मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Sunday, 3 February 2013

डायनासोर के अंडे ?

                हमारे देश में भी कहीं से भी कुछ करके पैसे कमाने के गुर तो लोगों को बहुत आते हैं पर जब ईमानदारी से कुछ करने का समय आता है तो उनके पास करने के लिए कोई काम ही नहीं होता है. एक ताज़ा घटना में यह खुलासा हुआ है कि एमपी के फॉसिल रिज़र्व एरिया से बड़ी संख्या में डायनासोर के अण्डों को तस्करी के माध्यम से विदेशी लोगों को बेचा जा रहा है. वैसे देखा जाये जब देश भर में कहीं भी हम अपने आज के इतिहास को संजोने का काम भी ठीक ढंग से नहीं कर पा रहे हैं उस स्थिति में इतने पुराने जीवाश्मों के बारे में सोचने का समय ही किसके पास है ? इसके साथ ही एक अच्छी ख़बर यह भी है कि एमपी सरकार ने इस दिशा में ठोस कानून बनाने पर विचार कर रही है जिससे इस एरिया से इस तरह की किसी भी गैर कानूनी गतिविधि को अंजाम न दिया जा सके. इस बारे में इस क्षेत्र के वैज्ञानिकों का कहना है कि गुजरात ने इस तरह की किसी भी तस्करी को रोकने के लिए प्रभावी कानून बनाकर अपने यहाँ पर इस गतिविधि पर काफी हद तक नियंत्रण पा लिया है. ये जीवाश्म देश की धरोहर हैं और इससे पुरातात्विक विज्ञान से जुड़े हुए लोगों को बहुत कुछ अध्ययन करने के अवसर भी मिलते हैं.
                             देश में आज़ादी के पूर्व और उसके बाद से जो भी नियम कानून चल रहे हैं उनके बारे में आज भी समयानुकूल बदलाव किये जाने की मूलभूत आवश्यकता पर देश गौर ही नहीं करता है जबकि इनमें अविलम्ब आज के अनुसार बदलाव करने की ज़रुरत है. भारत में अंग्रेजों के शासन और उससे पहले भी विभिन्न आक्रमणकारियों के द्वारा जिस तरह से भारत के सभी तरह के संसाधनों के दोहन करने के लिए कानून बनाये जाने को ही प्राथमिकता दी गयी उससे यही लगता है कि किसी को आज भी इस बात की फ़िक्र नहीं है कि वो अब इन कानूनों को एक संप्रभु देश के अनुसार बनाने पर गौर करे ? हजारों वर्ष पहले जब भारत में तक्षशिला और नालंदा जैसे विश्व स्तरीय शिक्षा केंद्र थे तो हो सकता है कि वहां पर इस तरह से जीवाश्मों पर भी कोई अध्ययन किया जाता रहा हो पर देश के अपने गौरव शाली अतीत को संजो पाने में असफल रहने के कारण आज हमारे पास वह केवल यादों के रूप में ही बचे हुए हैं. देश में हमेशा से ही राजनीति होती रही है पर उसके साथ शिक्षा में जो बदलाव होने के साथ कानून में प्रभाव आना चाहिए था वह आज भी नहीं आ पाया है.
                           आज भी यदि हम अपनी इस तरह की वैज्ञानिक महत्व से जुड़ी धरोहरों को संरक्षित करने के लिए कोई उपयुक्त क़दम उठा पाने में असफल रहते हैं तो देश में उन संभावनाओं का कभी भी पता नहीं लगाया जा सकेगा जिससे विज्ञान को एक नयी दिशा मिला करती है. किसी समय पृथ्वी पर एक छत्रराज करने वाले डायनासोर आख़िर किस तरह से गायब हुए और उनकी कितनी प्रजातियाँ कहाँ कहाँ पर पाई जाती थीं यह सब वैज्ञानिक महत्व की बातें है और हम इनमें अपना योगदान तभी पूरी तरह से दे सकेंगें जब हम इनका उचित संरक्षण करके इन्हें आने वाली पीढ़ियों के लिए बचा कर रख पाने में सफल हो सकेंगें. अभी तक दुनिया में जितनी भी जगहों पर इस तरह का कुछ भी मिलता है कठोर कानूनों द्वारा उनका संरक्षण किया जाता है पर हमारे देश से वही लोग अपने अध्ययन के लिए इन अण्डों की तस्करी करते हैं जिन्हें यहाँ कुछ लालच में ५०० रूपये में बेचा जा रहा है अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में उनकी क़ीमत १ करोड़ रूपये तक बताई जाती है. अच्छा ही है कि एमपी सरकार ने इस बारे में अपनी तत्परता को दिखाते हुए इनके संरक्षण के बारे में सोचना शुरू कर दिया है.
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