन करने की ?
               क्या केवल कठोर कानून बन जाने से ही महिलाओं के ख़िलाफ़ इस तरह के अपराध करने वालों को रोका जा सकेगा देश में पहले से ही पता नहीं कितने कठोर कानून मौजूद हैं फिर भी उनका उल्लंघन होता ही रहता हैं ? यह पूरा मसला कानून के डर से अधिक नैतिक मूल्यों पर टिका हुआ है जिसकी आज पूरे समाज में अनदेखी हो रही है. पुरुष प्रधान समाज आज बात बात पर महिलाओं पर रोक लगाने की कोशिश करता है और नैतिकता की कमी होने के कारण ही इस तरह के अपराधों को बढ़ावा मिलता है. क्या हम आम नागरिक के रूप में पने आस पास महिलाओं के ख़िलाफ़ होने वाली किसी घटना के लिए कुछ करने की इच्छा रखते हैं या फिर केवल कुछ भद्दी टिप्पणियां करके आगे बढ़ जाते हैं ? घर से बाहर विभिन्न कामों से निकलने वाली ये महिलाएं भी किसी न किसी परवार से ही होती हैं यदि बाहर निकल कर अपने कर्तव्य को निभाने में किसी महिला के साथ कोई अभद्रता करता है तो उस समय आम नागरिक के तौर पर हमारी क्या ज़िम्मेदारी बनती है और क्या हम उसे निभा पाने में सफल होते हैं ? महिलाओं के प्रति पूर्वाग्रह रखने वालों का मानसिक उपचार कराया जाना चाहिए जिससे वे किसी अनैतिक घटना को अंजाम न दे सकें. इस काम को कानून और पुलिस के डर से करने के स्थान पर सामाजिक तौर पर किया जाना चाहिए क्योंकि किसी भी कानून का पुलिस की ग़ैर मौजूदगी में क्या हाल होता है यह हम सभी जानते हैं फिर भी सामाजिक कमी को कानून के ज़रिये सुलझाने के हमारे इन प्रयासों को क्या कहा जाये ?  
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