मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Tuesday, 2 April 2013

जिहाद और आतंक

                         मुंबई पुलिस के एक आन्तरिक परिपत्र में जिस तरह से प्रमुख भारतीय इस्लामी संगठन जमात-ए-इस्लामी हिन्द की शाखाओं पर उसके लड़कियों के स्कूलों में उनके ब्रेन वाश करने और जिहाद की ट्रेनिंग देने की बात कही गयी है उसके लीक हो जाने से हमेशा की तरह पनपने वाले बिना बात के एक और विवाद को हवा मिल गई है. मुंबई पुलिस ने कुछ सूचना एकत्रित करके इस बात को इंगित किया होगा वर्ना आतंक के मामलों में तेज़ी से काम दिखाने और देश में केवल दिल्ली पुलिस के साथ ही इस तरह के अभियानों के सञ्चालन में महारत हासिल रखने वाली मुंबई की आतंक रोधी शाखा ने ऐसा बिना सबूत के नहीं कहा होगा. आशा के अनुरूप जिस तरह से जमात ने अपना विरोध दिखाया है उससे यही पता चलता है कि आज भी पूरी दुनिया में इस्लाम को लेकर अन्य धर्मावलम्बियों में ही नहीं बल्कि खुद इस्लाम में भी भ्रांतियां हैं और आज भी इनको दूर कर इस्लाम की सही रौशनी देखने और दिखाने वाले इदारों की कमी महसूस की जाती है. आज जिस तरह से जिहाद शब्द को समझने में भूल की जाती है और उसकी मनमानी व्याख्या की जाती है उस परिस्थिति में अब इनके स्पष्टीकरण की बहुत आवश्यकता है क्योंकि इस तरह की घटनाएँ समाज में अविश्वास को बढ़ाने का काम किया करती हैं.
                        जिहाद मुसलमानों के लिए एक पवित्र कर्त्तव्य बताया गया है और अरबी भाषा में इसके दो अर्थ हैं पहला सेवा और दूसरा संघर्ष, पर आज के समय में जिहाद का अर्थ सेवा से नहीं लिया जाता है क्योंकि पिछली कई शताब्दियों से इस्लाम के नाम पर जिस तरह से मध्यपूर्व के शासकों ने बल पूर्वक पड़ोसी देशों पर हमला किया और उसे भी जिहाद का नाम दिया तो आज जिहाद का सीधा मतलब उससे और संघर्ष से ही लगाया जाने लगा है. जिहाद के बारे में भी इस्लाम में दो मुख्य प्रकार बताये गए हैं पहले जिहाद-अल-अक़बर जिसका अर्थ आन्तरिक संघर्ष से हैं जो मुसलमानों को बुराइयों से दूर करने के लिए हर समय संघर्ष करने के बारे में बताता है और दूसरा जिहाद-अल-असग़र जिसका अर्थ बाहरी संघर्ष से है जिसमें कहा गया है कि जब मुसलमानों को इस्लाम पर चलने न दिया जाए तो उन्हें संघर्ष करके अपना हक़ हासिल करना चाहिए. इसी दूसरे जिहाद ने इस्लाम में जिहाद की पूरी परिभाषा पर ही अतिक्रमण कर लिया है आज जिहाद का मतलब सीधे सशस्त्र संघर्ष से ही लिया जाने लगा है क्योंकि काफ़ी लम्बे समय से इस्लाम में उन लोगों का ही प्रभुत्व दिखाई देता है जो केवल इस तरह के संघर्ष को ही जिहाद मानते हैं.
                         जिहाद को हर मुसलमान के लिए फ़र्ज़ बताया गया है और अगर इसके लिए जमात काम कर रही है तो क्या ग़लत है पर यदि जिहाद के नाम पर भारत में भारत विरोधी ताकतों का साथ दिया जा रहा है तो यह पूरी तरह से ग़लत ही है क्योंकि आज भारत में कहीं पर भी ऐसी स्थिति नहीं है कि किसी मुसलमान को इस्लाम पर चलने से मना किया जा रहा हो ? यदि जमात मुस्लिम लड़कियों को जिहाद-अल-अक़बर की ट्रेनिग दे रहा है तो उससे कोई दिक्कत नहीं है पर यदि वह जिहाद-अल-असग़र के लिए काम कर रहा है तो यह भारत में इस्लाम, उसके और देश के भविष्य लिए किसी भी तरह से सही नहीं कहा जा सकता है. आज इस्लाम के साथ सबसे बड़ी समस्या यही आ रही है कि चंद लोगों ने अपने अनुसार इस्लाम की मनमानी व्याख्या करनी शुरू कर दी है जिससे इस्लाम की जो तस्वीर दुनिया के सामने आनी चाहिए वह नहीं आ पा रही है. वास्तव में आज इस्लाम को उस जिहाद की ज्यादा ज़रुरत है जो उसके बारे में दुनिया भर में फैली हुई भ्रांतियों को दूर कर दूसरों को उसके बारे में सही जानकरी देने का काम कर सके.     
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