मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Monday, 4 February 2013

मुस्लिम पर्सनल लॉ और सामाजिक ज़िम्मेदारी

                                    पूरे विश्व में केवल कुछ लोगों द्वारा इस्लाम की मनमानी व्याख्या करने के कारण इस्लाम के अनुयायियों को संदेह की दृष्टि से देखा जाने लगा है जबकि आज से कुछ दशक तक पहले यह स्थिति नहीं थी आज जिस तरह से आम लोगों के मन में इस्लाम को लेकर नयी नयी भ्रांतियां जन्म लेने लगी हैं उसे दूर करने का उपाय भी मुसलमानों को ही करना होगा क्योंकि किसी दूसरे द्वारा कही गयी कोई भी बात उन्हें उपदेश जैसी लगेगी जिसके माध्यम से कुछ भी ठीक नहीं किया जा सकता है. लखनऊ में ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की बैठक में जिस तरह से इस बात पर चिंता ज़ाहिर की गयी कि देश के कोर्ट शरिया कानून का कोर्ट गलत अर्थ निकाल रहे हैं उससे यही लगता है कि देश में मुसलमानों के लिए इतना कुछ करने के बाद भी कहीं न कहीं कुछ संवादहीनता अवश्य ही है क्योंकि भारतीय संविधान ने जिस तरह से मुसलमानों के लिए पर्सनल लॉ का अनुपालन करने की छूट दे रखी है उसके बाद भी यदि मुसलमानों को यह लगता है कि सब कुछ उनके हिसाब से नहीं चल रहा है तो उन्हें एक बार फिर से आम मुसलमानों को शरिया कानून के बारे में सही जानकारी मुहैया करानी चाहिए जिससे कोर्ट के सामान्य काम काज और पर्सनल लॉ के बीच की यह सीमा स्पष्ट हो जाये.
                                 बोर्ड ने जिस तरह से आज के परिप्रेक्ष्य में मुस्लिम महिलाओं को पारिवारिक संपत्ति में हक़ दिलवाने और रजिस्ट्रेशन ऑफ़ मैरिज एक्ट के लेकर केंद्र और राज्य सरकारों से बात करने की बात भी कही है उस पर आने वाले समय में ही कुछ पता चल पायेगा पर देश की कोर्ट पर किसी अन्य कमी के लिए इस तरह की टिप्पणियां करने से देश में किसी को भी बचना ही चाहिए क्योंकि जब मामला देश के संविधान के अनुसार फ़ैसला देने का होता है तो किसी भी कोर्ट में पर्सनल लॉ के मुकाबले देश के कानून को प्राथमिकता दी जाती है. इस तरह की समस्या से बचने के लिए बोर्ड को पूरे देश में इस बात पर नज़र रखनी चाहिए कि पर्सनल लॉ से जुड़े मुद्दों पर शरिया के अनुसार वह खुद ही फ़ैसला करे और ऐसे मामलों को देश की कोर्टों तक न आने दे क्योंकि जब कोर्ट में मसला पहुँचता है तो कोई भी कोर्ट देश के संविधान के अनुसार ही फ़ैसला देती है न कि शरिया के अनुसार. इस तरह की परिस्थितयों में कोर्ट पर ऊँगली उठाने से कुछ भी हासिल नहीं होने वाला है. एक और महत्वपूर्ण बात जिस पर विचार किया गया कि लम्बे समय से संदिग्धों के रूप में जेल में बंद मुस्लिम युवकों को तुरंत रिहा किया जाना चाहिए अपने आप में बिलकुल सही मांग है क्योंकि यदि सरकार और पुलिस ने किसी को संदेह के आधार पर पकड़ा है तो उस पर तुरंत कानूनी कार्यवाही की जानी चाहिए और उन्हें जांच कर कानून के अनुसार सजा देने या मुक्त कर देने पर विचार करना चाहिए पर किसी को संदेह के आधार पर बंद रखने के लिए देश के कानून को नहीं बल्कि तत्कालीन सरकार और पुलिस को दोषी माना जाना चाहिए.
                       बोर्ड को इस बात पर भी ध्यान देना चाहिए कि जिन युवाओं की पैरवी वह कर रहा है वे भी किसी भी तरह से किसी भी देश विरोधी गतिविधि में संलिप्त न हों क्योंकि इतनी बड़ी मुस्लिम आबादी में से कुछ लोगों को ही पकड़ा जाता है तो क्या उसके पीछे के कारणों पर भी विचार किए जाने की ज़रुरत नहीं है ? देश ने मुसलमानों कि सम्मान के साथ जीने के लिए हर सुविधा दे रखी है उसका सही दिशा में उपयोग करके आम मुसलमानों के जीवन स्तर को सुधारने का काम बोर्ड द्वारा किया जाना चाहिए क्योंकि जब तक एक नागरिक के तौर पर मुसलमान देश के संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल कर अपनी उन्नति के दरवाजे को खुद नहीं खोलना चाहेंगें तब तक किसी भी तरह की सरकारी मदद या सुरक्षा उनका किसी भी स्तर पर भला नहीं कर पायेगी. आज मुसलमानों में अशिक्षा के चलते ही सबसे अधिक समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं जब इस्लामी देशों में दीनी तालीम के साथ आधुनिक और रोज़गार परक शिक्षा को अपनाया जा रहा है तो भारतीय मुसलमान इससे दूर क्यों रहना चाहते हैं ? आज उन्हें सरकार से संरक्षण के स्थान पर अपने लिए उन संसाधनों की मांग करनी चाहिए जो उनके सामाजिक स्तर को अगले कुछ दशकों में ऊपर उठा सकें पर दुर्भाग्य से आज पूरी दुनिया में इस्लाम के पैरोकार वे लोग बने हुए हैं जो मलाला को गोली मार सकते हैं और कश्मीर में लड़कियों के बैंड "प्रगाश" की सदस्यों को अपनी प्रतिभा दिखाने पर खुले आम दिल्ली गैंग रेप जैसी घटना के लिए तैयार रहने को कहते हैं. "प्रगाश" का शाब्दिक अर्थ अँधेरे से उजाले की तरफ़ होता है पर शायद इस्लाम के इन चंद अनुयायियों को किसी का भी अँधेरे से उजाले की तरफ़ जाना अच्छा ही नहीं लगता है....        
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1 comment:

  1. पर्सनल भी व्यक्ति के मुखानुसार ही होता है.

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